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‘धर्म को टकराव की वजह नहीं बनाया जा सकता’

धर्मांतरण जैसे मुद्दों पर चल रही मुहिम के बीच राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ‘‘उन्माद से भरी प्रतिस्पर्धा’’ की निंदा की और कहा कि धर्म को टकराव की वजह नहीं बनाया जा सकता।

संविधान को लोकतंत्र की पवित्र पुस्तक बताते हुए प्रणब ने कहा कि भारतीय सभ्यता ने प्राचीन काल से ही बहुलता का सम्मान किया है, सहनशीलता का पक्ष लिया है और अलग-अलग समुदायों के बीच सद्भाव को बढ़ावा दिया है।

भारत के 66वें गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘बहरहाल, इन मूल्यों की हिफाजत बेहद सावधानी और मुस्तैदी से किए जाने की जरूरत है। लोकतंत्र में निहित स्वतंत्रता कभी-कभी उन्माद से भरी प्रतिस्पर्धा के रूप में एक ऐसा नया कष्टप्रद परिणाम सामने ले आती है जो हमारी परंपरागत प्रकृति के खिलाफ है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘वाणी की हिंसा चोट पहुंचाती है और लोगों के दिलों को घायल करती है। गांधी जी ने कहा था कि धर्म एकता की ताकत है। हम इसे टकराव का कारण नहीं बना सकते।’’

राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘भारतीय संविधान लोकतंत्र की पवित्र पुस्तक है। यह ऐसे भारत के सामाजिक-आर्थिक बदलाव का पथप्रदर्शक है, जिसने प्राचीन काल से ही बहुलता का सम्मान किया है, सहनशीलता का पक्ष लिया है और अलग-अलग समुदायों के बीच सद्भाव को बढ़ावा दिया है।’’

राष्ट्रपति की टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब कुछ दक्षिणपंथी पार्टियां ‘घर वापसी’ का मुद्दा उठाकर, महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का महिमा-मंडन कर, हिंदुओं की जनसंख्या बढ़ाने के लिए महिलाओं को 10-10 बच्चे पैदा करने की नसीहत देकर विवाद पैदा कर रही हैं और कुछ मंत्री भी अल्पसंख्यकों के बारे में अनुचित बयान देते रहे हैं।

भारत को अक्सर ‘‘सौम्य शक्ति’’ करार दिए जाने पर राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘भारत की सौम्य शक्ति के बारे में बहुत कुछ कहा जाता है। परंतु इस तरह के अंतरराष्ट्रीय परिवेश में, जहां बहुत से देश धर्म आधारित हिंसा के दलदल में फंसते जा रहे हैं, भारत की सौम्य शक्ति का सबसे शक्तिशाली उदाहरण धर्म एवं राज-व्यवस्था के बीच संबंधों की हमारी परिभाषा में निहित है।’’

प्रणब ने कहा, ‘‘हमने सदैव धार्मिक समानता पर अपना भरोसा जताया है, जहां हर धर्म कानून के सामने बराबर है तथा प्रत्येक संस्कृति दूसरे में मिलकर एक सकारात्मक गतिशीलता की रचना करती है। भारत की प्रज्ञा हमें सिखाती है : एकता ताकत है, प्रभुता कमजोरी है।’’

आतंकवाद की समस्या पर प्रणब ने यह कहते हुए पाकिस्तान पर परोक्ष रूप से निशाना साधा कि भारत अपने उन दुश्मनों की ओर से गाफिल रहने का जोखिम नहीं उठा सकता जो समृद्ध और समतापूर्ण देश बनने की दिशा में हमारी प्रगति में बाधा पहुंचाने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।

राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘विभिन्न देशों के बीच टकराव ने सीमाओं को खूनी हदों में बदल दिया है तथा आतंकवाद को बुराई का उद्योग बना दिया है। आतंकवाद तथा हिंसा हमारी सीमाओं से घुसपैठ कर रहे हैं। यद्यपि शांति, अहिंसा तथा अच्छे पड़ोसी की भावना हमारी विदेश नीति के बुनियादी तत्त्व होने चाहिए, परंतु हम ऐसे शत्रुओं की ओर से गाफिल रहने का जोखिम नहीं उठा सकते जो समृद्ध और समतापूर्ण भारत की ओर हमारी प्रगति में बाधा पहुंचाने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।

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