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अब आचार्य श्री होरी के रूप में नज़र आयेंगें राजकुमार सचान “होरी”

प्रसिद्ध कवि,लेखक,साहित्यकार,समाजसेवी,संपादक,संचालक,प्रखर वक्ता पूर्व प्रशासनिक अधिकारी राजकुमार सचान “होरी”पारिवारिक जीवन से मुक्ति लेकर  जिएंगे सन्यासी जीवन, यह जानकारी श्री होरी द्वारा इसी सप्ताह कानपुर व लखनऊ यात्रा के दौरान दी गयी उन्होंने बताया कि शेष जीवन जन जन के धार्मिक,दार्शनिक,आध्यात्मिक और सामाजिक एवं बौद्धिक उत्थान के लिए समर्पित होगा । वे आगामी गुरु पूर्णिमा,बुद्ध पूर्णिमा 5 जुलाई 2020 को  नैमिषारण्य सीतापुर में सन्यासी जीवन में प्रवेश कर संत वेश धारण करेंगें  धर्म,दर्शन,संस्कृति,और विभिन्न विषयों के प्रकांड विद्वान और चिंतक एवं साधक  अब आचार्य श्री होरी के नव रूप में जाने जायेंगें ।

बताते चलें कि आचार्य श्री होरी का जीवन बाल्यकाल से ही बेहद सामान्य सा रहा,बचपन में ही  माँ का साया उठ जाने से माँ की ममता को भी पिता श्री स्वर्गीय श्री होरी लाल सचान जी ने उठाया उन्होंने परिवार की तमाम जिम्मेदारियों के वावजूद श्री होरी को उच्चशिक्षा ग्रहण कराने में महती भूमिका निभाई परिणाम स्वरुप श्री होरी ने इलाहाबाद में उच्चशिक्षा लेने के दौरान ही  प्रथम प्रयास में पीसीएस परीक्षा उत्तीर्ण कर ना केवल जिले का नाम रोशन किया बल्कि पिता के सपनो को भी साकार कर दिखाया और फिर प्रशासनिक अधिकारी के रूप में प्रदेश में जिस जिले में भी उन्हें जो जिम्मेदारी दी गयी उसे उन्होंने ना केवल बखूबी अंजाम ही दिया बल्कि आम जनों के बीच वो एक तेज़ और स्वक्षछवि की पहचान भी छोड़ जाते रहे तमाम व्यस्तता    और भागदौड़ के बावजूद उनकी भिन्न भिन्न किताबों को पढ़ने की रूचि जारी रही इसी बीच पिता का साया भी उठ गया यहीं से पिता के नाम का टाइटल होरी को अपने नाम से जोड़ उनकी यादों को जीवन देते हुए श्री राजकुमार ‘होरी’ ने किताबों को लिखना शुरू किया कुछ किताबों के बाज़ार में आते ही बड़े बड़े काव्य मंचों से आमंत्रण का सिलसिला शुरू हो गया अब प्रशासनिक अधिकारी राजकुमार सचान के रूप में कम बल्कि साहित्यकार,कवि,लेखक  के रूप में “होरी” जी की पहचान साहित्यकारों में चर्चा का विषय बनने लगी सरकारी आयोजनों में भी इन्हें कविता पाठ के लिए बुलाया जाने लगा ! सेवा में रहते हुए आप जब भी यात्रा व सफ़र में होते थे लेखन करते रहते थे देखते देखते आपकी दर्जनों किताबें प्रकाशित होकर आ गयी उनमे कुछ किताबों को बेहद लोक प्रियता मिली जिनमे ‘प्रथ्वी की पीर’ ‘ क्यों कि मैं मुर्गा हूँ‘ “होरी दोहावली” ने तो साहित्य जगत में ‘होरी’ की ख्याति में चार चाँद लगा दिए साफगोई ऐसी कि कई बार कविता पाठ के बाद तत्कालीन सत्तासीन लोगों के कोपभाजन का शिकार भी हुए  लेकिन काव्य में व्यवस्था और सिस्टम की खामियों को धार देने में कमीं नहीं आने दी. सेवा मुक्त होने के बाद से ही श्री होरी जी साहित्य प्रेमियों को दार्शनिक और अध्यात्मिक विचारों  के अलावा बौद्धिक प्रेरणा देकर लोगों के जीवन की दशा और दिशा बदलने में जुट गए अब उनका ज्यादातर समय लोगों को बौद्धिक विकास और जागरूकता के लिए  समर्पित रहने लगा इस बीच बदलता भारत,बौद्धिक महासंघ,जैसे प्रकल्पों को स्थापित कर बड़ी संख्या में लोगों को जागरूक किया अब वो पूरी तरह से संत जीवन जीने का संकल्प ले रहे हैं इस निर्णय के सन्दर्भ में श्री होरी जी कहते हैं यह जीवन मेरे लिए नया जन्म लेने जैसा होगा।

बताते चलें की  ‘ बौद्धिक आश्रम’  सोहरामऊ,उन्नाव एनएच 27 लखनऊ कानपुर हाईवे में स्थापित हो रहा है जहां से आचार्य श्री होरी देश विदेश में धार्मिक,दार्शनिक,आध्यात्मिक ,सामाजिक अलख जगाएंगे ।

इस आश्रम में “शास्त्रार्थ सभागार ” भी होगा जिसमें विभिन्न दार्शनिक ,बौद्धिक,सामाजिक तथा अन्य विषयों में शास्त्रार्थ होंगे । उनका मानना है कि शास्त्रार्थ इस  देश की प्राचीन बौद्धिक ,तार्किक परंपरा रही है ।  इसके द्वारा विद्वानों ,दार्शनिकों ,धर्माचार्यों के मध्य सदियों से वैचारिक ,दार्शनिक ,बौद्धिक उत्थान होते रहे हैं जिनका लाभ समय समय पर देश और दुनिया को मिलता रहा है  ।  कुल मिलाकर हम आचार्य श्री होरी के विचार जानेंगे गुरु पूर्णिमा ,बुद्ध पूर्णिमा  5 जुलाई को और आप तक पहुंचाएंगे ।

श्री राज कुमार सचान “होरी” का जन्म एक किसान परिवार में ग्राम देवमनपुर , घाटमपुर, कानपुर नगर में 1 मार्च 1953 को हुआ था। उनके द्वारा प्रथम प्रयास में पीसीएस परीक्षा उत्तीर्ण की गई ।साहित्यकार के रूप में लगभग दो दर्जन पुस्तकें लिखीं और देश के विभिन्न मंचों,आकाशवाणी,और टी वी चैनलों में काव्यपाठ किया लोगों के बीच खासी लोकप्रियता भी पाई  ।

 

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