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कहीं पीछे न छूट जायें गांव

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पहले आम बजट में देश के शहरों को सौ स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणा की है. इसकी कमान खुद प्रधानमंत्री ने ही संभाल रखी है. स्मार्ट सिटी का पैरामीटर 21वीं सदी के अनुरूप होगा. यह प्रक्रिया भी देश में शुरू हो गयी है, लेकिन सोचनेवाली बात यह है कि स्मार्ट सिटी की इस भाग-दौड़ में कहीं हमारे गांव कहीं पीछे न छूट जाये.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज भी हमारे देश की आधी से अधिक आबादी गांवों में ही निवास करती है. आज स्थिति ठीक विपरीत है. गांवों में लोगों को असुविधा होती है, तो प्रशासनिक स्तर पर एक बड़ा सवाल पैदा हो जाता है, लेकिन गांवों के लोग नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं. वे खबर के लायक भी नहीं हैं. आज तक किसी ने शहरों की तुलना में गांवों के विकास के बारे में नहीं सोचा है. वास्तविकता यह है कि ग्रामीण पूरे देश का पेट भरते हैं.

आज भी हमारे देश में हजारों ऐसे गांव हैं, जहां के लोगों को बुनियादी सुविधाएं भी ढंग से मयस्सर नहीं है. हां, इतना तो है कि उन्हें आश्वासनों की घुट्टी जरूर पिलाई जाती है. सैकड़ों गांव के ग्रामीण बिजली के अभाव में लालटेन और ढिबरी युग में जीने को मजबूर हैं, तो कई गांवों में पानी की समस्या व्याप्त है. प्यूरीफाइड और बोतलबंद पानी की तो बात दूर ग्रामीणों को नलकूपों का पानी भी ढंग से नहीं मिलता.

चिकित्सा व्यवस्था के नाम पर झोला छाप डॉक्टरों की भरमार है, तो नकली दवाओं के भरोसे लोगों का जीवन चल रहा है. नकली दवाओं के सेवन के बाद कई भगवान के प्यारे हो गये, तो कई अन्य बीमारियों की चपेट में झूल रहे हैं. शिक्षा व्यवस्था का तो खैर कुछ कहना ही नहीं है. ऐसी स्थिति में गांवों को विकास से अछूता छोड़ना कितना न्यायोचित है.

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