Search
Tuesday 19 March 2019
  • :
  • :
Latest Update

महासंग्राम २०१९: चुनावी समीकरण, मुद्दों और चेहरों की सबसे बड़ी पड़ताल

महासंग्राम २०१९: चुनावी समीकरण, मुद्दों और चेहरों की सबसे बड़ी पड़ताल
लोकसभा चुनाव 2019 का बिगुल फूंका जा चुका है। 11 अप्रैल से 19 मई के बीच सात चरणों में मतदान के बाद 23 मई को नतीजे घोषित होंगे। इस चुनावी महासंग्राम में राष्ट्रीय स्तर पर मुख्यत: दो धरों में सीधी टक्कर देखी जा रही है, लेकिन अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग समीकरण दिख रहे हैं। कहीं भाजपा और कांग्रेस में सीधी टक्कर है, तो कहीं एनडीए बनाम यूपीए की लड़ाई है और कहीं त्रिकोणीय मुकाबले का दृश्य उभर रहा है।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक बार फिर एनडीए की सरकार बनेगी या फिर एनडीए के विरोध में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए गठबंधन सरकार बना पाएगी, इस सवाल का जवाब भविष्य की गर्भ में है। फिलहाल और भी सवाल हैं, जैसे-
  • देश के अलग-अलग राज्यों में चुनावी टक्कर का कैसा समीकरण बन रहा है?
  • अलग-अलग राज्यों में किन बड़े चेहरों पर नजर रहेगी?
  • कौन से वे मुद्दे हैं, जिनपर चुनाव लड़ा जाएगा ?
  • राजनीतिक दलों की क्या स्थिति है और किस रणनीति के तहत चुनाव लड़े जाएंगे?

    उत्तर प्रदेश- 80 सीट

    राज्य की दो बड़ी धुर विरोधी पार्टियां बसपा और सपा के एक साथ आने से भाजपा पर बड़ा असर पहुंच सकता है। मायावती और अखिलेश यादव, दोनों का यहां अपना जाति समीकरण और जनाधार रहा है। ऐसे में पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में भाजपा(71) की सीटें कम हो सकती है। तीसरा धड़ा यहां कांग्रेस का है, जोकि प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में आने से मजबूत हुई है। रोजगार यहां सबसे बड़ा मुद्दा दिख रहा है।

    महाराष्ट्र- 48 लोकसभा सीटें

    पिछले साढ़े चार सालों में यहां के ग्रामीण क्षेत्रों में हताशा देखने को मिली है। विदर्भ और महाराष्ट्र क्षेत्र में किसान आत्महत्याएं भी नहीं रुक रही। इसके बावजूद नगरपालिका और स्थाई निकाय चुनावों में बड़ी सफलताएं मिली है। वहीं, एनडीए के विरोध में यहां कांग्रेस और एनसीपी एक बार फिर से वापसी करना चाहती है। शरद पवार यहां विपक्ष का बड़ा चेहरा हैं। जाति समीकरण देखते हुए यहां कांग्रेस ने सपा और बसपा को भी निमंत्रण दिया है।

    पश्चिम बंगाल- 42 लोकसभा सीटें

    ममता बनर्जी के गढ़ में भाजपा अपनी पूरी ताकत झोंके हुए है। 2014 आम चुनाव में भाजपा दो सीटें निकाल पाई थी, लेकिन पंचायत चुनावों में वह कांग्रेस और वामदलों से आगे रही थी। लोकसभा चुनाव 2014 में तृणमूल कांग्रेस(टीएमसी) को 34 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। इस बार भी ममता की रणनीति ग्रामीण और शहरी गरीबों, छोटे व्यापारियों और अल्पसंख्यकों को साथ लेकर चलने की है। वाम दल यहां संघर्ष की स्थिति में है, जबकि कांग्रेस को भी टीएमसी से अलग ही लड़ना पड़ रहा है।

    बिहार- 40 सीट

    बिहार में इस बार भाजपा ने एक बार फिर अपने पुराने साथी जदयू को साधा है। पिछले चुनाव में नीतीश भाजपा के विरोध में अपने धुर विरोधी राजद-कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया था, वहीं इस बार राजद-कांग्रेस को छोड़ फिर से भाजपा के साथ हैं। नीतीश की दलबदलु छवि के अलावे यहां कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार भी बड़े मुद्दे हैं।

    राजद और कांग्रेस नेतृत्व वाली महागठबंधन के सामने भी रालोसपा, हम, विकासशील इंसान पार्टी और वाम दलों को एकजुट रखना बड़ी चुनौती होगी। वहीं, जेल में होने से राजद सुप्रीमो की अनुपस्थिति महागठबंधन को खलेगी, जबकि एनडीए को फायदा पहुंचा सकती है। बिहार को विशेष राज्य का दर्जा यहां दशकों से बड़ा मुद्दा रहा है।

    राजस्थान- 25 सीट

    विधानसभा चुनाव में मिली जीत से कांग्रेस उत्साहित है और इस उत्साह को आम चुनाव में भी जीत में तब्दील करना चाहती है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राजस्थान में कांग्रेस को क्लीन स्वीप कर दिया था। सभी 25 लोकसभा सीटों पर भाजपा काबिज है। ऐसे में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी है। भाजपा की राजनीति यहां पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के चारों ओर घूमती है। किसानों की समस्या यहां बड़ा मुद्दा रही है।

    गुजरात- 26 सीट

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के गृहराज्य में 2014 लोकसभा चुनावों की तरह भाजपा का इरादा एक बार फिर से क्लीन स्वीप का है। हालांकि 2014 से अबतक राज्य में पाटीदार आंदोलन, किसानों और अनुसूचित जाति के मुद्दों ने स्थितियां अनुकूल नहीं छोड़ी हैं। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में ग्रामीणा क्षेत्रों में भाजपा कमजोर दिखी। इसे कांग्रेस ने कड़ी टक्कर दी थी।

    मध्य प्रदेश- 29 सीट

    2018 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए डेढ़ दशक से काबिज भाजपा को सत्ता से बेदखल कर दिया और प्रदेश में कमलनाथ की सरकार बनी। किसानों की कर्जमाफी का वादा निभाते हुए कांग्रेस यहां खुद को मजबूत महसूस कर रही है। सीएम कमलनाथ ने 100 दिन की रोजगार गारंटी और राज्य की नौकरी में स्थाई निवासी के आरक्षण का प्रावधान कर राज्य के युवाओं को भी जोड़ा है। वहीं, दूसरी ओर भाजपा सीधे खाते में राशि देने वाली किसान सम्मान निधि योजना के जरिए अपना खोया जनाधार वापस पाने की मुहिम में लगी है।

    झारखंड- 14 सीट

    झारखंड में भाजपा को आजसू पार्टी का साथ है। पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा और पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा यहां कांग्रेस के साथ आई है। सीट बंटवारा स्पष्ट नहीं हो पाया है। जल, जंगल, जमीन और आदिवासियों के पुनर्वास को लेकर विपक्ष यहां भाजपा सरकार पर 2014 से ही हावी रहा है। इस बार भी आदिवासियों को जमीन का अधिकार यहां बड़ा मुद्दा है।

    छत्तीसगढ़- 11 सीट

    2014 में भाजपा ने यहां 11 में से 10 सीटों पर विजय पताका फहराई थी। इतना ही नहीं, इससे पहले हुए दो चुनावों में भी भाजपा ने यहां 10 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की थी। लेकिन ताजा राजनीतिक हालात को देखते हुए भाजपा का पुरानी सफलता दोहराना लगभग असंभव लगता है। 2018 के विधानसभा चुनाव में रमन सिंह सरकार को बेहद कम सीटें हासिल हुईं जबकि कांग्रेस ने भूपेश बघेल के नेतृत्व में जबर्दस्त तरीके से बढ़त बनाई।
    किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य छत्तीसगढ़ का एक बड़ा चुनावी मुद्दा रहने वाला है।

    जम्मू कश्मीर- 6 सीट

    जम्मू-कश्मीर में पिछले दिनों पीडीपी-भाजपा गठबंधन टूट जाने के बाद से राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बना हुआ है। चुनाव से पहले किसी गठबंधन की उम्मीद नजर नहीं आ रही है। एक तरफ महबूबा मुफ्ती की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी(पीडीपी) घाटी में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश में लगी हुई है, तो दूसरी तरफ उमर अबदुल्लाह की नेशनल कॉन्फ्रेंस भी कांटे की टक्कर में है।

    बीते दिनों पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद भाजपा कश्मीर में एक मजबूत पार्टी बन कर उभर रही है। ऐसे में अब सवाल उठ रहे हैं कि राज्य में लोकसभा के साथ होने वाले विधानसभा चुनावों की घोषणा क्यों नहीं की गई। उग्रवाद और कश्मीर यहां चुनावी मुद्दा रहने वाला है।

    उत्तराखंड- 5 सीट

    उत्तराखंड में सियासी मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच है। इस बार ‘मोदी मैजिक’ का जादू थोड़ा हल्का पड़ सकता है। इसके बावजूद यहां भाजपा की पकड़ कांग्रेस से ज्यादा मजबूत है। जहां उत्तराखंड के ब्राह्मण और ठाकुर मतदाता भाजपा के समर्थन में हैं, वहीं कांग्रेस विभिन्न गुटों में विभाजित नजर आती है।

    पंजाब- 13 सीट

    पंजाब की राजनीति में एक वक्त की मजबूत प्रतिद्वंदी रही आम आदमी पार्टी मौजूदा हालातों में बिल्कुल कमजोर पड़ गई है। राज्य में भाजपा की साझेदार पार्टी सिरोमनी अकाली दल की हालत भी कुछ ठीक नहीं है। अकाली दल अब तक गुरु ग्रंथ साहिब के अपमान और ड्रग्स सप्लाई के मामले से आक्रोशित जनता को शांत करने में सफल नहीं हो पाई है। मालूम हो कि प्रकाश सिंह बादल की सरकार को भी इसी वजह से सत्ता से हाथ धोना पड़ा था।

    इसके बाद शिरोमणी अकाली दल के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी छोड़ कर अकाली दल(टकसाली) के गठन का मन बना लिया, जिसके बाद 2017 में कांग्रेस ने राज्य में सत्ता हासिल की। युवाओं में नशे की लत यहां बड़ा मुद्दा रही है।

    हरियाणा- 10 सीट

    हाल में हुए उपचुनाव में भाजपा ने जिंद में धमाकेदार जीत दर्ज की थी। कांग्रेस के उम्मीदवार रणदीप सिंह सुरजेवाला को भाजपा उम्मीदवार की तुलना में आधे वोट भी नहीं मिल पाए थे। हालांकि वर्तमान में भारतीय राष्ट्रीय लोक दल(आईएनएलडी) चौटाला परिवार विवाद के कारण दुविधा में नजर आ रहा है। जाट आरक्षण यहां बड़ा चुनावी मुद्दा है।

    हिमाचल प्रदेश- 4 सीट

    हिमाचल प्रदेश में भाजपा की पकड़ मजबूत है, जिसका लाभ उसे चुनाव में मिल सकता है, जबकि कांग्रेस खुद को एकजुट रखने के लिए संघर्ष कर रही है।
    वहीं राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और पीसीसी अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू एक दूसरे को देखना भी पसंद नहीं करते। हवाई यातायात यहां बड़ा मुद्दा रही है।

    असम- 14 सीट

    भाजपा और असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल नागरिक संशोधन बिल के समर्थन में हैं। जबकि प्रदेश में जगह-जगह इस बिल का विरोध जारी है। वहीं, बराक वैली और बंगाली भाषी क्षेत्रों में एक बड़ी आबादी इस बिल का समर्थन भी कर रही है। कांग्रेस सरकार और जनता के बीच इस गतिरोध का राजनीतिक लाभ लेना चाहती है। असम गण परिषद पहले ही इस बिल का विरोध करके एनडीए के गठबंधन से बाहर हो चुकी है। नागरिक संशोधन बिल यहां बड़ा चुनावी मुद्दा है।

    केरल- 20 सीट

    केरल में इस बार क्षेत्रीय मुद्दे हावी रहने वाले हैं। 2018 में आई बाढ़, सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर मचा कोहराम, और राजनीतिक हत्यायों का सिलसिला कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनका असर चुनाव के दौरान साफ तौर पर रहने वाला है। यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और भाजपा जहां हिंदू कार्ड खेल सकते हैं वहीं लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले पर सवार होकर नई राजनीति गढ़ सकता है। एलडीएफ का इरादा एजवा समुदाय और अनुसूचित जाति/जनजाति में पैठ बनाकर वोट हासिल करना है।

    कर्नाटक-28 सीट

    2018 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस और जनता दल सेक्यूलर का साथ आना कई लोगों को चौंका गया। लेकिन, राजनीति में जब सपा-बसपा और भाजपा-पीडीपी साथ आ सकते हैं तो कुछ भी असंभव नहीं लगता। मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी की सरकार का तख्ता पलटने की भाजपा की सभी कोशिशें नाकाम साबित हुईं। हालांकि, जानकार बताते हैं कि कांग्रेस का कर्नाटक खेमा दो हिस्सों मे बंटा हुआ है। एक खेमा जहां सिद्धारमैया के साथ है तो दूसरा खेमा मल्लिकार्जुन खड़गे के पीछे खड़ा है। कांग्रेस और जेडीएस जल्द चुनाव पूर्व गठबंधन के लिए समझौता कर सकते हैं। बीएस येदियुरप्पा की अगुवाई में भाजपा तटीय इलाकों में बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। मुख्य चुनावी मुद्दा किसान और सूखा रह सकता है।

    तमिलनाडु-39 सीट

    एम करुणानिधि और जयललिता की मृत्यु के बाद मौजूदा डीएमके-एआईएडीमके नेतृत्व के लिए ये पहला बड़ा चुनाव है। राज्य में मोदी-विरोधी जनभावना का सुर और भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी पलानीस्वामी सरकार के सामने स्टालिन के नेतृत्व वाली डीएमके-कांग्रेस-वाम गठबंधन को फायदा मिल सकता है। हालांकि, तमिलनाडु की राजनीति पारंपरिक रूप से मुफ्त चीजों के एलान और चुनाव से ऐन पहले होने वाली घोषणाओं से खासी प्रभावित होती रही है। इस बार भी केंद्र और राज्य सरकारें ‘मुफ्त’ का चारा डालकर खेल पलट सकती हैं। यहां मुख्य मुद्दे पानी की कमी और अंतरराज्यीय जल विवाद रह सकते हैं।

    तेलंगाना- 17

    नए राज्य तेलंगाना में मुख्य लड़ाई टीआरएस और कांग्रेस के बीच है। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के नेतृत्व में टीआरएस को फायदा मिलता दिख रहा है। 2018 में हुए विधानसभा चुनावों में टीआरएस को 88 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस को महज 19 सीट से संतोष करना पड़ा। टीआरएस, न तो भाजपा के साथ जा रही है और न ही कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने को तैयार है। बल्कि वो अलग ही गठबंधन बनाने में व्यस्त है जिसमें दोनों ही बड़ी पार्टियों का कोई दखल नहीं होगा। किसानों की दुर्दशा तेलंगाना का एक बड़ा चुनावी मुद्दा रहेगा।

    कर्नाटक-28 सीट

    2018 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस और जनता दल सेक्यूलर का साथ आना कई लोगों को चौंका गया। लेकिन, राजनीति में जब सपा-बसपा और भाजपा-पीडीपी साथ आ सकते हैं तो कुछ भी असंभव नहीं लगता। मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी की सरकार का तख्ता पलटने की भाजपा की सभी कोशिशें नाकाम साबित हुईं। हालांकि, जानकार बताते हैं कि कांग्रेस का कर्नाटक खेमा दो हिस्सों मे बंटा हुआ है। एक खेमा जहां सिद्धारमैया के साथ है तो दूसरा खेमा मल्लिकार्जुन खड़गे के पीछे खड़ा है। कांग्रेस और जेडीएस जल्द चुनाव पूर्व गठबंधन के लिए समझौता कर सकते हैं। बीएस येदियुरप्पा की अगुवाई में भाजपा तटीय इलाकों में बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। मुख्य चुनावी मुद्दा किसान और सूखा रह सकता है।

    तमिलनाडु-39 सीट

    एम करुणानिधि और जयललिता की मृत्यु के बाद मौजूदा डीएमके-एआईएडीमके नेतृत्व के लिए ये पहला बड़ा चुनाव है। राज्य में मोदी-विरोधी जनभावना का सुर और भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी पलानीस्वामी सरकार के सामने स्टालिन के नेतृत्व वाली डीएमके-कांग्रेस-वाम गठबंधन को फायदा मिल सकता है। हालांकि, तमिलनाडु की राजनीति पारंपरिक रूप से मुफ्त चीजों के एलान और चुनाव से ऐन पहले होने वाली घोषणाओं से खासी प्रभावित होती रही है। इस बार भी केंद्र और राज्य सरकारें ‘मुफ्त’ का चारा डालकर खेल पलट सकती हैं। यहां मुख्य मुद्दे पानी की कमी और अंतरराज्यीय जल विवाद रह सकते हैं।

    तेलंगाना- 17

    नए राज्य तेलंगाना में मुख्य लड़ाई टीआरएस और कांग्रेस के बीच है। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के नेतृत्व में टीआरएस को फायदा मिलता दिख रहा है। 2018 में हुए विधानसभा चुनावों में टीआरएस को 88 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस को महज 19 सीट से संतोष करना पड़ा। टीआरएस, न तो भाजपा के साथ जा रही है और न ही कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने को तैयार है। बल्कि वो अलग ही गठबंधन बनाने में व्यस्त है जिसमें दोनों ही बड़ी पार्टियों का कोई दखल नहीं होगा। किसानों की दुर्दशा तेलंगाना का एक बड़ा चुनावी मुद्दा रहेगा।

    ओडिशा- 21 सीट

    दो दशक से यहां बीजू जनता दल का एकछत्र राज रहा है। कांग्रेस को पछाड़ कर यहां भाजपा दूसरी बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। किसानों की बीमा के साथ आजीविका और खेती के लिए सहायता मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने 10 करोड़ की कालिया परियोजना शुरू की। वहीं, रैलियों में भाजपा किसान सम्मान निधि योजना समेत अन्य केंद्रीय योजनाओं के फायदे गिनाती दिखी है। नवीन पटनायक की राह यहां एनडीए और यूपीए दोनों से अलग है।

    आंध्र प्रदेश- 25 सीट

    आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी और वाईएस जगनमोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस में सीधी टक्कर है। जगनमोहन ने पार्टी बनाने के बाद पूरे प्रदेश में घूम-घूम कर अपना जनाधार बनाने की भरपूर कोशिश की है। महागठबंधन में शामिल तेदेपा को वह कड़ी टक्कर दे सकते हैं।

    गोवा- 2 सीट

    गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर लंबे समय से बीमार चल रहे हैं। उनकी बीमारी, भाजपा के प्रचार अभियान को बुरी तरह प्रभावित करेगी। भाजपा के उम्मीदवारों को एंटी-इंकंबेंसी से भी जूझना होगा। 2014 में विजय सरदेसाई ने कांग्रेस के अभियान की कमान संभाली थी। लेकिन अब उन्होंने अपनी पार्टी बना ली है जिसका भाजपा के साथ गठबंधन है। यहां खदानों का बंद होना एक बड़ा मुद्दा रह सकता है।


A group of people who Fight Against Corruption.


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *