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गो कि शगुन में भी उधारी !

 रिपोर्टराम प्रकाश वरमा
लखनऊ। शादी ब्याह के न्योते की हल्दी की गांठ, ‘पीली चिट्ठी’ से ‘पीले रूमाल’ में बदल गई। वक्त बदला ‘वक्रतुण्ड महाकाय… सर्वकार्येषु सर्वदा’ लिखे रंग-बिरंगे कार्डो ने ले लीं कम्प्यूटर, मोबाइल आया तो न्योता ‘ईमेल, एसएमएस’ में बदल कर ‘इन्वीटेशन’ हो गया। संस्कारी ईमानदार सरकार आई तो दावतनामा डिजिटल होकर अंग्रेजी राज के दौर में पहुंच गया। याद दिला दें अंग्रेजीराज के समय शादी व्याह के अवसर पर कन्या पक्ष द्वारा दिए जाने वाले भोज पर प्रतिबन्ध लगा हुआ था। राजाज्ञा पालन करने के लिए उस समय वघू पक्ष की ओर से भेजे जाने वाले निमंत्रण पत्रों पर वैवाहिक कार्यक्रम के साथ विशेष नोट में कृपया अपना राशन दो दिन पूर्व भेजने का कष्ट करें छापा जाता था। इसी तरह निमंत्रण पत्रों पर परम पिता परमात्मा की असीम अनुकम्पा की जगह पूज्य महात्मा गांधी जी की असीम अनुकम्पा वाक्य का इस्तेमाल किया जाता था। गोरे शासकों का खौफ और बापू की लोकप्रियता इस कदर थे कि यह सिलसिला आज़ादी के बाद भी कई सालों तक चलता रहा। यहीं बताते चलें कि अब से महज बीस साल पहले शादी ब्याह के अवसरों पर सरकार से गेहूँ चीनी का परमिट बनवाना पड़ता था। इतना ही नहीं इंदिरा गांधी के समाजवादी अभियान में यह तक तय करने का अधिकार सरकार के पास था कि आपके बेटे-बेटी की शादी में कितने मेहमान आएंगे और उन्हें आप क्या खिलाएंगे? और तो और एक समय में 25 मेहमानों की संख्या में बांधकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया गया। यह सिलसिला यहीं नहीं थमा, कुछ सालों पहले तक गर्मियों के दिनों में दूध की किल्लत को देखते हुए खोया, पनीर व दूध से बनने वाली मिठाइयों पर पाबंदी लगा दी जाती थी। इस समाजवादी राशनिंग व्यवस्था के मुखालिफ जनसंघ के हलक से चीख निकली थी ‘इंदिरा तेरे शासन में कूड़ा बिक गया राशन में।’ आज बरसों बाद पूरे देश के साथ दूल्हा-दूल्हन व उनके मां-बाप को कतार में लगे देखकर और नौकरशाही व नेताशाही को पुराने टोटकों की कसरत करते देखकर अचरज नहीं होना चाहिए। शादी वाले घरों के लिए 19 नवंबर से 25 नवंबर तक रोज नए-नए नियमों के ऐलान के साथ ढाई लाख रूपयों की पाबंदी से उच्चतम न्यायालय तक ने राहत देने से यह कहकर ‘सरकार ने विशेषज्ञों की रायशुमारी के बाद ही यह नीति तैयार की है। ऐसे में इसकी न्यायिक समीक्षा की गुंजाइश बहुत कम है’ इन्कार कर दिया। ऐसे हालात में शादी विवाह वाले घरों में छोटी से छोटी चीजों को खरीदने के लाले पड़ना लाजिमी था। तमाम रस्में, शुभ मुहूर्त-लग्न, शगुन, बैंड बाजा, नाच-गाना , तिलक, समधी मिलन सब खाते के लेखे-जोखे (एकाउन्ट) की लाइन में खड़े हो गयें। पानी से लेकर पनही तक, शुभाशीष से लेकर स्वागत तक उधार के शामियाने तले खड़े हो गए। कई जगहो, से खबरें आईं कि जीजा ने जूता चुराई की रकम चेक से आदा की, बात नहीं बनी तो दूल्हा नकदी के लिए एटीएम की लाइन में लगा। ऐसे ही कई जगह शादी के कार्ड छापने वालों ने शगुन में दिए जाने वाले लिफाफों पर छपवाया, मैं धारक को 501 या 1100 रू0 अदा करने का बचन देता हूँ, हार्दिक शुभकामनाओं के साथ। लोगों ने इसे हाथों हाथ लिया और नव दम्पत्ति को शगुन का ऋण जल्द देने का वायदा किया। गो कि शगुन में भी उधारी की शुरूआत हो गई। इससे भी दो कदम आगे लोगों ने पुराने नोट ही लिफाफों में डालकर दे दिये। अब नवदम्पत्ति के सामने इन नोटों के काला/सफेद साबित करने की दिक्कत भी है। ऐसे में सोने की पाबंदी कानून के दोहराव और बेरौनक सराफा बाजार ने विवाह के मायने ही बदल दिये। सदियों से चली आ रही परम्पराओं और मंगलकारी अनुष्ठानों में लोेक भागीदारी पर एक सवालिया निशान लग गया है? क्या हिन्दू समाज ‘डिजिटल मैरिज’ की ओर घकेला जाएगा? क्या कोर्ट द्वारा पंजीकृत विवाह को बढ़ावा दिया जाएगा? क्या दहेज रहित ब्याह पर जोर दिया जाएगा? क्या यूरोपीय संस्कृति उधार लेकर हिन्दू विवाहों में बदलाव किये जाएंगे? वह भी हिन्दू संगठनों के हिन्दू होने के गर्व के साथ हलक फाड़ने के बावजूद? सवाल बहुत हैं लेकिन जवाब सात फेरों के लिए 2.5 लाख रूपयों के साथ लगी नौ शर्तो के बीच से होता हुआ पांच सौ करोड़ी व कई करोड़ की शान-ओ-शौकत के रंगमहलों की शादियों में गुम है। यहीं एक साथ दो खबरें आई है पहली केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी की बेटी की शादी में तमाम मेहमानों के साथ प्रधानमंत्री समेत मंत्री, सांसद, विधायक भी शामिल हुए। क्या वे सभी अपने निजी खर्चों से वहां पहुंचे थे या सरकारी सुविधा से? यदि सरकारी सुविधा का इस्तेमाल हुआ है तो इसे क्या भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं गिना जाना चाहिए? यह तो आम आदमी के (टैक्स) पैसे का दुरूपयोग है? दूसरी खबर है उप्र सरकार ने गरीब वर्ग की लड़कियों की मदद के लिए समाजवादी शादी अनुदान योजना के तहत 20 हजार रूपये देने का ऐलान किया है। दोनो खबरों में किसे सराहा जाए?
हिन्दू विवाह महज दो वयस्कों (स्त्री-पुरूष) के बीच समझौता नहीं होते। समझौता करते हैं दो बड़े परिवार और सम्पूर्ण लोक भागीदार बनता है। विवाह पूर्व कन्या अपने गांव-घर के लोगों से आशीष मांगती है। बाराती चलते समय ग्राम देवता को नमन करते हैं। हर अवसर के अपने लोक गीत और संगीत हैं। विवाह के पूर्व संध्या बड़ी भावुक होती है। दोनों पक्षों के घर होने वाली मातृ पूजा में सभी पूर्वजों को न्योता दिया जाता है। सूर्य, चंद्रमा, मेघ, इंद्र और वरूण जैसे वैदिक देवताओं को निमंत्रित किया जाता हैं। स्वर्गवासी हो चुके पुरखों से भी इस मंगल कार्य में उपस्थित होने की प्रार्थना की जाती है। निर्विघ्नता की खातिर आंधी, पानी, बवंडर की भी प्रार्थना की जाती है, औरतें गाती हैं, आंधी, पानी हो, तुमहू निमंते तीन दिवस जनि आयो (हे आंधी, पानी तुम्हारा भी न्योता है, मगर इन तीन दिनों के बीच न आना)। लोक है सात आयामी। सो आलोक (प्रकाश) में सात रंग हैं। संगीत में सात सुर हैं। मनुष्य की चेतना के सात तल हैं। ग्रह भी सात हैं। सप्तऋषि भी सात हैं, सो वर-कन्या अग्नि को साक्षी मानकर उसके सात फेरे लेते हैं। हर फेरे का अपना महत्व है, इसी में जीवन पर्यन्त साथ निभाने और साथ-साथ रहने की प्रतिज्ञा करते हैं। ग्रहों की पूजा होती है, वैदिक देवताओं की ओर से अग्नि, ऋषियों की ओर से पुरोहित प्रतिनिधित्व करते हैं। पिता कन्यादान करते हैं। ऋग्ेवेद पति के मुंह से कहलवाता है, तेरे सौभाग्य के लिए मैं तेरा हाथ ग्रहण करता हूँ। मुझ पति के साथ तू वृद्धावस्था तक रह। मुझे महापत्य मिले इस कारण भग, अर्यमा, सूर्य व ऊषा देवों ने तुझे सौंपा है। बाराती बहू (कन्या) लेकर घर आते हैं, सारा लोक स्वागत करता है। ऋग्वेद स्वागताशीष देता हैं, तुम दोनो खुशी से रहो तुम्हारा अलगाव न हो व पुत्र-पौत्रों सहित आनंद मनाओ इसी के साथ धन्यवाद देने की प्रथा के रूप में दक्षिणा का चलन आया। वही बहू की मुंह दिखाई में भी भेंट का चलन है। कई जगहों पर नेग (नकद पैसे) देने का चलन है। दक्षिणां, नेग और भेंट मोबाइल वालेट, डेबिट कार्ड या चेक से दिये जा सकते हैं? उससे भी बड़ा सवाल है, क्या ढाई लाख रूपयों से (सरकार द्वारा लगाई गई नौ शर्तो के बीच) किसी मध्यमवर्गीय परिवार की शादी संभव है? वह भी तब जब इसी समाज में नेताओं, नौकरशाहों व धनिकों के परिवारों में बगैर किसी शर्त के ढाई करोड़ में केवल सगाई की जाती हो। यह असमानता समाज को कहां ले जाएगी? उससे भी बड़ा सवाल कि संघ और भाजपा के हिंदू का क्या होगा? विश्व हिन्दू परिषद के अभियान हिन्दू हेल्प लाइन के जरिए हिन्दुओं की एकजुटता का क्या होगा?
सात फेरों की नौ शर्ते
1. नकद निकासी के वक्त उन देनदारों की सूची देनी होगी, जिन्हें नकद भुगतान किया जाना है। 2. उन्हीं परिवारांे को 2.5 लाख नकद दिए जांएगे, जिनके खातों में 8 नवंबर तक पर्याप्त रकम रही होगी। 3. नकद भुगतान ऐसे लोगो को ही किया जा सकता है, जिनके पास अपना बैंक खाता नही है। 4. यह बताना होगा कि किस मकसद के लिए नकद भुगतान किया जाना है। 5. नकद निकासी माता-पिता या फिर शादी करने जा रहा व्यक्ति कर सकता है। 6. सुविधा उन्हीं परिवारों को मिलेगी जिनके घर में 30 दिसंबर 2016 को या इससे पहले शादी हो। 7. आवेदन में परिवार को दूल्हा और दुल्हन के नाम, उनके पहचान पत्र, पते और शादी की तारीख बतानी होगी। 8. शादी वाले परिवार के किसी एक ही व्यक्ति को यह सुविधा मिलेगी। 9. आवेदन के साथ उन्हें शादी के प्रमाण, मसलन निमंत्रण कार्ड, अग्रिम भुगतान की प्रतियां, हॉल बुकिंग और कैटरर को दी जाने वाली राशि की रसीद भी दिखानी होगी।

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