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ईद मुबारक-लघु कथा

लघु कथा-     राम वरमा

‘अस्सलाम-आलेकुम दादा भाई….ईद मुबारक हो |’ तीन फुट तीस किलो कद वजन की अनजानी बुलंद आवाज ने एक पल को ठिठका दिया , पांव थम गये , आंखे अचरज से फ़ैल गईं | उसी हाल में जबाब दिया , ‘वालेकुम सलाम आपको भी ईद मुबारक नन्हे दोस्त | ‘ ईद की छुट्टी होने की वजह से घर के ऊपरी हिस्से में काफी समय बिताने के बाद नीचे बैठक में आते ही अपने पोते आत्मन के कई नन्हें दोस्तों को बैठे देखा | मैंने उसी छोटे बच्चे से पूछा , ‘ क्या नाम है आपका ?’

‘ अलीबाबा , दादा भाई |’

‘दादा तो ठीक है लेकिन ये भाई ?’ मैंने जिज्ञासावश पूछा |

‘सब कहते हैं हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई तो मैं और आप भाई-भाई हुए की नहीं ? दूसरे आप आत्मन के दादा हैं तो मेरे भी दादा हुए की नहीं |’

‘गोया आपको रिश्तों की खासी समझ है | किस दर्जे में तालीम पा रहे हैं ?’

‘क्लास फोर्थ में , सेंटफ्रांसिस स्कूल हजरतगंज में पढ़ता हूं |’

‘भाई अलीबाबा जी , आप ईदी में क्या लेंगे ?’

‘आपकी मोहब्बत और आपका आशीर्वाद |’

‘मियां वो तो आप इतनी देर में हासिल कर चुके हैं | ये लीजिये मेरी तरफ से आप सब आपस में बांट लीजिये|’ मैंने पांच सौ रु.का नोट उसे देते हुए कहा |

‘शुक्रिया , दादा भाई, मेरी एक गुजारिश है |’

‘बोलिए |’ ‘ आपको मेरे घर मेरी अम्मी के हाथों की पकी मीठी सेवईयें खाने आना होगा |’

‘जरूर आऊंगा |’ मेरा जबाब सुनकर सभी बच्चे सलाम , प्रणाम करते हुए चले गये लेकिन मुझे हिन्दू-मुस्लिम  भाईचारा और शिष्टाचार के साथ ईद के , बल्कि त्यौहार के मानी समझा गये | खासकर अलीबाबा ने मुझे लखनऊ के नन्हे-मुन्नों की ईद में शामिल करके पुश्तैनी तहजीब का एहसास कराया | ईद मुबारक |

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