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तंगी में तरक्की की तरकीब

लेख –विनोद कुमार

मोदी बड़े गर्व से कहते हैं कि वे कभी चाय बेचा करते थे। इससे शायद किसी का नुकसान नहीं था। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद वे जिस तरह तरक्की और रोजगार के मोहक दावे करके देश की संपदा को औने-पौने दामों में बेचने का प्रयास कर रहे हैं, वह देश को एक अंधकारमय भविष्य की तरफ ले जाएगा। प्रधानमंत्री बनने के बाद वे लगातार विदेशों का दौरा कर रहे हैं। देश में बड़े-बड़े आयोजन कर रहे हैं। जापान और अमेरिका गए। अभी वाईब्रेंट गुजरात महोत्सव के आयोजन में देशी-विदेशी कंपनियों के मालिकों का जमावड़ा हुआ। इन सबमें एक खूबसूरत मुहावरा उभर कर आया है- ‘मेक इन इंडिया’। क्या है इसका मतलब? ‘मेड इन इंडिया’ और ‘मेक इन इंडिया’ के बीच क्या अंतर है?
सामान्य बुद्धि कहती है कि दोनों के शाब्दिक अर्थ में बेहद सूक्ष्म फर्क है, लेकिन उसके गूढ़ार्थों में भारी अंतर है। मेड इन इंडिया का अर्थ शायद यह था या हम उसका अर्थ यह लगाते रहे हैं कि स्वदेशी संसाधनों और पूंजी से भारत में ही बना उत्पाद मेड इन इंडिया है और उससे एक तरह का गर्व का बोध होता है। लेकिन मेक इन इंडिया, जिसमें अर्थ खुद मोदी भर रहे हैं, वह यह कि इसमें संसाधन और श्रम तो देशी होगा, लेकिन पूंजी विदेशी, बहिरागत होगी।
विश्व अर्थव्यवस्था आज जिस दौर में पहुंच गई है, उसमें देशी, विदेशी पूंजी में कोई खास फर्क नहीं रह गया है। उससे बड़ा फर्क यह कि वह निजी पूंजी होगी। वैसे, यह बात भी अब छिपी नहीं रह गई है कि निजी पूंजी में बड़ा हिस्सा बैंकों के कर्ज, शेयर और डिबेंचर आदि के रूप में सार्वजनिक पूंजी का ही होता है। तब सामान्य शब्दों में निजी का अर्थ यह हुआ कि इस पूंजी से निर्मित परिसंपत्ति और लाभ पर अधिकार पूंजी लगाने वाले का होगा।
इसे और स्पष्ट करें तो सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित कल-कारखाने, बैंक, बीमा कंपनियों द्वारा अर्जित मुनाफा देश का होता है, उनकी परिसंपत्ति पर मालिकाना हक सरकार या देश का होता है, लेकिन निजी क्षेत्र की कंपनियों द्वारा अर्जित परिसंपत्ति और लाभ पर अधिकार निजी कंपनियों और उनके मालिकों का होगा। यानी, जमीन, खनिज संपदा, मानवीय श्रम आदि तो देश का होगा, इनसे जो कल-कारखाने निर्मित होंगे, जो व्यापार होगा, उसका मुनाफा निजी कंपनियों का होगा। नरेंद्र मोदी कहते हैं कि वे गुजराती हैं और उनकी शिराओं में खून नहीं, बिजनेस दौड़ता है। लेकिन यह ‘बिजनेस’ तो देश के लिए बेहद घाटे वाला है।
आखिर, इस व्यापार से देश को लाभ क्या होगा? तरक्की और विकास आदि तो छद्म शब्द हैं। थोड़ा मूर्त शब्दों पर विचार करें। मोहक शब्दों में मोदी और उनके दरबारी कहते हैं- तरक्की होगी, रोजगार मिलेगा। लेकिन कितना? वाईब्रेंट गुजरात महोत्सव के बाद स्थानीय अखबारों में सुर्खी बनी कि लगभग दो लाख करोड़ का पूंजी निवेश होगा और करीब पचास हजार लोगों को रोजगार मिलेगा। समाप्ति के बाद प्रचारित किया जा रहा है कि पचीस लाख करोड़ रुपए का पूंजी निवेश होगा। अब यह बात स्पष्ट करने की जरूरत किसी भी पक्ष ने नहीं समझी कि इस दो से पचीस लाख करोड़ के लिए अडाणी, रिलायंस, बिड़ला आदि कॉरपोरेट घरानों को कितना भूखंड चाहिए? कितने लोग विस्थापित होंगे? पचास हजार लोगों को रोजगार मिलेगा, तो उसमें कितनों को नियमित रखा जाएगा? ये सब बातें अमूर्त हैं।
याद दिला दें कि साठ के दशक में महज छह हजार करोड़ रुपए की शुरुआती पूंजी से बोकारो स्टील कारखाने का निर्माण हुआ था। शुरुआती दौर में पचीस लाख टन इस्पात का उत्पादन होता था, जो बढ़ते-बढ़ते चालीस लाख टन के करीब पहुंच गया। इस कारखाने में बावन हजार लोगों को नियमित रोजगार मिला था। कारखाना निर्माण के लिए उसी वक्त एचएससीएल की स्थापना हुई, जिसमें बीस हजार लोगों को नियमित रोजगार मिला था। बाई प्रोडक्ट से निर्माण के लिए फायर ब्रिक्स बनाने वाली कंपनी बीआरएल की स्थापना हुई थी, जिसमें आठ से दस हजार लोगों को रोजगार मिला। इन नियमित रोजगारों-नौकरियों के अलावा हजारों लोगों को अनियमित रोजगार, यानी ठेका मजूरी मिली थी।
दर्जनों ऐसे कारखाने आदिवासी बहुल इलाकों में लगे थे। सेल के अधीन ही पांच इस्पात कारखाने आदिवासी बहुल इलाकों में लगे। कोयला क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी सीसीएल है, जिसमें अब भी ढाई लाख श्रमिक काम कर रहे हैं। इसी तरह उर्वरक क्षेत्र में सिंदरी खाद कारखाना और कई बिजली कारखानों ने लाखों लोगों को रोजगार मुहैया कराए हैं। यह सब तब संभव हो सका जब देश कुछ ही साल पहले गुलामी से मुक्त हुआ था और हमारे पास पूंजी का घोर अभाव था।
आज दावा किया जा रहा है कि हम दुनिया की एक बड़ी अर्थव्यवस्था हैं, आर्थिक दृष्टि से दुनिया की दूसरी-तीसरी बड़ी आर्थिक शक्ति हैं, पर एक अदद कारखाना नहीं लगा सकते! जबकि देश का मूलभूत ढांचा- सड़क, बिजली, पानी आदि पहले से कहीं बेहतर है। अब दो दर्जन से अधिक कंपनियां आकर कहती हैं कि वे दर्जनों कल-कारखाने लगाएंगी और उनमें पचास हजार लोगों को रोजगार मिलेगा! और इस पर हम निहाल हुए जा रहे हैं!
सवाल नीति और नीयत दोनों का है। आजादी के बाद जिस वक्त सार्वजनिक क्षेत्र में निर्माण की नींव डाली जा रही थी, उसी दौरान संसद में ठेकेदारी प्रथा के उन्मूलन संबंधी कानून भी पारित किया गया। देश का नेतृत्व करने वाले नेताओं का संकल्प था कि श्रमिकों को भी मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने का हक है। उन्हें बेहतर मजूरी, साप्ताहिक अवकाश, चिकित्सा सुविधा, आवासीय सुविधा, बच्चों की शिक्षा आदि मिलेगी। लेकिन आज वह सपना और संकल्प नहीं रहा। अब तो सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के लिए भी सफलता का एकमात्र पैमाना मुनाफा रह गया है।
कुछ बाबू, कुछ अभियंता, थोड़े तकनीक विशेषज्ञ, बस इनके लिए नियमित नौकरी है, मजूर तो खुले बाजार में कौड़ियों के मोल बिक रहा है। कम से कम कीमत पर खरीदो, जब तक चाहे रखो, जब चाहे निकाल बाहर करो। और इसके लिए तमाम श्रम कानूनों को खत्म कर दिया गया है। मोदी गर्व से विदेशों में कहते हैं, आइए हमारे देश। बनाइए हमारे यहां अपना माल। आपकी अर्थव्यवस्था उस जगह पहुंच गई, जहां मजूर नहीं मिलेंगे, उस कीमत पर तो कभी नहीं, जिस कीमत पर हमारे यहां। कोयला उत्खनन की अनिवार्य शर्त थी कि ऊर्जा के इस स्रोत का व्यापार नहीं हो सकता है, सिर्फ कारखानों में उपयोग हो सकता है। अब एक अध्यादेश द्वारा इस प्रतिबंध को भी खत्म करने की साजिश हो रही है। तो यह है हमारी नीति।
और नीयत यह कि सब्जबाग दिखा कर गरीबों से उनका बचा-खुचा भी छीन लिया जाए। एक छोटी-सी आबदी की विलासिता और सुख-सुविधा के लिए बड़ी आबादी का गला घोंट दिया जाए। वह भी कुछ इस तरह कि उन्हें पता भी नहीं चले। जनता को सांप्रदायिकता का घूंट पिलाया जा रहा है। जो मोदी हर वक्त विकास, टेक्नोलॉजी, वाईब्रेंट गुजरात आदि की बात करते हैं, उनके दरबारी कभी धारा 370, कभी मुसलमानों को पाकिस्तान भेजने, तो कभी अधिक बच्चे पैदा करने की बात, संस्कृत बनाम जर्मन जैसी बातें करते हैं और मोदी उन सबको चलने देते हैं।
और इन हंगामों के बीच भूमि अधिग्रहण संबंधी अध्यादेश पारित हो जाता है। इसकी मुख्य बातों में शामिल है कि अब जमीन अधिग्रहण से पहले किसी से अनुमति लेने की जरूरत नहीं। बहुफसली जमीन का भी अधिग्रहण किया जा सकता है, बशर्ते वह सुरक्षा, रक्षा, ग्रामीण आधारभूत संरचना, औद्योगिक कॉरिडोर और सामाजिक बुनियादी ढांचे के लिए हो। पहले यह सुनिश्चित था कि किसी समय विशेष के अंदर अधिग्रहीत जमीन उपयोग में नहीं लाई गई, तो मूल भूधारी को लौटा दी जाएगी। अब वह बंदिश भी नहीं।
विडंबना यह कि इस अध्यादेश के जरिए एक महत्त्वपूर्ण कानून में लाए गए इस बदलाव पर टीवी चैनलों पर जो बहस चली, वह बेहद उथली थी। रवीश कुमार जैसे जनोन्मुख पत्रकार और एंकर ने एक बार भी यह सवाल नहीं उठाया कि अब पेसा कानून या समता जजमेंट का क्या होगा? पेसा कानून 1992 में संविधान के तिहत्तरवें संशोधन से अस्तित्व में आया, जो यह सुनिश्चित करता है कि आदिवासी जमीन का अधिग्रहण बिना ग्रामसभा की सहमति के नहीं हो सकता, जबकि समता जजमेंट वह ऐतिहासिक फैसला है, जो सुनिश्चित करता है कि अधिसूचित जनजातीय क्षेत्र में निजी माइनिंग कंपनियों को दी गई हर लीज गैर-कानूनी- नल ऐंड वॉयड- है।
समता जजमेंट 1997 में आया था। आंध्र प्रदेश के एक एनजीओ ने आदिवासी इलाकों में खनन और निजी कंपनियों को लीज पर जमीन देने के खिलाफ हाईकोर्ट में एक मुकदमा दायर किया था, जिस पर निर्णय देते हुए तीन जजों की पीठ ने यह फैसला सुनाया था। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि सामुदायिक संसाधनों की सुरक्षा और रखरखाव के लिए ग्रामसभाएं अधिकृत हैं। खनिज संपदा का दोहन सिर्फ आदिवासी व्यक्तिगत रूप से या कोआपरेटिव बना कर कर सकता है। कोर्ट ने न सिर्फ पहले हुई लीज और खनन को अवैध करार दिया, बल्कि भविष्य में आदिवासियों की जमीन पर किसी निजी कंपनी या व्यक्ति द्वारा खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
ऐसा नहीं कि सरकार ने इस कानून में संशोधन की कोशिश नहीं की। सन 2000 में सर्वोच्च न्यायालय में अपील की गई, लेकिन उसने राज्य और केंद्र सरकार के संशोधन-सुधार आवेदन को अस्वीकार कर दिया। बाद में आंध्र सरकार मामला आदिवासी परामर्शदात्री समिति के समक्ष ले गई, लेकिन जनविरोध को देखते हुए उसे वापस ले लिया। नियमगिरि के आदिवासियों ने इस फैसले के आलोक में बाक्साइट के उत्खनन का विरोध किया और सरकार सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के आलोक में ग्रामसभाओं के पास अनुमति के लिए गई और उन्होंने एक मत से इसे खारिज कर दिया। लेकिन बदलाव की काशिशें जारी रहीं।
दसवीं पंचवर्षीय योजना के प्रारूप में समता जजमेंट को कोयला खनन की राह में रुकावट माना गया। बावजूद इसके पूर्ववर्ती केंद्र सरकारों ने इस फैसले को अमान्य करने का साहस नहीं किया। मगर अब मोदी ने इस कानून को संसद के बाहर एक अध्यादेश लाकर बदलने का प्रयास किया। यह है ‘मेक इन इंडिया’ का गूढ़ार्थ। वाइब्रेंट गुजरात का मकसद। जनता के समर्थन से सत्ता में आओ और जनता की छाती में ही कील ठोंको। वह भी उसकी तरक्की और विकास के नाम पर।

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