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राजभर की विदाई की पटकथा तो पहले ही लिखी जा चुकी थी

आपको याद होगा बीते साल दिसंबर में गाजीपुर में एक डाक टिकट जारी करने के लिए कार्यक्रम हुआ था जिसके मुख्य अतिथि पीएम  नरेन्द्र मोदी थेऔर इस कार्यक्रम में राजभर नहीं पहुंचे बस उसी दिन से इनकी विदाई की पटकथा लिखनी शुरू हो गई थी लेकिन लेकिन लोकसभा चुनाव का ध्यान रखते हुए समय आगे बढता रहा । ओमप्रकाश राजभर की मंत्रिमंडल से बर्खास्तगी की सिफारिश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार को भले की लेकिन कई  माह पहले ही इनकी विदाई की पटकथा लिखनी शुरू हो गई थी।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक जब राजभर पीएम की सभा में गाजीपुर नहीं गए तो भाजपा ने अपने कैडर के सकलदीप राजभर को राज्यसभा में भेजकर यह संदेश दिया कि भाजपा ही राजभर समाज की सच्ची हितैषी है। अब तक सुहेलदेव के नाम पर किसी ने कोई बड़ा आयोजन किया न ही टिकट जारी किया। प्रधानमंत्री ने ऐसा करके राजभर समाज का नाम बढ़ाया। दूसरी तरफ अपने राज्यमंत्री अनिल राजभर का भी कद बढ़ा दिया। तीसरे घोसी के सांसद हरिनारायण राजभर को दुबारा टिकट देकर ओमप्रकाश को उनके ही गढ़ में घेर लिया। चर्चा है कि ओमप्रकाश की असली पीड़ा यह थी कि वह अपने बेटे को लोकसभा में पहुंचाने के लिए अपनी मर्जी की सीट चाह रहे थे, जिसे बीजेपी ने नहीं माना।
बताते चलें की राजभर का सियासी सफर बसपा से शुरू हुआ था। तल्ख़  स्वभाव की वजह से ही उन्हें बसपा ने भी बाहर का रास्ता दिखा दिया था। उसके बाद उन्होंने खुद की पार्टी बनाई। करीब 20 साल से हर चुनाव में भासपा अपना प्रत्याशी मैदान में उतारती रही, पर कोई भी प्रत्याशी नहीं जीता। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ भासपा का गठबंधन हुआ। उनके हिस्से में 8 सीटें आईं। इसमें राजभर की पार्टी के चार विधायक चुनाव जीत गए।
राजभर विधानसभा चुनाव जीत कर मंत्री भी बन गए और  मंत्री बनने के थोड़े दिन बाद से ही सरकार पर हमलावर हो गए। रही सही कसर लोकसभा चुनाव में पूरी हो गई उन्होने  37 प्रत्याशी मैदान में उतार दिए ज्यों ही चुनाव खत्म हुआ मुख्यमंत्री योगी ने उन्हें विदाई का संदेश दे दिया।

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