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ISIS के चंगुल से छूटे जर्नलिस्ट की दास्ताँ जो रोज मर-मर के जीता था

दुनिया के दुर्दांत आतंकी संगठन ISIS के चंगुल से छूटे तुर्की फोटो जर्नलिस्ट बुन्यामिन अयगुन ने आतंकवादियों के जुल्म की कहानी बताई है। उन्होंने कहा, ”मैं वहां 40 दिनों तक रोज मर-मर के जीता था। मुझे रोज कहा जाता था, खड़े हो जाओ, प्रार्थना कर लो और जिन्हें याद करना है, याद कर लो। तुम्हें कल हम तलवार से मौत के घाट उतार देंगे।” बंधक रहने के दौरान अपने अनुभवों को किताब ’40 डेज एट द हैंड्स ऑफ आईएस’ के जरिए दुनिया के सामने ला रहे अयगुन ने कहा, ”रोज मेरे सामने मौत होती थी। मैं जब भी आंखें बंद करता था तो सपने देखता था कि कैसे आतंकवादी मुझे मौत के घाट उतारेंगे।”
बता दें कि अयगुन एक अवॉर्ड विनिंग रिपोर्टर हैं जो तुर्की के मिलियत डेली के लिए काम करते थे। उनका इस्लामिक स्टेट (आईएस) के आतंकियों ने नवंबर 2013 में अपहरण कर लिया था। वह 40 दिनों तक आतंकवादियों के कब्जे में रहे।

वह अपने अनुभवों के आधार पर ’40 डेज एट द हैंड्स ऑफ आईएस’ किताब लिख रहे हैं। इसमें अपनी भावनाओं के अलावा उन्होंने बंधकों के साथ जुड़ाव का भी उल्लेख किया है। एक सामाचार एजेंसी को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ”यदि मैं किताब नहीं लिखता तो यह मेरे साथियों के साथ अन्याय होता।”

’40 सालों की तरह बीते 40 दिन’
अयगुन ने उल्लेख किया है कि आतंकवादी उन्हें ज्यादातर आंखों पर पट्टी बांध कर रखते थे। इस दौरान अयगुन के दोनों पैर भी रस्सी से बंधे होते थे। इस हालत में उन्हें कई बार ऐसा लगा कि वह वापस अपनी दुनिया में नहीं जा पाएंगे। उन्होंने उल्लेख किया है, ”आईएस की कैद में मेरे 40 दिन बड़ी मुश्किल से बीते। ऐसा लगा कि मैं 40 सालों से यहां कैद हूं।”

कैसे पकड़े गए थे
अयगुन को आईएस के आतंकवादियों ने पश्चिम समर्थित फ्री सीरियन आर्मी (एफएसए) के कमांडर के साथ पकड़ा था। उन्हें 25 नवंबर, 2013 को उस वक्त पकड़ा गया था जब वह साल्किन टॉउन में आतंकियों के एक समूह का इंटरव्यू करने जा रहे थे।
अयगुन ने कहा, ”एक दायी (अंकल) नाम के व्यक्ति द्वारा रोज मेरी मौत का फरमान सुनाया जाता था। मेरी उससे दोस्ती हो गई थी। दायी मुझे रोज मेरे लिए खाना और पानी लाता था। वह मुझे ऐसी बातें बताता था, जिससे मुझे अपने जीवन को लेकर आशा बंधती थी। वह कहता था कि वह चाहता है कि तुम बच जाओ, लेकिन ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि कादी (एक इस्लामिक जज) ने उसे मौत की सजा देने का आदेश दिया है।” कुछ दिनों बाद दायी के बारे में वहां के गार्ड ने खबर दी कि वह हमले में मारा गया।
तलवार नहीं, गोली से मरना चाहता था
अयगुन का कहना है कि वह अपने सेल में तीन दिनों तक आने वाले गार्डों पर हमला करने का इंतजार करते रहे, लेकिन कोई भीतर नहीं आया। उन्होंने कहा, ”मैं यह हमला भागने के लिए नहीं, बल्कि गार्डों को गुस्सा दिलाने के लिए करने वाला था, ताकि वह मुझे गोली मार दें, क्योंकि मैं तलवार से नहीं मरना चाहता था। मैं इतना अकेला और शांत हो गया था कि लगा कि मैं अब जिंदा नहीं रह पाऊंगा, लेकिन ऊपर वाले की शक्ति ने मुझे जिंदा रखा। मैं रोज मौत का इंतजार करता, यह मेरे लिए बहुत दुखद था।”
कैसे हुए रिहा
अयगुन को तुर्की का होने का ज्यादा फायदा मिला। आईएस के ठिकानों पर विद्रोही समूह ने हमला कर दिया, जिसके बाद आतंकवादियों को अपना अड्डा बदलना पड़ा। वह शहर उनके कब्जे से छूट गया, जहां अयगुन सहित अन्य बंधकों को रखा गया था। इसके अलावा, कई तुर्की खुफिया एजेंसियां लगातार आतंकवादियों से अयगुन की रिहाई के लिए संपर्क में थीं और अंत में उन्हें 40 दिनों बाद मुक्ति मिल गई। हालांकि, किताब में उन्होंने इस बारे में ज्यादा विस्तार से नहीं लिखा है कि कैसे आतंकवादियों ने उन्हें प्रताड़ित किया। अयगुन का कहना है, ”यह कठिन था कि आप फिर से उसी दौर से गुजरें, जिससे आप मुक्ति पा चुके हैं। फिर भी मैंने काफी हद तक अपने अनुभवों को फायदा मिला। सभी जानते हैं कि आईएस लोगों के साथ कैसा सलूक करते हैं, मैं चाहता था कि लोग कुछ और बातों को भी जानें जिनके बारे में लोगों कोे पता नहीं है।”

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