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अमानतुल्ला 71 हजार वोटों से जीते, पिछली बार से ज्यादा रहा जीत का अंतर, इसी इलाके में है शाहीन बाग

नई दिल्ली. दिल्ली की ओखला सीट से आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी अमानतुल्ला ने 71827 मतों के बड़े अंतर से जीत हासिल की। अमानतुल्ला को 1,30,163 वोट मिले। दूसरे नंबर पर भाजपा के ब्रह्म सिंह रहे हैं। उन्हें 58499 वोट मिले हैं। वहीं, तीसरे नंबर पर कांग्रेस प्रत्याशी परवेज हाशमी ने 5107 वोट हासिल किए। इससे पहले 2015 के चुनाव में भी अमानतुल्ला खान ने यहां से 64 हजार मतों से जीत हासिल की थी।

चुनाव जीतने के बाद अमानतुल्ला ने अमित शाह पर पलटवार किया

दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध प्रदर्शन के चलते शाहीन बाग का धरना प्रदर्शन चर्चाओं में रहा है। ये इलाका ओखला विधानसभा क्षेत्र में ही आता है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने दिल्ली चुनाव के दौरान एक रैली में कहा था- ईवीएम का बटन इतने गुस्से के साथ दबाना कि बटन यहां बाबरपुर में दबे, करंट शाहीन बाग के अंदर लगे। वहीं, चुनाव जीतने के बाद अमानतुल्ला ने अमित शाह पर पलटवार किया। उन्होंने कहा- दिल्‍ली की जनता ने आज भाजपा और अमित शाह जी को करंट लगाने का काम किया है, ये काम की जीत हुई है और नफरत की हार। मैंने नहीं जनता ने रिकॉर्ड तोड़ा है।
ओखला सीट पर करीब 40% मुस्लिम मतदाता

दरअसल, 40 फीसदी मुस्लिम मतदाता वाली इस सीट पर 1998 में जनता दल प्रत्याशी को हराकर कांग्रेस ने कब्जा किया। इसके बाद हर पार्टियों से चेहरे बदलते रहे, लेकिन सीट की 17 साल तक बागडोर कांग्रेस के ही हाथ में रही। 2015 में आप नेता अमानतुल्ला खान ने कांग्रेस के हाथ से इसे छीना और विधायक चुने गए। आखिरी बार कांग्रेस से आसिफ मोहम्मद खान यहां से विधायक रहे हैं। इसके पहले तीन बार परवेज हाशमी कांग्रेस से विधायक चुने गए। 1993 से लेकर अभी तक इस सीट पर भाजपा का खाता नहीं खुला है।

बताते चलें की  भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए पिछले दो साल में सात राज्यों में सत्ता गंवा चुका है। दूसरी बार मोदी सरकार बनने के बाद 4 राज्यों में चुनाव हुए, जिसमें से तीन चुनाव भाजपा हार गई। पिछली बार दिल्ली में महज 3 सीटें जीतने वाली भाजपा को इस बार बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी। दिल्ली के प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ने 48 सीटों पर जीत के अनुमान के साथ सत्ता में आने की उम्मीद जताई थी। हालांकि, ये अनुमान गलत साबित हुए। इसी के साथ भाजपा के लिए देश का सियासी नक्शा भी नहीं बदला। दिल्ली समेत 12 राज्यों में अभी भी भाजपा विरोधी दलों की सरकारें हैं। एनडीए के पास 16 राज्यों में ही सरकार है। इन राज्यों में 42% आबादी रहती है।

कांग्रेस खुद के बूते या गठबंधन के जरिए महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब, पुडुचेरी में सत्ता में है। दिसंबर में हुए चुनाव में झारखंड में सरकार बनने के बाद कांग्रेस की 7 राज्यों में सरकार है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी लगातार तीसरी बार जीती है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, केरल में माकपा के नेतृत्व वाला गठबंधन, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस, ओडिशा में बीजद और तेलंगाना में टीआरएस सत्ता में है। एक और राज्य तमिलनाडु है, जहां भाजपा ने अन्नाद्रमुक के साथ लोकसभा चुनाव तो लड़ा था, लेकिन राज्य में उसका एक भी विधायक नहीं है। इसलिए वह सत्ता में भागीदार नहीं है।

दो साल पहले एनडीए मजबूत था
दिसंबर 2017 में एनडीए बेहतर स्थिति में था। भाजपा और उसके सहयाेगी दलों के पास 19 राज्य थे। एक साल बाद भाजपा ने तीन राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में सत्ता गंवा दी। यहां अब कांग्रेस की सरकारें हैं। चौथा राज्य आंध्र प्रदेश है, जहां भाजपा-तेदेपा गठबंधन की सरकार थी। मार्च 2018 में तेदेपा ने भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया। 2019 में हुए विधानसभा चुनाव में यहां वाईएसआर कांग्रेस ने सरकार बनाई। पांचवां राज्य महाराष्ट्र है, जहां चुनाव के बाद शिवसेना ने एनडीए का साथ छोड़ा और हाल ही में कांग्रेस-राकांपा के साथ सरकार बना ली। इसके बाद झारखंड में भी भाजपा सत्ता गंवा चुकी है, वहां अब कांग्रेस-झामुमो गठबंधन की सरकार है!

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