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ड्रग्स का धंधा और राजनीति

ड्रग्स के धंधे में कथित लिप्तता को लेकर पंजाब के राजस्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया से प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की पूछताछ ने इस समस्या की विकरालता को स्पष्ट कर दिया है। अब तक यह कहा जाता रहा है कि जानलेवा नशों की जकड़ जिस तरह समाज में बढ़ रही है, वह किसी न किसी किस्म के राजनीतिक संरक्षण के बिना संभव नहीं है। लेकिन इस संबंध में सरकारी तौर पर बाकायदा किसी राजनेता से सवाल पूछे जाने का यह पहला मौका है।
पंजाब में ड्रग्स का मुद्दा उठता रहा है, लेकिन राजनीतिक दायरे में कभी इस पर कोई गंभीर बात नहीं हुई। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पिछले चुनावों के दौरान इसे मुद्दा बनाने की कोशिश की तो सभी उन पर ऐसे टूट पड़े जैसे उन्होंने पंजाब का घोर अपमान कर दिया हो। उस समय उनसे सार्वजनिक माफी की मांग करने वालों में बीजेपी और अकाली दल के लोग सबसे आगे थे।
राजनीतिक बिरादरी का अपने तात्कालिक हितों से जरा भी आगे न देखने की यही विशेषता हमारे देश की बहुत सारी बीमारियों की जड़ बनी हुई है। गौरतलब है कि, सिंथेटिक ड्रग्स के जिस मामले में मजीठिया से पूछताछ हुई है, वह पिछले साल ही सामने आया था। उस वक्त केंद्र में यूपीए की सरकार थी। फिर भी इस मामले में कानून अपनी धीमी, सुस्त चाल से ही चलता रहा।
पिछले दिनों जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में इस समस्या की तरफ लोगों का ध्यान खींचा, तब जाकर फाइलें तेजी से सरकनी शुरू हुईं। यह भी दिलचस्प है कि उधर ईडी ने मजीठिया से पूछताछ शुरू की, इधर बीजेपी ने उनके खिलाफ कमर कस ली। एबीवीपी ने सड़क पर उतर कर मजीठिया के इस्तीफे की मांग शुरू कर दी।

अगले ही महीने की 12 तारीख से बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ड्रग्स के इस्तेमाल के खिलाफ वहां राज्यव्यापी अभियान शुरू करने वाले हैं। बीजेपी की इन गतिविधियों की अहमियत इस बात से बढ़ जाती है पार्टी उस प्रांतीय सरकार में शामिल है, जिसमें मजीठिया आज भी राजस्व मंत्री बने हुए हैं। इतना ही नहीं, वह मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के दामाद, उपमुख्यमंत्री तथा अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर बादल के साले और केंद्र की मोदी सरकार में मंत्री हरसिमरत कौर बादल के भाई हैं।
स्वाभाविक रूप से मजीठिया को लेकर बीजेपी का विरोध उस समय फीका पड़ जाता है जब विपक्षी दल इसी मसले पर सदन में अविश्वास प्रस्ताव पेश करते हैं और पार्टी सरकार के साथ खड़ी दिखती है। ऐसे में असल सवाल यह नहीं है कि बीजेपी अगला विधानसभा चुनाव अकाली दल के साथ लड़ने की तैयारी कर रही है या उसके खिलाफ।
मुख्य मुद्दा यह है कि ड्रग्स के इस धंधे पर स्थाई और कारगर रोक कैसे लगेगी। धंधे में लिप्त पाए गए राजनेता (चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो) के खिलाफ कार्रवाई इस दिशा में पहला कदम ही हो सकती है। इसके साथ ऐसे बहुत से कदम उठाने होंगे, जिनकी फिलहाल कोई तैयारी नहीं दिखती।

 

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