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उत्तराखंड आपदा में गुम पत्नी को डेढ़ साल बाद खोज निकाला

उत्तराखंड! केदारनाथ की लीला, मिलने और बिछड़ने की ऐसी हैरत अंगेज कहानी जो एक इंसान का हौसला बयान करती है। केदारनाथ की आपदा में बिछड़ी पत्नी को खोजने के लिए एक पति ने अपना सबकुछ छोड़ दिया। यहां वहां भटकता रहा और आखिरकार पत्नी के लिए उसके प्यार ने रंग दिखाया। उसने अपनी लीला को हासिल कर लिया।
विजेंद्र और लीला ने 28 साल पहले शादी के सात फेरे लिए थे। सांसारिक जीवन खुशी-खुशी चल रहा था। बच्चे भी बड़े होने लगे, धार्मिक भावना और आस्था रखने वाले इस परिवार ने तीर्थ यात्रा की तैयारी भी खुशी-खुशी कर ली। राजस्थान के अलवर जिले के भीकमपुरा गांव के रहने वाले विजेंद्र सिंह कंवर पेशे से खुद एक ड्राइवर हैं।
12 जून 2013 को एक बस लेकर तीर्थ यात्रा पर उत्तराखंड निकल पड़े। साथ में पत्नी लीलाकंवर और दूसरे 30 यात्री भी थे। तभी 16 जून को केदारनाथ धाम में वो हो गया जिसकी किसी को कोई कल्पना तक नहीं थी। केदारनाथ में वो सैलाब आया कि देखते ही देखते हंसी खुशी और आस्था-उमंग के इस वातावरण में तारों तरफ चित्कार मच गई। वो आसमानी जलजला आया कि पल भर में सब कुछ नेश्तनाबूत हो गया। पलक झपकते ही लाखों ज़िंदगियों पर पहाड़ टूट पड़ा। कायनात का ऐसा क़हर कि कई अपनों से बिछड़ गए तो कई दुनिया से ही जुदा हो गए। इसी त्रासदी में विजेंद्र की पत्नी लीला भी उनसे बिछड़ गई।
जब सैलाब थमा तो शुरू हुई अपनों की तलाश, पत्थरों में सब कुछ दब गया ऐसे में पथरायी आंखों से अपनों को तलाशते कई लोगों के हाथ हताशा और निराशा लगी तो कई उम्मीद की डोर थामें अपनों को तलाशने दर-दर भटकते रहे। विजेंद्र उन्हीं में से एक थे जो प्रभू की इस अपरंपार लीला के आगे भी अपनी पत्नी लीला कंवर को ढ़ूंढ़ते रहे। अपने जीवनसाथी के ज़िंदा होने का विश्वास वैसा ही था जैसा विश्वास बाबा केदारनाथ पर।
इस हादसे से लाखों ज़िंदगियां प्रभावित हुईं। कुछ दिनों तक तलाशने के बाद भी ना मिलने वालों को सरकार की ओर से मृत मान लिया। विजेंद्र के गांव वालों ने भी मान लिया कि उनकी पत्नी लीला अब इस दुनिया में नहीं है। पर ये बात खुद विजेंद्र मानने को तैयार नहीं थे वो लगातार अपनी पत्नी को तलाशते रहे और डेढ़ साल बाद आखिर कार विजेंद्र का विश्वास रंग लागा।
बाबा केदारनाथ ने अपनी लीला एक बार फिर दिखाई और विजेंद्र को उनकी लीला मिल गई। अपनी पत्नी लीला कंवर को डेड साल की दिन रात की मेहनत के बाद आखिरकार ढूंढ निकाला है। गांव के लोग भी मानते हैं कि ये विजेंद्र ही हैं जिनके अटूट विश्वास ने उन्हें उनकी लीला से मिला दिया। वर्ना आज के इस कलयुग में ये असंभव सा लगता है और ये ग्रामीण महिलाएं लीला की वापसी पर लोक गीत गाकर खुशियां मना रही हैं।
विजेंद्र के साथ इस यात्रा में साथ गए 30 लोगों में से सिर्फ 13 ही लौटे थे। तय वक्त ना मिलने बाद लीला सहित लापता 17 लोगों सरकार ने मृत मान लिया था। उन सभी के परिजनों को 10-10 लाख रु. का मुआवजा भी दिया गया। विजेंद्र ने ये पैसे भी लीला की तलाश में ही लगा दिए। सबने उन्हें मरा हुआ मान लिया था पर विजेंद्र ने उम्मीद नहीं छोड़ी। भले ही नौकरी और घर परिवार छोड़ दिया।
हादसे के बाद से विजेंद्र गांव में दो दिन से ज्यादा कभी नहीं रुके। घर और बच्चों को संभाल कर वापिस अपने मिशन में लग जाते। हाथ में फोटो लेकर गांव गांव घूमते और पत्नी के बारे में पूछते, इस दौरान वहा लोग विजेंद्र को पागल समझने लगे थे। लेकिन अब जब डेढ़ साल बाद पत्नी मिली तो बदहवाश हालत में त्रासदी ने लीला को इस हाल में पहुंचा दिया। लेकिन इलाज के बाद लीला के ठीक होने की उम्मीद परिजन कर रहे हैं और बच्चे भी अपनी मां को अपने बीच पाकर बेहद खुश हैं और आज इन्हें महसूस हो रहा है कि वाकई ज़माने में मां से बढ़कर कुछ भी नहीं।
केदारनाथ त्रासदी के कई लोग शिकार हुए। जिले के बांदीकुई तहसील के महुआ गांव के रहने वाले भौरेलाल मीणा और उनकी पत्नी सुनीता गौरीकुंड में लापता हो गए थे। अब लीला कवंर के वापिस आने के बाद कुछ और लोगों को उम्मीद किरण दिखाई दे रही है।
त्रासदी के बाद उत्तराखंड में मानसिक संतुलन खो देने वालों की संख्या बढ़ी है। ज्यादातर ऐसे हैं जो सदमे से विक्षिप्त हुए हैं। सरकार अगर सभी पागलो का फोटो अखबारों में छपवा दे तो हो सकता उनके घरवाले उन्हें पहचान लें। और वे भी अपने घर पहुंच जाएं अगर सरकार वहां पागलों की तरह घूम रहे लोगों का सर्वे करवा करे उन्हें इंटरनेट पर डाल दे तो हो सकता है कई बिछड़े हुए लोग अपनों से मिल जाएं।

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