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मोदी जी सच ये है, गृहमंत्री जी के संसदीय क्षेत्र का ?

 मोदी  जी  जरा  सच्चाई से भी रूबरू होते रहिये इसमें कोई दो राय  नहीं  आपने  जहां स्वच्छता अभियान की शुरुआत कर एक अच्छी पहल की है वही आपके  नुमाइंदों ने झाड़ू पकडकर सार्वजानिक स्थानों पर केवल मीडिया में फोटो मात्र छपने की नौटंकी की है और कुछ नहीं! गृहमंत्री राजनाथ सिंह  ने भी अपने संसदीय क्षेत्र स्थित चारबाग  रेलवे  स्टेशन पर झाड़ू पकड़ी थी किन्तु हकीकत ये है की गृहमंत्री जी के  संसदीय क्षेत्र में मैला ढोने की कुप्रथा आज भी जारी है। यह हाल सूबे की राजधानी लखनऊ का तब है, जब साल 1993 में संसद में कानून बनाकर इसपर प्रतिबंध  भी लगाया जा चुका है जिसके  तहत शुष्क शौचालय बनाने या मैला ढुलाई के लिए किसी कर्मचारी को नियुक्त करने पर सजा का प्रावधान है लेकिन इस कुप्रथा पर आज भी पूरी तरह लगाम नहीं लगाया जा सका है विचारणीय तो नयः है की जब सूबे की राजधानी  का यह हाल है तो अन्य जिलों  का क्या आलम होगा इस कुप्रथा पर पूरी तरह रोक ना लगाए जाने के लिए  मौजूदा अखिलेश सरकार भी जिम्मेवारी से बच नहीं सकती ।
कुछ जागरूक पत्रकारों व अखबारनवीसों ने जब  इस कुप्रथा की हकीकत की जानकारी की तो देखने में आया की कड़े कानून बनने के बाद भी राजधानी लखनऊ में मैला ढोने की कुप्रथा का जीता-जागता नमूना पुराने लखनऊ के कश्‍मीरी मोहल्ले में साफ देखा जा सकता है। इस मोहल्ले के कल्‍बे आबिद वार्ड में करीब 25 से 30 घर ऐसे हैं, जहां आज भी शुष्क शौचालय का इस्‍तेमाल किया जा रहा है। आज भी महिलाएं घर-घर जाकर मैला ढोने का काम रही हैं जनसत्ता एवं कुछ वेव न्यूज़ पोर्टल खबर को उजागर भी कर चुके हैं देखना यह है की क्या इस कुप्रथा पर पूरी तरह रोक लगाई जाती है या केवल  भासनबाज़ी में ही सब कुछ  स्वक्ष हो  रहा है ।
आज भी मैला आंचल
साल 1993 की बात है, जब आजादी के चार दशक बाद भारत सरकार को लगा कि सि‍र पर मैला ढोना ठीक नहीं है और इसको बंद किया जाना चाहिए। इसके लिए कानून बनाया गया। यह तय किया गया कि मैला ढोने की अमानवीय प्रथा को किसी भी तरह 31 दिसंबर 2007 तक ज़रूर खत्म कर दिया जाएगा। 14 साल गुजर गए, फिर सरकार को होश आया कि यह प्रथा तो खत्म हुई ही नहीं। फिर ऐलान किया गया कि 31 मार्च 2009 तक यह कुप्रथा पूरी तरह खत्म कर दी जाएगी, लेकिन क्या ऐसा हो पाया?
लखनऊ के पुराने शहर के कश्‍मीरी मोहल्ले के कल्‍बे आबिद वार्ड में करीब 25 से 30 घर ऐसे हैं, जहां शुष्क शौचालय का इस्‍तेमाल किया जा रहा है। सुबह और शाम के समय यहां महिलाएं मैला ढोने के लिए आती हैं। ये महिलाएं अपने साथ एक बड़ी डलिया रखती है, जिसमें मैला उठाकर ले जाती हैं। इन महिलाओं को 20 से 25 रुपए प्रति घर के हिसाब से मैला ढुलाई मेहनताना मिलता है।
क्‍या कहती हैं मैला ढोने वाली महिलाएं
मैला ढोने वाली इन महिलाओं का कहना है कि उनके इस काम की वजह से लोग उनके पास भी नहीं आते हैं। वहीं, यदि वह दूसरा काम करने की सोचती हैं तो लोग काम भी नहीं करने देते। मजबूर होकर उन्‍हें इस काम को करना पड़ता है। वहीं, कुछ महिलाओं का कह‍ना कि अब उनके बेटे ही उनसे यह काम करने के लिए मना करने लगे हैं। बच्‍चे कहते हैं कि इस काम से लोग उनके पास नहीं आते हैं। ऐसे में वह अब यह काम छोड़ देंगी।
क्‍या कहते हैं स्‍थानीय लोग
कल्‍बे आबिद वार्ड के निवासी शहजाद ने बताया कि शुष्‍क शौचालय की वजह से पूरे मोहल्‍ले में गंदगी पसरी रहती है। दिनभर बदबू का सामना करना पड़ता है। वहीं, बरसात के दिनों में तो आफत ही हो जाती है। बजबजाती हुई गंदगी में रहना मुश्‍किल हो जाता है। उन्‍होंने कहा कि मोहल्‍ले में कई लोगों ने परेशानी को देखते हुए खुद ही घरों में जल प्रवाहित शौचालयों का निर्माण करवा लिया है, लेकिन अभी भी कई घरों में शुष्‍क शौचालय बने हैं। रेहान ने बताया कि जिस दिन मैला ढोने वाली महिलाएं नहीं आती हैं उस दिन तो घरों के बाहर निकलना मुश्‍किल हो जाता है। नालियों मे गंदगी फैली रहती है। उन्‍होंने बताया कि इस गंदगी की वजह से आए दिन लोगों को बीमारियों का सामना करना पड़ता है।
क्‍या बोले पार्षद
इस मामले में जब कल्‍बे आबिद वार्ड के पार्षद तनवीर हुसैन गुड्डू से सवाल किया गया तो उन्‍होंने कहा कि महिलाओं को खुद ही ये काम नहीं करना चाहिए। वही, जहां तक बात है इसे बंद करवाने के की, तो विभाग से फि‍लहाल कोई मदद नहीं मिल रही है। करीब आठ महीने पहले जेएनयूआरएम सर्वे करके गया था। इसके बाद अभी तक कुछ काम नहीं हुआ है। उन्‍होंने बताया कि लोग समस्‍या लेकर उनके पास आते हैं, लेकिन वह खुद मजबूर हैं। वहीं, इस बारे में जब नगर निगम के अपर आयुक्‍त पी के  श्रीवास्‍तव से बात की गई तो पहले वह जवाब देने से बचते नजर आए और बाद में बात करने को कहा। इसके बाद जब उनसे संपर्क साधने की कोशि‍श की गई तो उन्‍होंने फोन ही नहीं उठाया।
क्‍या कहती है रिपोर्ट
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने भारत में मैला ढोने की कुप्रथा पर एक रिपोर्ट जारी की है। इसमें कहा गया है कि सरकारी अधिकारियों द्वारा कड़े कदम नहीं उठाए जाने की वजह से यह प्रथा आज भी बदस्तूर जारी है।
पीएम मोदी ने कहा था खत्‍म हो कुप्रथा
बताते चलें कि बीते चार अप्रैल को ही प्रधानमंत्री मोदी बेंगलुरु बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को संबोधि‍त कर रहे थे। इस दौरान उन्‍होंने कहा था कि मैला ढोने की प्रथा खत्म होनी चाहिए। इससे जुड़े 23 लाख लोग इससे मुक्त हों।
क्‍या है कानून
मैला ढोने और शुष्क शौचालय निर्माण पर प्रतिबंध का कानून 1993 को मैला ढोने की समस्‍या को हल करने के लक्ष्य से बनाया गया था, लेकिन इतने साल बाद भी सरकार इसे लागू करने में नाकाम रही। इसका नतीजा ये रहा कि हजारों लोग अभी भी मैला ढोने की अमानवीय प्रथा का हिस्सा बने हुए हैं। मैला ढोने वाले ज्यादातर लोग दलित और आदिवासी समुदाय से जुड़े हुए हैं।
बताते चलें कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 2011 में सभी राज्यों को निर्देश दिया था कि यदि कोई दलित या फिर आदिवासी समुदाय से मैला ढोने के काम में किसी व्यक्ति को शामिल करता है तो वो दलित एक्ट के दायरे में आ जाएगा। उसके खिलाफ दलित एक्ट के कानून के तहत कार्रवाई होगी। कई राज्यों ने मैला ढोने की कुप्रथा के अस्तित्व की पुष्टि की है।
17 जून 2011 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मैला ढोने को भारत की विकास प्रक्रिया पर एक गहरा धब्बा करार दिया था। उन्‍होंने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से इस कुप्रथा को भारत के सभी कोनों से 2011 के अंत तक पूरी तरह से समाप्त करने के लिए शपथ लेने का आह्वान किया था। सरकार मैला ढोने के सभी तरीकों से लेकर सीवेज और सेप्टिक टैंक की सफाई समेत सफाई कर्मचारियों की पूरी मुक्ति के लिए एक नया और व्यापक कानून बनाने के लिए बाध्य थी।
तमिलनाडु विधानसभा ने मौजूदा कानून के कमजोर होने और उसे एक नए और मजबूत कानून के जरिए प्रतिस्थापित करने की बात को चिन्हित करते हुए 10 सितंबर 2011 को आम सहमति से विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें उसने केंद्र सरकार के पास 1993 के कानून में कुछ चीजो में बदलाव कर व्यापक बनाने के साथ उसे और स्पष्ट करने का प्रस्ताव भेजा। इसमें मैला ढोने की परिभाषा को और बड़ा करने, उसे लागू करने वाले अधिकारी की नियुक्ति, पर्यावरण के प्रदूषण को रोकने की अधिकारी के पास शक्ति जैसे क्षेत्र शामिल थे। कानून को सार्वजनिक जवाबदेही के तंत्र को मजबूत करना चाहिए और उसे केवल सफाई की जगह मानव गरिमा पर केंद्रित करना चाहिए और सभी राज्यों के लिए अपने आप बाध्यकारी होना चाहिए।
12 मार्च 2012 को संसद के संबोधन के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल नें सामाजिक न्याय के लिए वादा करते हुए कहा कि ‘सरकार मैला ढोने की कुप्रथा और गंदे शौचालयों को खत्म करने के लिए संसद में एक नया विधेयक पेश करेगी। ये मैला ढोने वालों को एक वैकल्पिक पेशे के साथ उचित पुनर्वास भी मुहैया कराएगा, जिससे वो गरिमामय जीवन के योग्य बन सकें’।
इसी तरह की एक प्रतिबद्धता चार दिन बाद सुप्रीम कोर्ट के सामने भी व्यक्त की गई थी। विधेयक संसद के मानसून सत्र में पेश किए जाने के लिए प्रस्तावित था। यह सुप्रीम कोर्ट में पेश किए गए एक मामले के बाद सामने आया, जिसमें मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया गया था, जो ये कहता था कि यदि केंद्र इस कानून में बदलाव करने पर नाकाम रहा तो ऐसी स्थिति में पीएमओ समेत उच्च लोगों को व्यक्तिगत तौर पर कोर्ट में उपस्थित होने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।
नए विधेयक की प्रस्तावना इस बात का संज्ञान लेती है कि ‘मैला ढोने वालों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय और अमानवीय कष्टों को दुरुस्त करना और एक गरिमामय जीवन के लिए उनका पुनर्वास जरूरी है।’ मैला ढोने वाले की परिभाषा 1993 के कानून में कुछ ऐसी है ‘एक शख्स जो मानव मल ढोने के काम में शामिल किया जाता है’, जबकि 2012 के नए विधेयक में मैला ढोने की परिभाषा व्यापक, समावेशी और इसमें ये शामिल करता है कि ‘कोई शख्स मानव मल को हाथ से साफ करने, उसे ढोने और फेंकने या फिर किसी भी तरीके से उसे पकड़ने या फिर खुले ड्रेन, पिट या खुले में शौचालय से मैले को जहां डाला जाता है, वहां तक ले जाने आदि के काम में शामिल है।’

 

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