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आलू से रोशनी पर रिसर्च

नई दिल्ली  !   वर्ष 2010 में, राबिनोविच ने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के एलेक्स गोल्डबर्ग और बोरिस रुबिस्की के साथ इस दिशा में एक और कोशिश करने की ठानी। गोल्डबर्ग बताते हैं, ”आलू को चार-पांच टुकड़ों में काटकर इन्हें तांबे और जिंक की प्लेट के बीच रखा गया। हमने 20 अलग-अलग तरह के आलू देखे और उनके आंतरिक प्रतिरोध की जांच की। इससे हमें यह समझने में मदद मिली कि गरम होने से कितनी ऊर्जा नष्ट हुई।ÓÓ आलू को आठ मिनट उबालने से आलू के अंदर कार्बनिक ऊतक टूटने लगे, प्रतिरोध कम हुआ और इलैक्ट्रॉन्स ज्यादा मूवमैंट करने लगे- इससे अधिक ऊर्जा बनी और इससे ऊर्जा 10 गुना बढ़ गई यानी बिजली बनाने की लागत में कमी आई।
वे कहते हैं, ”इसकी वोल्टेज कम है लेकिन ऐसी बैटरी बनाई जा सकती है जो मोबाइल या लैपटॉप को चार्ज कर सके।
एक आलू उबालने से पैदा हुई बिजली की लागत 9 डॉलर प्रति किलोवाट घंटा आई, जो डी-सैल बैटरी से लगभग 50 गुना सस्ती थी। विकासशील देशों में जहां कैरोसिन (मिट्टी के तेल) का इस्तेमाल अधिक होता है, वहां भी यह छह गुना सस्ती थी। दुनिया में 120 करोड़ लोग बिजली से वंचित हैं और एक आलू उनका घर रोशन कर सकता है।
परंतु तीन वर्ष बीतने के बाद भी इस शोध की तरफ दुनिया भर की सरकारों, कम्पनियों या संगठनों का ध्यान नहीं गया तो इसकी वजह शायद कुछ मुद्दे हैं। पहला यह कि पहली आवश्यकता इस बात को देखने की है कि क्या खाने के लिए पर्याप्त आलू हैं?
शायद यही वजह है कि श्रीलंका की केलानिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने केले के तने से यह प्रयोग करने की ठानी है। भौतिक विज्ञानी के.डी. जयसूर्या और उनकी टीम का कहना है कि केले के तने के हिस्सों को उबालने से एक एल.ई.डी. 500 घंटे तक चल सकती है।

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