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जीना हुआ दुश्वार सभी को वैक्सीन का इंतज़ार

कोरोना संकट काल ने क्या क्या ना दिखा दिया,प्रवासी मजदूरों की असहनीय पीड़ा,पेट की भूख,असहाय होती जिंदगियां,रोती माएं विलखते बच्चे,आंसूं बहाते मजदूर,फंदे पर झूलते किसान,गरीब असहाय जो अपना बोझ भी नहीं उठा सकते थे उन बेचारों ने  पेट की भूख के चलते सर पर कैसे कैसे बोझ उठा लिए.भले ही इस सच्चाई को कुछ लोग स्वीकार ना करें लेकिन कोरोना महामारी के इस संकट काल ने जो नज़ारे दिखाए है वो ना केवल हमारे सिस्टम की ही बल्कि देश और दुनिया के हुक्मरानों और सियासतदानों की भी पोल खोलते दिखते हैं दीर्घकालिक वैश्विक संकट का रूप ले चुकी इस संक्रामक बीमारी कोविड-19 से लड़ने के लिए बनाई और अपनाई गयी नीतियां भी अभी तक इसकी रोकथाम के लिए अपर्याप्त ही सिद्ध हुई हैं ऐसे में अब बची जिदगियों की निगाहें इसकी वैक्सीन के शीघ्र आने की टकटकी लगाये हुए हैं। दुनिया की अनेक प्रतिष्ठित फार्मा एवं बायोटेक कंपनियों ने कोविड-19 की वैक्सीन तैयार करने के लिए युद्धस्तर पर प्रयास शुरू किये हुए हैं. यूरोप में तो इसके लिए मौजूदा नियमों में ढील देकर शोधकर्ताओं को निजी कंपनियों के साथ मिलकर काम करने की छूट भी दे दी गयी है भारत में भी अभूतपूर्व गति से शोध और अध्ययन के साथ वैक्सीन की तैयारी व परीक्षण का काम जारी है इनमें ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन, जॉनसन एंड जॉनसन जैसी नामचीन अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के अलावा भारत के जायडस कैडिला और कोडोजेनिक्स एंड सिरम इंस्टीट्यूट भी शामिल हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कोरोना वायरस ने जिस तरह से दुनिया को अपने शिकंजे में जकड़ा है उससे जल्‍द छुटकारा पाना आसान नहीं लगता है इसकी वजह से हुए लॉकडाउन ने तो देशों की आर्थिक कमर ही तोड़ कर रख दी है इसमें सबसे अधिक नुकसान उन गरीबों का हुआ है जिनके दिन की शुरुआत ही रोजी-रोटी की तलाश से होती थी और अब तो आलम यह है की मध्यम वर्ग भी बेहद परेशानी में आ गया है अब इस वर्ग भी घुटन का एहसास बढ़ रहा है, अंतरराष्‍ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट इस बात का खुलासा करती है कि पूरी दुनिया में रिटेल और मैन्‍युफैक्‍चरिंग से जुड़े कई कारोबार बंद होने की स्थित में हैं इसकी वजह से दुनियाभर में 1.6 अरब श्रमिकों की रोजी-रोटी पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अंतरराष्‍ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक पूरी दुनिया में करीब 330 करोड़ कामगार हैं जो इस तरह के छोटे बड़े उद्यमों से जुड़े हुए हैं इन सारी स्थितियों के बाद अब हर किसी की नज़र वैक्सीन पर टिकी हुई हैं ! 

इस बीच रूस ने यह ऐलान करके दुनिया को अचंभित कर दिया है कि उसके चिकित्साविदों द्वारा बनाई गई वैक्सीन शत-प्रतिशत सफल रही है और कुछ औपचारिकताएं पूरी करने के बाद अक्टूबर में सभी नागरिकों को यह वैक्सीन लगाने का काम शुरू कर दिया जाएगा। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस पर संदेह जताया है कि इतने कम समय में तैयार की गई वैक्सीन पूरी तरह कारगर होगी भी या नहीं …?  

इसी तरह भारत में भी अक्सर ख़बरें आती रहती हैं कि कुछ ही महीनों में हमें वैक्सीन मिल जाएगी लेकिन क्या यह प्रक्रिया वास्तव में इतनी आसान है यह अभी सवाल ही बना हुआ है ,,,? 

आमतौर पर वैक्सीन का परीक्षण पहले छोटे फिर बड़े जानवरों पर किया जाता है। इनमें सफलता मिलने के बाद तीन चरणों में इंसानों पर परीक्षण किया जाता है। सबसे पहले कुछ चुनिंदा स्वस्थ लोगों पर इसका प्रभाव देखा जाता है। इसमें सफलता मिलने के बाद बीमारी से प्रभावित क्षेत्रों में कुछ अधिक संख्या में लोगों पर परीक्षण होता है। जब इस चरण में भी सकारात्मक परिणाम मिलते हैं, तो अंततः बड़ी आबादी पर इसके परिणाम देखे जाते हैं। प्रत्येक चरण में महीनों का समय लग सकता है। आपातकालीन परिस्थितियों में इस प्रक्रिया को तेज़ कर दिया जाता है। फिर भी, बाज़ार में वैक्सीन लाने से पहले कई बार परीक्षण करना अनिवार्य है। साधारणतया दस में से एक वैक्सीन ही अंतिम रूप से स्वीकृति पाने में सफल हो पाती है। इसलिए जितनी अधिक विधियों से वैक्सीन तैयार की जाएगी, उतनी ही सफलता की संभावना भी बढ़ जाएगी। 

अभी हम जिससे जूझ रहे हैं, वह एक नया वायरस है और वैज्ञानिकों के पास इसके गुणधर्म के बारे में सीमित जानकारी उपलब्ध है। ऐसे में, पूरी तरह कारगर वैक्सीन तैयार करने में स्वाभाविक रूप से कठिनाइयां सामने आएंगी। आज जिन वैक्सीनों को लेकर विज्ञान आश्वस्त है, उन्हें भी इस स्तर तक पहुंचाने में लंबा समय लगा है। पोलियो की वैक्सीन 20वीं शताब्दी के आरंभ में अपने प्रभावी रूप में आई थी, जबकि 1955 में जोनास साल्क और 1960 में एल्बर्ट ब्रूस ने पोलियो की वैक्सीन विकसित कर ली थी। इनका व्यापक स्तर पर व्यावसायिक उत्पादन नहीं हो पाता था। यह हालत 1980 तक बनी रही थी। इसके बाद वैज्ञानिकों ने बड़े पैमाने पर वैक्सीन के उत्पादन का तरीका खोजा। जापानी बुखार हो या टीबी, वैक्सीनों के मानव परीक्षण से व्यापक उत्पादन तक पहुंचने में दशकों का समय लग जाता था।

अनेक वैक्सीनें शुरुआती चरणों में ही असफल हो जाती हैं। अगर किसी वैक्सीन को सभी चरणों में सफलता मिल भी जाए, तो नियामक इकाइयां उसका भलीभांति अध्ययन करने और उसे सार्वजनिक प्रयोग की स्वीकृति देने में पर्याप्त समय लेती हैं। इस समय इंसान के शरीर में जैविक वैक्सीन डालने के लिए कोई स्पष्ट नियम भी नहीं हैं। ऐसे में विभिन्न देशों और विश्व स्वास्थ्य संगठन को मिलकर प्रॉटोकॉल बनाना होगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि भले ही इंसानों पर परीक्षण शुरू हो गया है, लेकिन व्यावसायिक उत्पादन में नियमों की अस्पष्टता और लाइसेंस की शर्तें बाधा पहुंचाएंगी। शायद यह कहना ठीक होगा कि सबसे अनुकूल परिस्थितियों में भी कोविड-19 की वैक्सीन इस वर्ष में उपलब्ध नहीं हो पाएगी। 

परीक्षण और आधिकारिक स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद भी चुनौती समाप्त नहीं होती। इन सबके बाद वैक्सीन का उत्पादन इतने बड़े पैमाने पर करना होता है, जो महामारी को जड़ से मिटाने के लिए पर्याप्त हो। कोविड-19 के मामले में इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए कई संगठनों द्वारा आर्थिक सहायता मुहैया कराई जा रही है। इनमें 2017 में गठित नॉर्वे की संस्था सीईपीआई का नाम उल्लेखनीय है, जिसे बिल गेट्स की संस्था द्वारा भी संरक्षण प्राप्त है।

इस आपदा से उबरने के लिए जहां पूरा विश्व एक साथ जूझता हुआ दिखाई दे रहा है, वहीं इस बात की भी आशंका जताई जा रही है कि वैक्सीन तैयार होने के बावजूद सभी वर्गों की पहुंच में आसानी से नहीं आ पाएगी। विशेषज्ञों को डर है कि अमीर देशों द्वारा वैक्सीन की जमाखोरी के परिणामस्वरूप ‘इम्यूनाइजेशन गैप’ की स्थिति आ सकती है। बिल और मेलिंडा गेट्स की पहल पर दुनिया के 73 सबसे ग़रीब देशों को प्रतिरक्षा मुहैया कराने के उद्देश्य से निजी और सरकारी संस्थानों की साझेदारी में गठित ग्लोबल अलायंस फोर वैक्सीन एंड इम्यूनाइजेशन (गावी) के सीईओ सेठ बर्क्ले का कहना है, “भले ही अभी वैक्सीन उपलब्ध नहीं है, लेकिन हमें अभी से इस पर चर्चा शुरू करनी होगी। चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि यह वैक्सीन अमीर देशों के ज़रूरतमंद लोगों के साथ ही ग़रीब देशों के ज़रूरतमंद लोगों तक भी पहुंचे।इम्युनाइजेशन गैप का एक बड़ा उदाहरण हेपेटाइटिस-बी की वैक्सीन में दिखता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, हेपेटाइटिस-बी का वायरस लिवर कैंसर की वजह बनता है और यह एचआईवी के मुकाबले 50 गुना अधिक संक्रमणशील है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि 2015 में दुनिया के 25.7 करोड़ लोग इस संक्रमण का शिकार थे। इस बीमारी के ख़िलाफ़ इम्युनाइजेशन अमीर देशों में 1982 से ही शुरू हो गया था, लेकिन 2000 तक दुनिया के सबसे ग़रीब देशों में से 10 फ़ीसदी को भी यह वैक्सीन नहीं मिली थी।

वैक्सीन तैयार करने में बड़े पैमाने पर रिसर्च की ज़रूरत होती है और इसका ख़र्च भी अधिक आता है। सरकारी स्वास्थ्य एजेंसियां इन वैक्सीनों की सबसे बड़ी ग्राहक होती हैं, जो निजी ग्राहकों के मुकाबले कहीं कम पैसे में इन्हें ख़रीदती हैं। इस तरह, वैक्सीन का निर्माण कंपनियों के लिए बहुत लाभदायक नहीं होता। 2018 में फार्मा कंपनियों का वैश्विक व्यापार 1.2 लाख करोड़ डॉलर का था, लेकिन इसमें वैक्सीन की हिस्सेदारी केवल 40 अरब डॉलर की थी। यह अंतर ऐसी वैक्सीनों के मामले में और भी बढ़ जाता है, जिन्हें जीवन में केवल एक बार लेना होता है। 

अमेरिका में 1967 में वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों की संख्या 26 थी, जो 2004 में घटकर केवल 5 रह गई। इन आंकड़ों से यह समझ आता है कि वैक्सीन को विकसित करना इलाज वाली दवाओं की तुलना में अधिक जोख़िम भरा क्यों होता है। कम मुनाफ़े के बावजूद फाइजर और मर्क जैसी बड़ी फार्मा कंपनियां पूरी दुनिया में वैक्सीन की 80 फ़ीसदी बिक्री करती हैं। ऐसा हो सकता है कि आख़िर में बड़ी कंपनियां कोविड-19 की वैक्सीन की बिक्री में एक बड़ी भूमिका निभाएं। इसके लिए वैक्सीन बनाने वाले संस्थानों को करोड़ों डोज के लेवल पर पहुंचने के लिए किसी फार्मा कंपनी के साथ साझेदारी करनी होगी। ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन पहले ही कई कंपनियों के साथ साझेदारी कर चुकी है। वैक्सीन की कालाबाज़ारी का एक विस्तृत इतिहास रहा है, जिसका स्वरूप आज भी कुछ बदला नहीं है। कुछ महीनों पहले जर्मन समाचार-पत्र ‘वेल्ट एम सोंटैग’ ने वरिष्ठ सरकारी अफ़सरों के हवाले से छापा था कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जर्मन बायोटेक्नॉलॉजी कंपनी क्योरवैक द्वारा विकसित की जा रही एक वैक्सीन को ख़ास तौर पर अमेरिका के लिए हासिल करने की कोशिश की थी, हालांकि वे इसमें नाकाम रहे। ऐसे में आवश्यक है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य नियामक इकाइयां इस संबंध में कड़े नियम बनाएं और सभी देशों से वैमनस्य तथा स्वार्थ की भावना त्यागकर एकजुटता से इस संकट का मुक़ाबला करने की अपील करें !

 

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