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बड़े खतरे का सूचक है ये मौसम का दुष्चक्र

लखनऊ!प्रदेश में मौसमी उलटफेर ने सालों बाद खेती पर जबर्दस्त चोट करके करोड़ों रूपये का नुकसान कर दिया है। पिछले डेढ़ दशक से खलनायक बनते मौसम का यह उलटफेर मुश्किल से हासिल की गई खाद्य सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है।
सर्दी के वक्त गर्मी और गर्मी के वक्त सर्दी की बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। साथ ही बीमारियों के प्रसार और उग्रता की तस्वीर बड़ी तेजी से बदल रही है। मार्च  में दिसंबर जैसी सर्दी रंग दिखाने लगी है। सबसे खतरनाक बात यह है कि देश भर में मौसम का मिजाज पूर्वानुमानों के विपरीत नितांत नई राह पर चल रहा है। कहीं भारी बरसात है तो कहीं भारी बर्फबारी। सौ साल में पहली बार ऐसा हो रहा है जब साल की शुरूआत में इतना बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।
हाल फिलहाल में मौसमी उथलपुथल का सबसे बड़ा खामियाजा प्रदेश में हुई ओलावृष्टि से किसानों का उठाना पड़ रहा है। दरअसल उत्तर भारत में मार्च में गर्मी की बजाय जमकर भारी बरसात, ओलावृष्टि, तूफानी हवाओं ने फिर से आम आदमी और वैज्ञानिकों को हैरान-परेशान कर दिया है। इससे पहले 2001 में अप्रैल के महीने में उत्तर भारत के साथ देश का अधिकांश हिस्सा बरसात से भीगा था।
उस समय भी मार्च की तरह सर्द हवाओं ने गुलाबी सर्दी लौटा दी थी। ठीक इसके विपरीत 2000 में तो अचानक सर्दी अपना रंग दिखाना ही भूल गयी थी। आमतौर पर जनवरी फरवरी में बौराने वाला आम दिसंबर में ही बौराने लगा था। 2003 में अप्रैल के अंतिम हफ्ते की तपन के बाद अचानक बारिश ने वैज्ञानिकों को भी चौंका दिया था। पर यह कोई पहली दफा नहीं हुआ। इससे पहले भी मौसम के अविश्सनीय रंग देखे जा चुके हैं।
मौसमी उथलपुथल का ही नतीजा है कि जलवायु विविधता के लिए विख्यात देश में गर्मी के सारे पुराने रिकार्ड ध्वस्त हो चुके हैं। यहां तक कि अविश्सनीय रूप से ओडिशा और दक्षिण भारत में लू चलने लगी है। मानसून समय पर आ जाता है तो मानसूनी बारिश का कोई ठौर-ठिकाना नहीं रह गया है। आंकड़ें गवाही दे रहे हैं कि पिछले दशक से हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली में ज्यादा बारिश होने लगी है। 2013 में इसी बसंत काल में उत्तर प्रदेश  के अलावा पंजाब, आंध्र, राजस्थान और महाराष्ट्र बेमौसमी बारिश और भयंकर तूफानों का शिकार हुए। पिछले साल भी मार्च की शुरूआत में हैदराबाद बारिश से जमकर भीगा तो कर्नाटक के वारंगल, बीदर और महाराष्ट्र के औरंगाबाद व नासिक ओलों का शिकार हुए। कुदरत के निजाम में इंसानी दखलअंदाजी ने मौसमी संतुलन को झकझोर दिया है। प्रदेश में तूफानी बारिश और ओलों से गेहूं की तकरीबन 40 प्रतिशत फसल तबाह हुई है। यही हाल दलहन व तिलहन का भी हुआ है। जौ, चना फसलें भी बारिश और तूफानी हवाएं काफी हद तक बर्बाद कर गयीं।
पहले ही से तमाम समस्याओं से जूझते देश में मौसम की खलनायकी से खाद्यान्न उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। और अगर ऐसा हुआ तो इससे अनाज की कीमतों में जबर्दस्त उछाल आएगा।

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