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मृत आरोपियों ने कोर्ट में आकर कहा- साहब हम तो जिंदा हैं

फैजाबाद.सरकारी दफ्तरों में होने वाले घोटाले और उनकी जांच के लिए बनायी गयी विभागीय कमेटियां कितनी जिम्मेदारी से काम करती है। इसकी मिसाल पेश फैजाबाद की कचहरी में पेश आई, जहां एक गबन के मामले की जांच कर रहे सम्बंधित विभाग की ओर से दी गयी आख्या में दो आरोपी को मृत बताया गया था, लेकिन दोनों आरोपी पेशी के दौरान जिंदा कोर्ट में आकर खड़े हो गए और खुद को जीवित बताया। इसके बाद कोर्ट ने इस मामले में जांच करने वाली समिति की जांच पर सवाल उठाया। उन्होंने डीएम फैज़ाबाद से स्पष्टीकरण मांगा है।
क्या है पूरा मामला
मामला फैज़ाबाद के मिल्कीपुर क्षेत्र में स्थित साधन सहकारी समिति लिमिटेड का है। यहां साल 1978 में निर्माण कार्य हुआ था। इसमें निर्माण सामग्री खरीदने के लिए सचिव छैल बिहारी दूबे ने आंकिक राम हुजूर पाण्डेय को एडवांस के रूप में 10 हज़ार रुपये दिए। आरोप लगा कि दोनों व्यक्तियों ने न तो सामान खरीदकर समिति तक पहुंचाया और न ही रुपये वापस किये। इसको लेकर दोनों के खिलाफ गबन का मुकदमा दर्ज कराया गया।
यह पूरा मामला प्राचीनतम वादों की श्रेणी में है। इसकी मानीटरिंग स्वयं हाईकोर्ट कर रहा है। इस मामले के बहस के दौरान अभियोजन पक्ष ने दलील दी थी कि जिस रसीद के जरिये रुपये दिए गए, उसकी रसीद पत्रावलियों में नही है। उसकी दूसरी प्रति विभाग से तलब कर ली जाए। इसके बाद जब कोर्ट ने रसीद के बाबत जिलाधिकारी फैज़ाबाद से आख्या मांगी तो जिलाधिकारी की ओर से दी गयी आख्या में मुख्य विकास अधिकारी अरविन्द मलप्पा बंगारी ने बताया की रसीद मिलना सम्भव नहीं है क्योंकि अभिलेख उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं।
साथ ही इस आख्या में गबन के मामले में आरोपी छैल बिहारी दूबे और राम हुजूर पांडेय को मृत बता दिया गया। जब यह आख्या कोर्ट पहुंची तो पेशी के दौरान पाया गया कि गबन के दोनों आरोपी जिंदा है और कोर्ट में मौजूद है। इसके बाद कोर्ट ने इस लापरवाही के लिए डीएम फैजाबाद से लिखित स्पष्टीकरण मांगते हुए अगली पेशी दो अप्रैल निर्धारित की है।
अधिकारियों के हाथ-पांव फूले
इस मामले में कोर्ट के कड़े रुख को देखते हुए जांच करने वाले और आख्या प्रस्तुत करने वाले अधिकारियों के हाथ-पांव फूले हुए हैं। कानूनी जानकारों की माने तो खुद को जिंदा साबित करने वाले आरोपी सही हैं या नहीं। यदि इस बात पर सवाल उठ जाए तो बड़ी बात नहीं होगी, पर इतना जरूर है कि अगर आख्या में लिखी गयी बातें फर्जी हैं तो जाहिर तौर पर अक्सर विभागों में होने वाले गबन और भ्रष्टाचार की जांच करने वाली विभागीय कमेटियों पर सवाल उठना लाजमी है।

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