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व्यंग्य: इक मेरा रिज़ल्ट, इक तुम्हारा !

नीरज बधवार
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यह परीक्षा नतीजों से एक रात पहले की बात थी। साक्षात ईश्वर सपने में आए। पूछने लगे, क्या चाहिए। मैंने कहा, प्रभु, कुछ नहीं, बस पास करा दो। उन्होंने खुलकर मांगने को कहा, तब भी मैं गुड सेकंड डिविज़न से आगे नहीं बढ़ पाया। प्रभु ने फर्स्ट डिविज़न के लिए फोर्स किया तो मैंने यह कहकर रहम की भीख मांगी कि ऐसा मत करना प्रभु, वरना मैं समाज में क्या मुंह दिखाऊंगा। मेरे दोस्त तो मुझसे बोलना छोड़ देंगे।

उन्हें लगेगा कि ज़्यादा नंबर लाकर मैंने उन्हें धोखा दिया है। मुझे आज भी याद है पेपर शुरू होने से साढ़े पांच घंटे पहले पढ़ना शुरू करते वक्त हम इस बात का खास ख्याल रखते थे कि कुंजी से सिर्फ उतने ही सवालों के जवाब रटे जाएं जितने पास होने के लिए ज़रूरी है। जब कभी ‘अथवा’ में दोनों सवालों के जवाब आते हों तो ये अपराधबोध होने लगता था कि आखिर मेरी तैयारी में कहां चूक हो गई जो मैं इतना ज़्यादा पढ़ गया।

किसी अंग्रेज़ लेखक ने कहा कि मरते वक्त आपके पास बचा पैसा, आपकी वो फिज़ूल मेहनत है जो आपके काम नहीं आई। यही बात मुझे 33 से ज़्यादा आए हर एक नंबर को लेकर लगती थी। ऐसा लगता था कि जितनी मेहनत मैंने इन अतिरिक्त नंबरों को लाने में की पढ़ाई में की इसी दौरान मैं आधा घंटा और सो सकता था। यह वो वक्त था जब हम थोड़े में सब्र करना जानते थे। मगर आज ज़माना बदल गया है। अब 80 परसेंट आने पर बाप बच्चे को घर से निकाल देने की धमकी देता है और हमारे ज़माने में साठ परसेंट आने पर बच्चा अपने बाप को घर से निकालने की सोच सकता था।

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