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भण्डारण भरपूर फिर क्यों भूंखे ये मजदूर ?

कोरोना संक्रमण के इस संकट काल में अगर सर्वाधिक परेशानी और भूख का सामना कर रहे है तो वे हैं प्रवासी मजदूर,श्रमिक और लघु व मझोले किसान जब की देश के पास 7.77  करोड़ टन खाद्यान्न भण्डार में है गेहूं और चावल पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं, जिसका तीव्र और विवेक पूर्ण इस्तेमाल इस संकट से निजात दिलाने में पूरी तरह सक्षम है. अब जब लाक डाउन 3 मई तक बढ़ गया है तो उन प्रवासी मजदूरों,श्रमिको की हिम्मत टूट रही है जो अलग अलग राज्यों के शहरों में फस गए थे उन्हें कोरोना संक्रमण का डर तो है लेकिन उन्हें अब घर की याद के साथ साथ भूख भी तडपाने व सताने लगी है ये प्रवासी मजदूर अब दूसरों की दी गई पूड़ी-शब्जी और तहरी के सहारे ही है, मिल गयी तो ठीक ना मिली तो फिर भूखे ही सोना इनकी मजबूरी हो गयी है.अलग अलग राज्यों में फंसे ये मजदूर कमोवेस इसी तरह की बातें करते भूखे और परेशां दिख रहे हैं बिहार के मुजफ्फरपुर निवासी राजेश्वर पांच साल से गोरखपुर में रहकर रिक्शा चलाते थे बताते हैं कि दिन भर पसीना बहाकर इतने पैसे बचा लेते थे कि घर वालों को भी रोटी चलती रहती थी महीना-दो महीने में गांव भी चले जाते थे और बीवी-बच्चों से मिल आते थे अब  लॉकडाउन की वजह से गोरखपुर में ही फंस कर रह गए हैं और अब रुपये भी नहीं बचे हैं वह छात्रसंघ चौराहे के पास रहते हैं दिन भर उम्मीद भरी नजरों से लोगों को देखते रहते हैं कोई खाना दे जाए,महराजगंज के नौतनवां निवासी मजदूर छोटेलाल का भी यही हाल है वह भी गांव नहीं लौट पाए तथा इसी चौराहे पर रिक्शा चालक राजेश्वर के साथ ही बैठे रहते हैं कमोवेश यही हाल देश के विभिन्न राज्यों के शहरो में फसे सभी प्रवासी मजदूरों का भी ऐसा ही है !

मार्च के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) के गोदामों में 7.77 करोड़ टन खाद्यान्न जमा था इसमें 2.75 करोड़ टन गेहूं और 5.02 करोड़ टन चावल शामिल है . चावल के भंडारमें काफी धान भी है गौर तलब तो यह है कि यह स्थिति रबी की फसल से पहले की है,जिसकी सरकार को अभी खरीद भी करनी है.

अब ऐसे में जब कोविड-19 महामारी के चलते खाद्य समस्या का संकट देश के  सामने है तो फिर सरकार को देश के जरूरतमंदों तक खाद्द्यान्न पहुंचाने में विलम्ब नहीं करना चाहिये ! कहना ना होगा इसी सप्ताह लाक डाउन का उल्लंघन कर सूरत और मुम्बई में हजारों की संख्या में बाहर एकत्रित हुए प्रवासी मजदूरों में भूख एक बड़ा कारण रही,घरों की ओर वापस लौटने की कवायद में लगे इन प्रवासी मजदूरों को यही कहते देखा गया की 14 अप्रेल के बाद घर पहुँचने की उम्मीद थी लेकिन दुबारा लाक डाउन 3  मई तक कर दिए जाने के बाद अब जीवन बेहद संकट पूर्ण हो गया है भूखे मरने से अच्छा है घर पहुँच जाएँ.

हाला की उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रवासी मजदूरों को घर लाये जाने हेतु ठोस कदम उठाये गए हैं लगभग सभी राज्य सरकारों  की और से लोगों तक खाना पहुँचाने के कदम भी उठाये गए हैं इस काम में स्वयमसेवी संस्थाओं का भी बड़ा योगदान रहा है बावजूद इसके मजदूर भूखे हैं क्यों कि कही कही तो भोजन के लिए लोग सुबह से ही लाइने लगाकर  खड़े हो जाते है और दोपहर तक जाकर कहीं वो खाने का पैकेट पा पाते हैं ये हाल लगभग उन सभी कमजोर वर्ग के लोगों का हैं, जो अपनी आजीविका छिन जाने के साथ अचानक ही खाद्य असुरक्षा के शिकार हो गये.इस सन्दर्भ में हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर यह अनुरोध किया गया था कि न्यायलय सरकार को तुरंत इन कामगारों और उनके परिवारों की तकलीफें दूर करने का निर्देश दे. जिसमें सरकार ने अपने जवाब में निजी कंपनियों, गैर-सरकारी संगठनों तथा राज्य सरकारों के संयुक्त प्रयासों का हवाला देते हुए यह कहा कि ‘कुल मिलाकर 85 लाख से भी अधिक लोगों को खाद्य अथवा राशन मुहैया किया जा रहा है.अब सवाल यह उठता है कि एक अरब तीस करोड़ जैसी बड़ी जनसँख्या वाले इस देश में क्या 85 लाख लोगों तक खाद्यान पहुंचाकर भूंख की समस्या से निदान पाया जा सकता है कहना ना होगा संकट को देखते हुए यह नाकाफी ही है, क्योंकि खाद्य असुरक्षा झेल रहे लोगों की तादाद लगभग चार करोड़ से भी ज्यादा  है

इसलिए खाद्द्यान व राशन वितरण और ज्यादा करने की जरूरत है सरकार को इस संकट काल को देखते हुए भण्डार को पूरी तरह से खोलना होगा और वितरण में स्वयंसेवी समूहों को बड़ी संख्या में शामिल करना होगा  ताकि वे सामुदायिक रसोइयों का संचालन कर शहरी और ग्रामीण इलाकों में पकाये भोजन या सूखे राशन का वितरण कर सकें.  राशन इन्हें कम कीमत पर अथवा पूरी तरह मुफ्त में देने पर विचार करना होगा और ेंसब्जी और मसाला तेल आदि खरीदने हेतु उन्हें अतिरिक्त आर्थिक मदद भी देनी होगी तब कही जाकर इस संकट को हल किया जा सकेगा! इस वैश्विक संकट की घड़ी में राजनैतिक दलों और देश के आम लोगों को भी आपसी तालमेल सौहार्द  बनाये रखना होगा  आपदा का यह संकट काल न तो राजनीत करने का है और न हीैं हिन्दू-मुस्लिम करने का अभी शुक्रवार को  भाजपा सांसद जॉन बरला ने  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर यह  शिकायत की कि पश्चिम बंगाल सरकार सही प्रकार से लोगों में राशन का वितरण नहीं कर रही है जिसके कारण बहुत से गरीब लोग भूख से पीडि़त हैं इससे पहले बरला ने आरोप लगाया था कि राज्य की तृणमूल कांग्रेस सरकार ने उन्हें घर में नजरबंद कर दिया है जिसकी वजह से वह लोगों को राहत सामग्री वितरित नहीं कर पा रहे हैं यही नहीं बरला ने प्रधानमंत्री से त्वरित कार्रवाई की पुरजोर मांग भी की जब की राज्य के खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक ने भाजपा सांसद  के इस  आरोप निराधार और राजनीति से प्रेरित बताया हैं कहने का तात्पर्य यह की संकट के इस काल में राजनेताओं को दल से ऊपर उठकर इस महामारी से निपटना होगा राजनीत तो बाद में भी होती रहेगी

फिलहाल  जिस तरह के  सरकारी निर्देश हैं उसके अनुसार  एफसीआइ ‘खुला बाजार विक्रय योजना’ के अंतर्गत ही खाद्यान्न बेचेगा. इसकी दरें वास्तव में न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी ऊंची होने की वजह से समाज सेवी संगठन चाहकर भी ये खाद्यान्न हासिल नहीं कर पायेंगें जब कि मौजूदा समय में परेशान बेहील लोगों तक राशन हर हाल में मुहैया कराने की जरूरत है, वरना, ये खाद्य संकट स्थित को और बदतर बना सकता है भुखमरी या भोजन का ंअभाव आक्रोश की वजह बन जायेगा और लोग आक्रोशित हो सडकों पर भी उतर सकतें हैं देश में आटा मिलों की संख्या लगभग ढाई हजार है, जो सब मिल कर ढाई करोड़ टन आटा, सूजी और मैदा उत्पादित करती हैं. ऐसी कई मिलें इसलिए भी बंद पड़ी हैं, क्योंकि ट्रकों की आवाजाही ठप पड़ जाने की वजह से उनकी कार्यशील पूंजी उनके द्वारा उत्पादित बिस्किटों और ब्रेडों के रुके पड़े तैयार माल में फंस गयी है. हालांकि सरकार ने ट्रकों द्वारा ढुलाई की अनुमति देने में सक्रियता दिखायी है, पर सरकार के विभिन्न स्तरों और कई जगहों पर प्रशासनिक कार्रवाइयों में समन्वय की कमी से यह अनुमति समान रूप से लागू नहीं हो सकी है अभी हालत यह है कि तीन वर्ष पूर्व सरकार द्वारा शुरू किया गया ‘पोषण अभियान’ बीते दिसंबर तक अपने इस वर्ष के बजटीय फंड का सिर्फ 37 प्रतिशत ही खर्च कर सका था.

 

बतातें चलें कि गृह मंत्रालय ने 20 अप्रैल से कुछ आवश्यक आर्थिक गतिविधियों को चलाने की अनुमति दे दी है.क्यों कि पिछले महीने की 25 तारीख से चल रहे लॉकडाउन से किसानों और अनाज कारोबारियों में फसलों को लेकर भी बड़ी चिंता थी.गेंहू की कटाई भी होनी थी फसल पर ही किसानों की तमाम उम्मीदें टिकी होती हैं. अब सरकार के इस निर्देश से देश के खेती से जुड़े करोड़ों लोगों को बड़ी राहत मिली है. खेतों से फसल काटने के साथ अनाज की खरीद के लिए मंडियों को खोलने की भी अनुमति दी गयी है. किसानों की जरूरत का सामान बेचनेवाली दुकानें भी खुल सकेंगी. साथ ही, ग्रामीण आर्थिकी से जुड़े कारोबारों की अनुमति भी मिली है. कोरोना वायरस के व्यापक संक्रमण से जूझ रही दुनिया के पास बचाव के लिए लॉकडाउन और परस्पर दूरी बरतने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं है. इस वजह से कुछ जरूरी चीजों और सेवाओं को छोड़कर तमाम आर्थिक गतिविधियां या तो बंद हैं या बहुत आंशिक रूप से चल रही हैं. इसका नतीजा अर्थव्यवस्था की बदहाली और बढ़ती बेरोजगारी के रूप में हमारे सामने आना ही है. हालांकि कोरोना वायरस का संक्रमण से अभी भी देश के कई हिस्से बचे हुये है जहां इसने दस्तक नहीं दी है निश्चित तौर पर हम सबके लिये यह संतोषजनक है लेकिन दूसरी तरफ टेस्टिग की धीमी रफतार चिंताजनक भी इसमें कोई दो राय नहीं सरकारों और डॉक्टरों के अथक प्रयासों से महामारी पर काबू पाने में कामयाबी मिल रही है.तथा सरकार के ताजा निर्देशों में सामानों की ढुलाई के लिए गाडि़यों की आवाजाही को भी मंजूरी दी गयी है और सड़कों के किनारे परिवहन और खाने-पीने से जुड़े कारोबार भी शुरू हो जायेगें जिससे काफी राहत मिल सकेगी अभी लगभग 90 फीसदी ट्रक खड़े हैं. इनके चलने से विभिन्न वस्तुओं की राष्ट्रव्यापी उपलब्धता सुनिश्चित हो सकेगी. खेतों और सड़कों से उदासी दूर होने से देश का आत्मविश्वास और भी मजबूत होगा तथा कोरोना वायरस और उसकी वजह से पैदा हुईं विभिन्न समस्याओं से जूझने की ताकत भी बढ़ेगी. इस पहलकदमी से अर्थव्यवस्था पर पड़नेवाले नकारात्मक असर को भी कम करने में मदद मिलेगी.तो आइये हम आप भी इस संकट काल में आपसी मतभिन्नता को दूर कर एकजुटता के साथ भूखे लोगों तक जो सम्भव हो सके मदद पहुचायें लाक डाउन व फिजिकल डिस्टेन्सिंग का पूरा पालन करे !

 

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