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नेताओं की बेलगाम बोली

कहने को केंद्र की भाजपा सरकार ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे को अपना मुख्य मकसद बता रही है। लेकिन भाजपा के कुछ नेता और सांसद जिस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं और उन्हें रोकने के लिए कोई सख्त कदम नहीं उठाए जा रहे हैं, उससे उसकी मंशा पर सवाल उठते हैं। पार्टी के सांसद साक्षी महाराज ने एक महीने पहले महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताने वाला शर्मनाक बयान दिया था। अब उन्होंने हिंदू महिलाओं को सलाह दी कि वे अपने धर्म को बचाने के लिए कम से कम चार बच्चे जरूर पैदा करें; एक बच्चे को सीमा पर भेज दें और एक को संतों को दे दें। बवाल मचने के बाद वे अपनी बातों से बेशक पलट गए हों लेकिन जिस तरह की बातें वे कर रहे हैं, क्या वह किसी आधुनिक विकासमान देश के नेता का विचार लगता है? एक प्रगतिशील लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधि के तौर पर चुने जाने के बावजूद क्या साक्षी महाराज का सहज ज्ञान यही कहता है कि कोई धर्म ज्यादा बच्चे पैदा करने से बच सकता है?
इस समाज में पहले ही स्त्रियों को कई तरह की असमानताओं का सामना करना पड़ता है, वे इनसे पार पाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। संतान होने या न होने के मामले में महिलाओं को कैसे असहज सवाल और सामाजिक-पारिवारिक दबाव झेलने पड़ते हैं, यह छिपा नहीं है। प्रसव के दौरान जान गंवा देने वाली महिलाओं की तादाद आज भी एक गंभीर समस्या है। इसके अलावा, जनसंख्या नियंत्रण लंबे समय से देश की सबसे बड़ी चिंताओं में शामिल है। ऐसे में हिंदू धर्म को बचाने के नाम पर महिलाओं को ज्यादा बच्चे पैदा करने की सलाह देना क्या उनकी गरिमा और अस्तित्व के साथ मजाक नहीं है! क्या उनकी निगाह में महिलाओं का काम केवल बच्चे पैदा करना है? सही है कि आज के दौर में ऐसे बयानों को लोग तरजीह नहीं देते और एक बड़ा तबका इसे एक प्रहसन की तरह देखता है। लेकिन जिस दौर में समाज कई तरह की प्रतिक्रियावादी ताकतों और उनकी संकीर्ण राजनीति से जूझ रहा हो, उसमें किसी जनप्रतिनिधि के मुंह से इस तरह की बातें कैसा असर डालेंगी? कायदे से आगे की ओर देखने वाले समाज में ऐसी पिछड़ी बातें बहस का मुद्दा नहीं बननी चाहिए।
मेरठ में साक्षी महाराज ने यह भी कहा कि कुछ दिन इंतजार कीजिए, जल्दी ही गोहत्या और धर्मांतरण में शामिल लोगों को फांसी की सजा का प्रावधान होगा; अयोध्या में राम मंदिर बनने से कोई ताकत नहीं रोक सकती। संभव है कि इन्हें भाजपा नेताओं के आए दिन आने वाले बेतुके बयानों की तरह देखा जाए और इस पर उठा विवाद कुछ दिनों में शांत हो जाए। मगर सवाल है कि अगर इन नेताओं के सार्वजनिक बयानों के चलते अक्सर सांप्रदायिक सद्भाव के सामने चुनौती खड़ी हो रही हो या फिर वह सामाजिक विकास को उलटी दिशा में घुमाने वाला हो तो यह देश को किधर ले जाएगा? साध्वी निरंजन ज्योति और साक्षी महाराज के बयानों पर हुई फजीहत के बाद पिछले डेढ़-दो महीने के भीतर खुद प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी के सांसदों को सख्त ताकीद की थी कि वे कुछ भी बोलते समय ‘लक्ष्मण रेखा’ पार न करें और बोलना जरूरी लगे तो लोगों को सरकार के कामकाज के बारे में बताएं। मगर यह समझना मुश्किल है कि भाजपा के कुछ नेता प्रधानमंत्री के आग्रह या नसीहत को तरजीह क्यों नहीं दे रहे हैं!इसी तरह से बसपा नेता हाजी याकूब कुरैशी ने भी उल जलूल बयानबाज़ी की है सवाल यह उठता है की इस तरह की बयानबाज़ी किसलिए ?

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