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किसान आंदोलन प्रतिक्रियायें और उनके उत्तर

वर्तमान का किसान आंदोलन हो या किसी समय का उस पर कैसी कैसी प्रतिक्रियायें होती हैं, यह देखना, समझना बहुत जरूरी है और अनिवार्य भी । इन प्रतिक्रियाओं की मूल भावना से आपको किसान का दु:खद जीवन क्यों है और उसकी समस्यायें बदस्तूर क्यों बनी हुई हैं?  को जानने में बहुत मदद मिलेगी । हां, उन्हें ही मदद मिलेगी किसान को समझने में जो उससे किंचित लगाव रखते हैं । उनसे लगाव न रखने वालों या नफरत करने वालों को तो मेरे लेख से मदद तो न मिलेगी अलबत्ता उनको मुझ पर और किसानों पर नये सिरे से गुबार निकालने का मौका जरूर मिलेगा । यह तो मैं चाहूंगा भी ।
                  एक प्रतिक्रिया —– “ये किसान नहीं हो सकते, ये तो सूट बूट में हैं । ” यह अलग बात है कि यही आलोचक जब   बदन मे बिना कपड़े या लंगोटी पहन कर किसान आता है आंदोलन में (जैसे तमिलनाडु उदाहरण)  तो कहने लगते हैं कि यह किसान है ही नहीं  आदि आदि ।   अब इन आलोचकों की मंशा समझ लेना जरूरी है । इनकी निगाह में किसान वह है जो एकदम फटेहाल हो, घर में भी और बाहर निकले तब भी । इन्हें पता है कि गरीब से गरीब व्यक्ति भी जब बाहर किसी कार्यक्रम में जाता है तो भरसक कुछ कायदे के कपड़े पहन कर ही निकलता है । परन्तु किसानों का चित्र जो इनके मन में कवियों, लेखकों, चित्रकारों ने बैठा दिया है उसके अनुसार तो किसान वही जो हमेशा फटेहाल हो । भले चाहे शादी विवाह, तीज त्यौहार हो पर वह तब भी दीन हीन, मैला कुचैला, अर्ध नग्न, फटे पुराने कपड़ों में ही हो तभी किसान होगा । यह बात नहीं कि इन्हें कोई सहानुभूति है किसान से बल्कि ज्यादातर यह वर्ग उनसे नफरत ही करता है, लगाव तो बहुत दूर की बात है ।
                यह वर्ग फिर ऐसा क्यों सोचता है?   असल में यह वर्ग किसान को इसी रूप में देखने का आदी है । चाहे चित्र में और चाहे जीवित रूप में ।  यह सही है कि शहर में जो फुटपाथ मे धंधा करते हैं, अधिकांश किसानों की आय उनसे बहुत कम है और यह भी सही है कि जब वह खेती के कामों में लगा होता है तो पुराने ही कपड़े पहनता है । लेकिन जब आंदोलन करे, किसी कार्यक्रम में जाय तो क्या वह एकाध कपड़े भी शरीर में न डाले!  अपने पुराने घावों को कपड़ों मे न छिपाये?!  इतना असभ्य तो नहीं है किसान । हमारा अन्नदाता!!! (जिसे इन्हीं लोगों ने यह नाम दिया है, ठगने के लिये)
               कुर्ता पैजामा पहन कर किसान आंदोलन करता तो यही आलोचक उसे किसान न कह कर नेता कहते । पैंट शर्ट में है तो भी कहते हैं —ये किसान हो ही नहीं सकते ये तो पैंट शर्ट में है । अगर नंगे बदन बेचारा किसान आ जाये तो ये ही तरह तरह के गंदा आरोप लगाते हैं । असल मे यह आलोचक वर्ग किसान का वर्गीय शत्रु है । ये किसान को तभी किसान मानेंगे जब वह खेतों में ही मैला कुचैला जी, मर रहा हो और आत्महत्या की कगार पर हो ।
      क्रमश: जारी—– अगली क़िस्त में भी पढ़ें,
        राजकुमार सचान ‘होरी’
      राष्ट्रीय अध्यक्ष बौद्धिक संघ, भारत

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