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रघुवर की राह डगमग या आसान ?

झारखंड की स्थापना के बाद से यहां पहली बार एक ऐसी सरकार बनी है, जिसके टिकाऊ होने की उम्मीद की जा रही है। इस कारण उससे लोगों की अपेक्षाएं भी बढ़ी हुई हैं। उन्हें आशा है कि रघुवर दास की अगुआई में गवर्नमेंट उनकी तमाम समस्याओं को दूर करेगी और विकास प्रक्रिया को गति देगी। हालांकि राज्य में इस सरकार को लेकर एक छोटी सी कसक भी है। इस आदिवासी बहुल राज्य की कमान पहली बार किसी गैर आदिवासी नेता को सौंपी गई है।

झारखंड का गठन ही इसलिए हुआ था कि अविभाजित बिहार में आदिवासियों को पर्याप्त राजनीतिक भागीदारी नहीं मिल पा रही थी और उनके हितों की अनदेखी हो रही थी। इसीलिए झारखंड का नेतृत्व किसी आदिवासी को सौंपने की एक परंपरा बनी थी, जिसे बीजेपी ने तोड़ दिया। आदिवासी संगठनों में इससे भारी आक्रोश है। बहरहाल, रघुवर दास एक अनुभवी जमीनी नेता हैं। उन्हें अपने काम के जरिए आदिवासियों का विश्वास जीतना होगा। उन्हें वह करके दिखाना होगा जो 14 सालों में आदिवासी मुख्यमंत्री नहीं कर पाए।

लेकिन, उनकी दो मुश्किलें हैं। एक तो यह कि उनकी सरकार आजसू के समर्थन पर आश्रित है। हर हाल में उससे तालमेल बिठाकर ही उन्हें चलना होगा। दूसरे, अभी न सही लेकिन आगे चलकर अपनी ही पार्टी के कई कद्दावर नेताओं और उनके गुटों का चक्कर भी उन्हें झेलना होगा। फिलहाल रघुवर दास के सामने सबसे बड़ी चुनौती झारखंड की कानून-व्यवस्था सुधारने की रहेगी।
नक्सलियों से निपटने में सख्ती या समझौते में से कोई भी नीति सफल नहीं हो पा रही है। उन्हें अलग-थलग करने के लिए डिवेलपमेंट को तेजी से बढ़ाना एक तरीका हो सकता है। राज्य में 40 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। यहां केवल 9 फीसदी सिंचित भूमि है, इसलिए खेती लाभप्रद नहीं हो पा रही है। राज्य के उद्योग-धंधों में स्थानीय लोगों को बहुत कम रोजगार मिल पाया है। इसलिए, पलायन और मानव तस्करी विकराल रूप ले रही है।

गैर-सरकारी आंकड़ों को मानें तो पिछले 12 वर्षों में झारखंड से लगभग 30 लाख लोगों को रोजगार की तलाश में पलायन करना पड़ा, जिनमें लगभग 5 लाख महिलाएं भी शामिल हैं। भ्रष्टाचार से सरकारी मशीनरी का चक्का जाम हो जाना एक अलग ही आफत है। जाहिर है, रघुवर दास का रास्ता आसान नहीं है, लेकिन वह दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ काम करें तो उन्हें जनता का सहयोग जरूर मिलेगा।

 

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