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उठाने होंगे कारगर कदम……..

केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते कठिन दौर से गुजर रहा है, इस विषम संकट के दौर में एक छोटी भूल या गलती भयावह स्थित को जन्म दे सकती है भारत इस संकट की घड़ी में कोरोना वायरस से लड़ने में कितने विजन के साथ तैयारी में जुटा है इस बारे में राज्यों से आती ख़बरों और डाक्टरों द्वारा किये जा रहे टवीट्स बेहतर संदेश देते नहीं दिख रहें हैं.

कोरोना वायरस के फैलते संक्रमण को रोकने हेतु सरकार द्वारा देर से उठाये गए कदम और प्रारंभिक दौर में की गयी व्यस्थाओं पर तरह तरह के सवाल उठ रहें हैं २२ मार्च को जनता कर्फ्यू का पूरे देशवासियों द्वारा पालन किया जाना और फिर शायं ५ बजे थाली और घंटी बजाने के नाम पर लोगो द्वारा भीड़ जुटा जुलूस निकाला जाना इसके बाद 25 मार्च को पूरे देश को सरकार द्वारा लॉकडाउन कर दिया जाना कितना कारगर साबित होगा इस पर चर्चा करने से   पहले लाकडाउन के उपरान्त उत्पन्न स्थितियों के विषय पर चर्चा करना जरूरी है.अचानक पूरे देश में लॉकडाउन होने से सर्वाधिक प्रभावित मजदूर तबका हुआ लाकडाउन होते ही रोजीरोटी व पैसे के अभाव मजबूर प्रवासी मजदूरों का बड़ा हिस्सा पलायन को विवश हो गया चारो और अफरा तफरी सी मच गयी सडको पर मजदूरों श्रमिको की उमड़ती भीड़ को देख लगने लगा कि लाक डाउन घोषित करने के पूर्व आने वाली स्थितियों पर कोई ठोस योजना नहीं तैयार की गयी जिससे अव्यवस्थाओं का नज़ारा सड़कों से लेकर गावों तक दिखने लगा प्रवासी मजदूर घबड़ाकर अपने घरो  की और २००,५००,और हजार दो हज़ार से भी ज्यादा किलोमीटर की दूरी पैदल तय करने को मजबूर दिखे. सड़कों और हाईवे पर जुटी मजदूरों की भीड़ को उनके गंतब्य तक पहुंचाने के लिए उठाया गया कदम और हडबडाहट में जुटाई गयी बसों के इंतजाम ने लाकडाउन के उद्देश्यों पर पानी फेरने का ही काम किया जिसे ब्रेक करना पड़ा और कोरोना का संक्रमण गांवों में भी प्रवेश कर गया.

कई जगह तो गाँव के लोगों ने बाहर से आ रहे लोगो को बिना जांच कराये गाँव में प्रवेश ना देने की ठान ली नौबत यहाँ तक आ गयी की ग्रामीणों के बीच संघर्ष भी हो गए स्थित विगड़ती देख प्रदेश व जिलों की सीमाए सील कर दी गयीं किन्तु इस बीच कई दिन लाकडाउन  के गुजर गए. इन उत्पन्न अव्यवस्थाओं को देखकर लगने लगा कि लॉकडाउन के पूर्व सरकार द्वारा जो तैयारियां की जानी चाहिए थी उसमे कुछ खामियां जरूर रह गयी जिसके चलते लाकडाउन के उपरान्त खासकर मजदूर तबके को एकाएक शहरों से गांवों की ओर पलायन हुआ !

पलायन की स्थिति को देखकर लगता है कि सरकार ने लॉकडाउन बिना पूर्ण तैयारी के मात्र चार छह घंटे के नोटिस पर ही कर डाला जब कि समय रहते सरकारी तंत्र को पहले युद्धस्तर पर तैयार करना था और फिर योजनाबद्ध तरीके से कुछ समय पहले ही लॉकडाउन को चरणबद्ध ढंग से घोषित किया जाना चाहिए था। पलायन के बाद की स्थिति कोरोना वायरस को तेजी से उन  इलाकों में भी फैलने की शंका को बल देती है जहाँ की इसका अंदेशा भी ना था जो कि देश के हित में उचित नहीं कहा जा सकता.

सर्वविदित है किजिस तरह से शहरों से पलायन कर रहे लोग कंधों पर अपने बच्चों को लेकर सैंकड़ों-हजारों किलोमीटर तक सड़कों पर घर जाने की जल्दी में भूख प्यास से तड़पते नजर आये, अपनी परेशानियों व अपने छोटे-छोटे बच्चों को भूख प्यास से तड़पता देखकर उनके माँ-बाप यहाँ तक कह रहे थे कि ऐसे भूखे मरने की हालात से तो अच्छा था कि वो कोरोना की चपेट में आकर ही मर जाते, वो स्थिति इंसान व इंसानियत के लिए बेहद शर्मनाक थी. कुछ मजदूरों  ने तो रास्ते में ही दम भी तोड़ दिया और कुछ सड़क दुर्घटना के भी शिकार हुए हाला कि मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए घातक कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए मोदी जी के नेत्रत्व में केंद्र सरकार के द्वारा लगातार राज्य सरकारों से सामंजस्य स्थापित करके अब उत्पन्न हालात को पूर्ण रूप से नियंत्रण में रखने के लगातार तेज़ प्रयास किए जा रहे हैं,वावजूद इन प्रयासों के वैश्विक आपदा बन चुके कोरोना वायरस का संक्रमण इस लेख को लिखे जाने  तक करीब तीन हज़ार लोगों को अपने चपेट में ले चुका था. देश की अधिकांश जनता जहाँ अपने अनमोल जीवन को बचाने की जद्दोजहद में सरकार द्वारा घोषित 21 दिन के इस लॉकडाउन का पालन करके कोरोना वायरस से लड़ाई लड़ने की तैयारी कर रही है वही कुछ धर्मांध और मूर्ख लोग लाकडाउन का उल्लंघन कर ना केवल अपने जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहें हैं बल्कि दूसरों का जीवन भी खतरे में डाल रहे हैं ऐसे लोगो के विरुद्ध अब सरकार ने कड़े निर्देश जारी कर दंडनात्मक कार्यवाही भी शुरू कर दी है जब की कुछ लोग इस त्रासदी में भी हिदू मुस्लिम के प्रोपोगेन्डा में ही लगे हैं .

लाकडाउन के चलते  जरूरी आवश्यक सेवाओं की सर्विस को छोड़कर हर तरफ सब कुछ पूर्ण रूप से बंद है। विश्व में सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश चीन के बाद, 135 करोड़ की भारी भरकम आबादी लेकर दूसरे स्थान पर रहने वाले भारत में,अधिक जनसंख्या घनत्व के चलते कोरोना के संक्रमण को फैलाने से रोकना एक बड़ी चुनौती है. विश्व के अन्य ताकतवर देशों में कोरोना वायरस के प्रकोप की भयावहता देखकर लगता है कि हमारे यहाँ पूर्ण लॉकडाउन में भी अगर कुछ लोगों के द्वारा इसी तरह लगातार जानबूझकर या मजबूरीवश लापरवाही बरतनी जारी रही तो स्थिति बेहद ख़राब भी हो सकती है, जिसके चलते देश में एकाएक कोरोना वायरस का संक्रमण बहुत बड़े स्तर पर भी फैल सकता है ऐसा देश में मौजूदा समय में उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं व संसाधनों को देखकर भी लगता है, अगर लोगों की गलती के चलते देश में कोरोना वायरस कम्युनिटी ट्रांसमिशन के स्टेज में पहुंच गया, तो देश में इलाज के लिए जरूरी सभी तरह के संसाधनों का जनसंख्या के अनुपात के हिसाब से भारी अभाव है। उस समय सरकार के सामने सभी लोगों को इलाज उपलब्ध करवाना टेड़ी खीर ही साबित होगा।

सीमित चिकित्सा संसाधनों वाले देश भारत की सरकार को इस कोरोना आपदा पर नियंत्रण करने के लिए तुरंत धरातल पर प्रभावी इंतजाम करने होंगे। सभी देशवासियों के लिए तत्काल बेहतर चिकित्सा सुविधा व आपदा से उत्पन्न हालातों से तुरंत निपटने के लिए स्वास्थ्य संसाधनों को बढ़ाना होगा हालांकि कोरोना वायरस के इलाज व उससे संबंधित संसाधनों को एकत्र करने के लिए अभी हाल ही में केंद्र सरकार ने करीब 15 हजार करोड़ रुपये का आवंटन किया था जो आपदा के समय में लोगों का उपचार व जिंदगी बचाने में काम आयेगा, इसके साथ ही वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आपदा के समय गरीबों के लिए जीवनयापन को सरल बनाने के उद्देश्य से तरह-तरह की मदद करने वाली घोषणाएं की थीं, लेकिन यह तो आने वाला समय ही बता पायेगा की वित्त मंत्री की ये घोषणाएं धरातल पर सुचारू रूप से काम करना शुरू करके लोगों रोजीरोटी की चिंताओं का निदान कर पायेगी या नहीं

लॉकडाउन का अभी १० दिन ही गुजरा है सरकार जरूरतमंद लोगों के लिए तमाम इंतजाम भी कर रही है लेकिन धरातल पर दिहाड़ी मजदूरों, गरीबों, रिक्शा चालकों, भिखारियों, विक्षिप्त व्यक्तियों आदि के लिए भोजन  व उनकी अन्य रोजमर्रा की जरूरतों को मौके पर पहुंचकर  पूरा करना प्रेक्टिकली बहुत बड़ी चुनौती का काम है. साथ ही साथ मानव पर निर्भर रहने वाले बेजुबान जानवरों, पक्षियों के पेट भरने की व्यवस्था करना भी एक बड़ी चुनौती ही है।

कोरोना के बढ़ते मामलों से निपटने के लिए केंद्र और राज्यों की सरकारें हर संभव प्रयास में जुटी हैं बावजूद इसके लगभग राज्यों में मेडिकल सुविधा और संसाधनों का अभाव ही दिख रहा है प्रशिक्षित स्वास्थ्य अधिकारियों और पैरामेडिकल स्टाफ की भी कमी देखने को मिल रही है। पर्याप्त संख्या में वेंटिलेटर का उपलब्ध होने के सवाल पर 71 फीसदी से ज्यादा लोगों ने अपनी असहमति दिखाई है इसका खुलासा 410 युवा आईएएस अधिकारियों द्वारा फीडबैक सर्वे रिर्पोट से होता है.ख़बरों के मुताबिक पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय के राज्यमंत्री, प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग तथा अंतरिक्ष विभाग के राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने यह सर्वे रिपोर्ट जारी की है इसमें डीएआरपीजी ने एक पोर्टल के जरिए देश के विभिन्न हिस्सों में तैनात 410 जिला कलेक्टरों और दूसरे आईएएस अधिकारियों (बैच 2014-2018) और आमजन की तरफ से कही गई बातें साझा की हैं यही नहीं पीपीई (पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्यूपमेंट) को लेकर 47 फीसदी से ज्यादा और आईसीयू बेड की सुविधा को लेकर 59 फीसदी लोगों ने इनकी कमी बताई है दक्षिण दिल्ली में कोरोना की जांच को लेकर एक बड़ी बात सामने आई है सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक यहाँ ज्यादा से ज्यादा टेस्ट किये जाने चाहिए.जम्मू-कश्मीर में दवा सप्लाई की कमी देखने को मिली है। लक्ष्यद्वीप की भौगोलिक बनावट के चलते जरूरी सामान और मेडिकल उपकरणों की सप्लाई बाधित हो रही है.झारखंड के दुमका में बड़ी विचित्र स्थिति देखने को मिली है। यहां पर वेंटिलेटर हैं, लेकिन एनेस्थेटिक न होने के कारण उन्हें नहीं चलाया जा सकता। बिहार के समस्तीपुर में इंफ्रारेड थर्मामीटर की बड़ी कमी सामने आई है। नवादा में मेडिकल सुविधाएं होना तो दूर की बात है, वहां हाथ साफ करने के लिए सैनिटाइजर ही नहीं हैं। बिहार की राजधानी पटना में डॉक्टरों ने शिकायत की है कि उनके पास सर्जिकल दस्ताने, ऑक्सीजन सिलेंडर, ऑक्सीजन रेग्यूलेटर और डिस्नइफेक्टटेंट्स की कमी है। छत्तीसगढ़ में लोकल स्तर पर मेडिकल सेवाओं का ग्राफ बहुत नीचे है। वहां पर सड़कों का इतना बुरा हाल है कि एंबुलेंस और जरूरी सामानों की सप्लाई करने वाले ट्रक समय पर नहीं पहुंच पा रहे हैं।अरुणाचल प्रदेश में दिबांग घाटी जिले में लोगों को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इस जिले का निकटवर्ती कोरोना टेस्टिंग सेंटर डिब्रूगढ़ में स्थित है। सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि मेडिकल स्टाफ और एंबुलेंस की कमी तो सारे पूर्वोत्तर में देखने को मिल रही है।
असम, जिसकी पूर्वोत्तर में सबसे ज्यादा जनसंख्या है, वहां की कछार घाटी में लॉकडाउन का अच्छी तरह पालन नहीं हो रहा है। कछार घाटी में मिजोरम से आने वाले लोगों की आवाजाही जारी है। उदल गुड़ी और सोनितपुर में प्रशिक्षित स्टाफ और दवाओं की भारी कमी देखी जा रही है।

ऐसी स्थित में विचारणीय तो यह है की अमेरिका जैसा देश जहाँ सारे संसाधन हैं बावजूद इसके वह कोरोना वायरस की इस आपदा से गंभीर रूप से जूझ रहा है और भारत में तो संसाधन भी कम हैं यदि यहाँ पूरी गंभीरता से निर्णय नहीं लिए गए तो समस्या गंभीर हो सकती है यदि देश के नागरिको के हित में लिए गए निर्णयों को देखा जाए अमेरिका में अमीर गरीब सभी के लिए सरकारी हो या प्राइवेट सभी अस्पतालों में कोरोना इन्फेक्शन की जांच का खर्चा सरकार श्वयं उठा रही है. जबकि भारत में अभी तक केवल सरकारी अस्पताल में जांच मुफ्त है यहाँ सरकारी अस्पतालों की संख्या भी अन्य सम्पन्य देशों की तुलना में कम हीं हैं जहाँ सबकी जांच हो सके। जिस तरह से कोरोना संक्रमित लोगो की संख्या में इजाफा हो रहा है यदि इस पर विराम ण लगा तो  ज्यादातर मध्यवर्गीय भारतीय लोगों को प्राइवेट अस्पतालों में जाना पड़ेगा जहाँ जांच का पैसा देना ही होगा जिसकी कीमत भले ही सरकार निहित किये हो लेकिन ऐडा तो करनी ही होगी यह भी जरोरी नहीं कि वहां की जांच भरोसेमंद ही हो . यहाँ इस आपदा के दौरान जनहित में की गयी घोषणा के मुताबिक अगर आपने होम लोन आदि लिया हुआ है तो आपको 3 महीने तक EMI न देने की रहत मिलेगी यह EMI आप बाद को बैंक को ब्याज सहित अदा ही करेंगें जबकि अमेरिका में लगभग प्रमुख बैंकों में समय पर मॉर्गेज (EMI) न दे पाने पर सामान्य दिनों में लगने वाली लेट फीस को माफ़ कर दिया गया है।  और वे किसी प्रकार कानूनी कार्यवाही ( credit bureau agencies में रिपोर्ट न करने का वादा) से भी बचने का भरोसा दे रहे हैं।  जैसा कि पूरी दुनिया में हो रहा है अमेरिका में भी लाखों लोगों की नौकरियां छिन गयी हैं इसके चलते अमेरिकन संसद ने हर अमेरिकन को १२०० अमेरिकन डॉलर प्रति व्यक्ति के हिसाब से तुरंत आर्थिक सहायता दी है और अगले चार महीनों तक बेरोजगारी भत्ता देने की घोषणा भी  की है। यह १२०० अमेरिकन डॉलर हर उस अमेरिकन को मिलेगा जिसकी आमदनी ७५००० डॉलर वार्षिक तक है. यहाँ यह जानना जरुरी है कि औसत (एवरेज नहीं बल्कि मीडियन) अमेरिकन की कमाई ५६००० डॉलर वार्षिक है यानी यह सहायता सिर्फ गरीब ही नहीं बल्कि मध्यवर्ग के हर व्यक्ति को भी अमेरिका दे रहा है जब कि भारत में राज्य सरकारों ने ज्यादातर BPL यानी गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को रजिस्टर्ड मजदूरों को कुछ धनराशि देने की घोषणा की है उसमे भी एक रूपता नहीं है कुछ राज्य सरकारें कुछ दे रही है तो कुछ और आपदा राहत यहाँ लोगों को मिलती कैसे है इसे मेरी समझ से बताने की जरूरत नहीं है पीछे देखा जा चूका है कि आपदा राहत का बड़ा हिस्सा तो ब्यूरोक्रेटस, ग्रामप्रधान, और नेताओं के बीच ही गड़प कर लिया जाता है जिसका कुछ भाग ही जरूरत मंदों तक पहुँच पाता है ।

रहत के नाम पर अभी तक मध्यवर्ग के लिए कुछ भी नहीं है: न अस्पताल, न स्वास्थ्य सुविधाएं, न टेस्टिंग, और न ही कोई आर्थिक सहायता। हाँ उन्हें कोई राहत पहुंचाने के बजाय उलटे उन्हें दंड दिया जा रहा है सूत्रों की माने तो  जो सरकारी सेवा में हैं उनकी तनख्वाहों से भी कुछ  पैसे काटे गए हैं, PPF की दरें भी घटाई गयी हैं,कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ाने का भी विचार किया गया है.

कुल मिलाकर अब भी समय है भारत को स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े खासकर इस आपदा से लड़ने के लिए जरूरी संसाधनों को पर्याप्त रूप में जरूरत मंद डाक्टरों तक जितनी जल्दी हो सके उन्हें मुहैया कराये PPE की शीघ्र प्रतिपूर्ति करे और आने वाले समय में विज्ञान के प्रचार और प्रसार को आगे बढ़ाये बजाय धर्म की चासनी में डुबकी लगवाने के, ताकि लोगों में वैज्ञानिक चेतना का विकास हो।देखना यह होगा कि इस संकट और कोरोना वायरस की इस जंग में कौन सा देश बौद्धिक सम्पदा का विकास कर पाता है वह ही यह निर्धारित करेगा कि इस आपदा के बाद कौन देश पूरे विश्व का नेतृत्व करेगा।

इस हालात से निपटने के लिए हमारे समाज के समाजसेवी भामाशाह दानवीरों को जरूरतमंद के जीवन को बचाये रखने के लिए अपनी तिजोरियों के ताले खोलने का भी समय है आज जिस तरह से भारी संख्या में लोग भूखे प्यासे घरों में कैद हैं ऐसी स्थिति में मजबूर लोगों को मदद की बेहद आवश्यकता है जो देश के भामाशाहों के द्वारा दान व सेवाभाव से दूर की जा सकती  है लेकिन दानवीर भामाशाहों की दरियादिली निजी स्वार्थों की पूर्ति हेतु ना हो जो भी हो विपदा से घिरे लोगो के लिए उन तक पहुँचने वाली हो वैसे भी संसाधनों के अभाव वाले और 135 करोड़ की भारी भरकम आबादी वाले इस देश को कोरोना वायरस से लड़ने और इस संकट से उबरने के लिए धन तो चाहिए ही अब धन व्यय कितना होगा इसका आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी। ऐसे में सभी का यह दायित्वा बनता है कि वह इस संकट की घड़ी में सरकार के साथ खड़ा हो और जिससे जो बन सके वो सहयोग भी करे .

 

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