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36 साल से पीड़ित इन बैंक कर्मियों को कब मिलेगा न्याय ?

लखनऊ। 1978 में उ0प्र0 राज्य सहकारी विकास भूमि बैंक की शाखा-नकुड़, जनपद-सहारनपुर में घटित धन अपहरण/गबन की आपराधिक घटना में गबन में लिप्त लोगों द्वारा साजिशन फंसाये गए चंद्रभान दुबे का कार्य एवं आचरण बैंक हित में अच्छा व लाभकारी प्रमाणित हुआ यह खुलासा करीब 30 साल बाद जन सूचना अधिकार के तहत हुआ।
यह जानकारी गबन का कलंक लिए पीडि़त बैंक कर्मी को तब मिली जब न्याय की लड़ाई लड़ते-लड़ते उसके काले बाल सफेद हो चुके थे। 30 वर्षों के अनवरत संघर्षों के पश्चात ‘‘नकुड गबन काण्ड वर्ष 1978’’ के इस प्रकरण में बैंक के रजिस्टर्ड पत्र दिनांक 17-03-2009 के माध्यम से उसे जब यह सूचना उपलब्ध करायी गयी तो एकबारगी उसे ऐसा लगा कि वह देर से ही सही किन्तु इस लड़ाई को जीत गया क्योंकि इस पत्र में उसके कार्य एवं आचरण से बैंक का कोई अहित न होना बल्कि लाभ ही होना बताया गया था किन्तु इसे दुर्भाग्य कहा जाये या कि बौनी कानून व्यवस्था जिसके चलते आज भी वह वहीं खड़ा है जहाँ 36 साल पहले खड़ा था, बताते चलें कि भ्रष्ट बैंक अधिकारियों के कोपभाजन का शिकार अकेले दुबे ही नहीं हुए बल्कि ऐसे कई बैंक कर्मी जो कि बैंक में व्याप्त भ्रष्टाचार से खुद को दूर रख ईमानदारी की नौकरी करना चाहे उन सभी के साथ बैंक अधिकारियों ने षडयंत्र रच सस्पेंशन आर्डर थमा बैंक के बाहर का रास्ता दिखा दिया। श्री दुबे की तरह न्याय के लिए दर-दर भटकते इन बैंक कर्मियों में कुछ तो न्याय की लड़ाई लड़ते-लड़ते अल्ला को प्यारे को गए किन्तु उन्हें न्याय नहीं मिल सका। अब उनके बच्चे इस लड़ाई को लड़ रहे हैं। ऐसे ही एक पीडि़त जो कि इस लड़ाई को लड़ते हुए न्याय न पाने के सदमें में दुनिया को अलविदा कह गए। उन्हांेने भी करीब 30 सालों तक न्याय पाने के लिए हर जगह भागदौड़ की। नाम था कामता प्रसाद शर्मा, अब उनकी मौत के बाद उनके बेटे शशांक शर्मा द्वारा न्याय की गुहार बैंक प्रशासन तथा शासन सहित प्रदेश के महामहिम राज्यपाल से लगाई जा रही है। इसी तरह बैंक कर्मचारी भाष्कर चन्द्र उपाध्याय को भी एक ही प्रकरण में दो बार सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। इनका दोष मात्र इतना था कि इन्होंने बैंक अधिकारियों द्वारा किये गए घोटालों की जांच कराये जाने की मांग की। चूंकि ये उस समय कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष थे। उनके इस कृत्य से खफा होकर बैंक अधिकारियों ने साजिश रचते हुए हुसैनगंज थाने में भास्कर उपाध्याय सहित अन्य 10 बैंक कर्मियों के खिलाफ 25-04-1981 को एक संयुक्त प्राथमिकी दर्ज करा दी जिसमें वे अभी तक बैंक अधिकारियों के कारनामों के खिलाफ न्याय के लिए दर-दर भटक रहे हैं किन्तु दुर्भाग्य यह कि नक्कार खाने में तूती की आवाज सुनता कौन है?
पीडि़त चन्द्रभान दुबे बताते हैं कि उनके द्वारा पत्र दिनांक 25-01-1979 व पत्र दिनांक 23-02-1979 तथा पत्र दिनांक 29-03-1979 के जरिए गबन की सम्पूर्ण जानकारी बैंक अधिकारियों को उपलब्ध कराई गयी, जिस पर तत्परता से कार्यवाही भी की गयी और गबन के धन को बैंक को वापस दिलाया जा सका और आगे बैंक में गबन होने से रोका भी जा सका। किन्तु भाग्य की विडम्बना यह है कि गबन का खुलासा पत्रों द्वारा करना ही इनके जीवन के लिए अभिशाप बन गया। परिणाम यह हुआ कि बैंक अधिकारियों द्वारा उल्टे दुबे को ही गबन का दोषी मान लिया गया। एक साजिश के तहत चक्रव्यूह रच करके दिनांक 27-06-1980 को एक चार्जशीट दे दी जिसमें श्री दुबे के ऊपर धन अपहरण करने, कदाचार करने व अनियमित कार्य करने का मिथ्या आरोप लगाया गया और अनुशासनिक कार्यवाही आरम्भ हुई। जिसमें वर्ष 1983 से वर्ष 1999 की अवधि में 5 बार जांच कराई गयी, तथा बैंक के 4 प्रबन्ध निदेशकों के द्वारा दुबे को 4 बार दण्डित किया गया, 2 बार सेवा से बर्खास्त भी किया गया। विभागीय साजिशों, जांचों तथा दण्डात्मक कार्यवाहियों को झेलते हुए श्री दुबे ने वर्ष 1968 से वर्ष 1999 तक लगातार 31 वर्षों तक अपने दायित्वों एवं कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए बैंक की सेवा की, किन्तु अचानक ‘‘नकुड़ गबन काण्ड वर्ष 1978’’ के इसी प्रकरण में दिनांक 9 मार्च, 1999 को उन्हें दोबारा सेवा से बर्खास्त कर दिया गया, जबकि यह प्रकरण 31-12-1989 को ही पूर्ण रूप से समाप्त हो चुका था और जांच/परीक्षण में श्री दुबे का कार्य एवं आचरण बैंक के हित में अच्छा व लाभकारी प्रमाणित हो चुका था।
इसी प्रकार वर्ष 1981 में बैंक द्वारा कराई गई संयुक्त प्राथमिकी के प्रकरण में भाष्कर चन्द्र उपाध्याय व कामता प्रसाद शर्मा को भी दिनांक 09-03-1999 को दुबारा सेवा से बर्खास्त कर दिया गया, जबकि इनके साथ साथ अन्य सभी कर्मचारियों को जूडिशियल मुंसिफ मजिस्ट्रेट, लखनऊ के आदेश दिनांक 31-08-1988 द्वारा निर्दोष घोषित किया जा चुका था, और इनके प्रकरण में अन्तिम निर्णय लेकर प्रबन्ध निदेशक के आदेश दिनांक 25-10-1989 द्वारा सभी लाभों के साथ इनको सेवा में बहाल किया जा चुका था जिससे इनके प्रकरण का भी पूर्ण पटाक्षेप हो चुका था।
माननीय हाईकोर्ट और माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के साथ बैंक अधिकारियों ने खेला खेलः- बैंक अधिकारियों ने एक सुनियोजित साजिश के तहत सब कुछ जानते-बूझते हुए भी इन कर्मचारियों को 3 अलग-अलग अस्पष्ट आदेशों के द्वारा एक साथ दिनांक 20/22-07-1983 को सेवा से बर्खास्त कर दिया। जिसे चुनौती देने पर माननीय हाईकोर्ट में अपने आदेश दिनांक 24-02-1984 द्वारा उसे नान-स्पीकिंग आर्डर करार देकर निरस्त कर दिया और अपने आदेश में कहा कि न तो इन आदेशों में किसी आरोप का कोई उल्लेख है और न इनके साथ कोई जांच रिपोर्ट ही संलग्न की गयी है जिससे यह बात स्पष्ट हो सके कि कर्मचारी किस प्रकार से दोषी हैं। विभाग स्वतंत्र है, यदि चाहे तो पुनः जांच करा सकता है। विभाग द्वारा माननीय हाईकोर्ट के आदेश के साथ दोहरा खेल खेला गया। एक तो उसे मान लिया गया और सभी कर्मचारियों को 26-03-1984 को सेवा में पुनसर््थापित कर दिया गया, तो दूसरी ओर उसे माननीय सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दे दी गयी। जिसमें माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश दिनांक 19-04-1985 द्वारा विभाग को 3 माह के अन्दर जांच कराने की समय-सीमा निर्धारित कर दी। नकुड़ गबन कांड के प्रकरण में चन्द्रभान दुबे के खिलाफ दिनांक 5 जून, 1985 को पुनर्विभागीय जांच का आदेश जारी हुआ। दूसरी जांच रिपोर्ट दिनांक 10-09-1985 के अनुसार श्री दुबे के खिलाफ कोई भी आरोप साबित नहीं हुआ किन्तु फिर भी बैंक के दूसरे आदेश दिनांक 04-07-1986 द्वारा श्री दुबे की दो वार्षिक वेतन वृद्धियां 5 साल के लिए रोक दी गयी हैं। जिसे चुनौती देने पर तीसरी बार संशोधित दण्ड के रूप में बैंक के आदेश दिनांक 05-12-1987 द्वारा श्री दुबे की चरित्र पंजिका में केवल उदासीन रहने का विपरीत उल्लेख किया गया। जिसे पुनः चुनौती देने पर सभापति/प्रशासक महोदय के आदेश दिनांक 31-12-1989 द्वारा उक्त विपरीत प्रविष्टि को भी तथ्यहीन मानते हुए अवलोपित कर दी गयी। इस प्रकार इस घटना का पूर्ण पटाक्षेप हो गया, और श्री दुबे के खिलाफ की गयी सा%

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