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बस्ते के बोझ में कब तक घुटेगा बचपन?

एआईआईएसएच के एक सर्वे के अनुसार लगभग सारे पैरेंटस अपने बच्चों पर सबसे आगे निकलने का दबाब बना कर रखते हैं। एक तो स्कूल बैग का बोझ और ऊपर से माता-पिता का मनोवैज्ञानिक दबाव। कोई यह नहीं समझ सकता कि बच्चों पर बस्ते के बोझ के साथ-साथ उनके दिमाग पर कितना बोझ होता होगा? बच्चों को आगे करने के लिए माता-पिता तरह-तरह के तरीके अपनाते हैं। उन्हें बहलाने-फुसलाने से लेकर कई तरह का लालच देने में भी माता-पिता पीछे नहीं हटते। अगर बच्चा पढ़ने में कमजोर है या ग्रेड अच्छे नहीं ला रहा हो तो बजाय इस बात को समझने की कि उसकी परेशानी क्या है? उसे डांट-फटकार और प्रताड़ना मिलती रहती है। ग्रेड सही करने के लिए उसे हमेशा हिदायत दी जाती है।
कभी आपने पहली कक्षा के बच्चे का बैग देखा है। नन्हा सा बचपन ऐसा लगता है मानेा इस भारी बस्ते के नीचे घुट रहा हैं। पैरेंटस से लेकर टीचर तक बस उसकी कॉपी-किताब और ग्रेड की बातें करते नजर आते हैं। पहली कक्षा से ही स्कूल का बोझ उसके कंधे, पीठ और दिमाग पर दिखने लगता हैं। पैरेंटस हमेशा यही चाहते हैं कि उनके बच्चे ज्यादा से ज्यादा मार्क्स लेकर सबसे आगे रहे। इसके लिए वे अधिक से अधिक पैसे तो खर्च करते ही हैं साथ ही बच्चे पर पढने का दबाव भी डालते हैं। बच्चे को समय-समय पर इस बात का अहसास भी कराया जाता हैं कि उस पर कितने पैसे खर्च हो रहे हैं। इस वजह से बच्चों से प्रतियोगिता की भावना पैदा होती हैं और वह ज्यादा से ज्यादा नंबर लाना चाहते हैं।
ज्यादातर स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के नाम पर बस सिलेबस खत्म कराने की सोची जाती हैं। टीचर और छात्र के बीच का हेल्दी संवाद न के बराबर रह गया है। स्कूल टीचर पढ़ाने के नाम पर बस किताबों के पाठ खत्म कराते नजर आते हैं। बच्चा क्या सीख रहा हैं, क्या उसे सीखना चाहिए, यह सब अब पुरानी बातें हो गई हैं। स्कूल अब यह सोचता है कि वह बच्चों को चैंपियन बना रहा है। यह स्कूल के साथ-साथ माता-पिता का भी भ्रम है। वे सिर्फ बच्चों पर दिमागी बोझ डालते नजर आते हैं। समय पर सिलेबस खत्म करने के दबाब में टीचर बच्चों पर अनचाहा दबाब डालने लगते हैं जिसके कारण बच्चों का खेलना, घूमना और दूसरी किताबें पढ़ने का समय ही नहीं मिल पाती। बाहरी दुनिया से अपनों से बच्चे कटने लगते हैं। असाइनमेंट और गृहकार्य के चक्कर में बच्चे फंसते चले जाते हैं।

भारत के अलावा अगर हम बाहर के स्कूलों की बात करें तो हर स्कूल ने बच्चों को भारी बैग से निजात दिलाने के लिए लॉकर की सुविधा दे रखी है। उन्हें सिर्फ साथ में होमवर्क की कॉपी ले जानी होती है। मगर भारत में ऐसा नहीं है, छोटे बच्चों से लेकर बड़े बच्चों तक को भारी बैग लटकाकर स्कूल जाना पड़ता है। किसी भी बच्चे के लिए सिर्फ किताबी ज्ञान ही काफी नहीं है बल्कि उसे सही जानकारी देना भी जरूरी है।

गर्मी की छुट्टी की बात करें तो पहले बच्चे नानी-दादी के घर घूमने जाया करते थे पर सब होमवर्क को बोझ इतना होता है कि एक महीने की छुट्टी भी उन्हें भारी लगती हैं। वे अपने छुटि्टयों का मजा भी नहीं ले पाते क्योंकि उन पर होमवर्क बनाने का दबाव रहता हैं। मगर जरूरत से ज्यादा दबाव से बच्चा सफल कभी सफल नहीं होगा। कहा जाता है कि ‘रबड़ को उतना ही खीचों जितनी उसकी क्षमता हैं, ज्यादा खींचने से वह टूट जाता है।’ इसी तरह छात्र भी हैं ज्यादा दबाव से वे टूट जाते हैं।

स्कूलों को चाहिए कि वे छात्रों पर पढ़ाई का दबाव न रखें बल्कि स्कूल को ही फ्रेंडली बनाएं। हर वक्त अनुशासन और नियमों की बात न करें बल्कि बच्चों को थोड़ी मस्ती की भी आजादी दें। ज्यादातर काम स्कूल में ही निपटाने की कोशिश करें ताकि बच्चों को खेलने व दूसरे कामों के लिए समय मिल सकें। अभिभावक भी इस बात का ध्यान रखें कि बच्चों के साथ सख्ती से नहीं करें। हर समय ‘पढ़ो-पढ़ों की रट न लगाएं। छोटे बच्चों पर स्कूल बैग का बोझ कम करने की पहल स्कूल प्रशासन को ही करनी होगी। मगर दिमागी बोझ को कम करना तो अभिभावक की जिम्मेदारी है। बच्चों से उनका बचपन न छीनें। स्कूली बस्तों में दबे बचपन को फिर से लौटाने के लिए हर किसी को अपने स्तर पर कोशिश करनी होगी। आखिर कब तक घुटता रहेगा बचपन?

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