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निराश तो नहीं.?अवसाद आपके दरवाज़े पर खड़ा है

 

 

कभी किसी कवि ने कहा था — नर हों न निराश करो मन को ,कुछ काम करो कुछ काम करो। यह कथन सारे जगत के लिए सत्य है ।सम्पूर्ण सृष्टि आशा और निराशा के दो झूलों में झूलती है ।आशा कम हुई नहीं कि निराशा बढ़ी और उत्तरोत्तर गति से बढ़ेगी निराशा से अगर आप हताशा की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन आशा का झोंका आपके मन में आते ही निराशा के बादल तितर बितर होने लगते हैं।

निराशा मन की एक स्थिति है । हार्मोनल इंबैलेंस है ।आम फिल्मी भाषा में कहूं तो यह केमिकल लोचा है । सारा खेल न्यूरान्स का है । लेकिन ठहरो , निराशा केवल मन की उपज नहीं ,यह तो तन से आरंभ होती है । आपका शरीर ,सम्पूर्ण इन्द्रियां मिल कर मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं । पल पल की खबर शरीर के अंग मन को देते रहते हैं । इस तन के ढांचे में कहीं भी,कुछ भी हो मन ,मस्तिष्क को सूचना तुरंत मिल जाती है।

          ये संवाद ही आशा और निराशा के जनक हैं । यह शाश्वत प्रक्रिया है । अविराम चौबीस घंटे चलती रहती है सोते जागते ।हां सोते समय इसकी मात्रा और तीव्रता कम हो जाती है। तभी गहरी नींद सभी जीवधारियों के लिए अमृत है।  आशा ,निराशा के वैज्ञानिक पहलू की ओर इशारा करना जरूरी था जिससे आप निराशा के लिए केवल मन को उत्तरदाई न ठहराएं । तन के साथ ही आपका वातावरण भी आशा और निराशा को जन्म देता है। दूसरों की बातें या उनके कर्म भी आपको आशा ,निराशा के भंवर में ले जाते हैं ।आपको इन सबका अनुभव आए दिन होता ही है ।
 
                 निराशा जिसे अंग्रेजी में hopelesness कहते हैं कर्म की शत्रु है ।आपका उत्साह निराशा से कम होते ही आप काम से दूर होते हैं । काम के प्रति लगाव और ललक ,उत्साह कम होने लगता है। निराशा ने आप पर प्रभाव डालना शुरू किया । अब आप चेते नहीं ,सावधान न हुए तो किसी भी हद तक निराशा आपको अकर्मण्य की स्थिति तक ले जा सकती है।  कर्म मार्ग से आप विचलित होने लगेंगे ।समझो अवसाद का सूत्रपात हो गया । अवसाद जिसे आप डिप्रेशन कहते हैं। संभालिए अपने को ।
                     
                कर्म से च्युत होने की स्थिति अभी बताई थी।अब ज्ञान में कितना क्षरण होता है निराशा से, यह जानेंगे।निराश आदमी का विवेक ,ज्ञान,बुद्धि सब उसे छलावा लगने लगते हैं। एक उदाहरण – आपको सड़क पार करनी है और आप में निराशा आ गई ।अब आप सोचने लगेंगे अचानक यह सड़क तो बहुत चौड़ी है, उबड़ खाबड़ है,सवारियां बहुत चल रही हैं ,आपके पैर में अचानक दर्द भी होने लगेगा ,धड़कन बढ़ जाएगी ,सांस फूलने लगेगी आदि आदि । जबकि इनमें से अधिकांश लक्षण थे ही नहीं ।निराशा ने आपको अज्ञानी और भ्रमित बना दिया।
 
           निराश व्यक्ति में उत्साह,कर्म और ज्ञान का क्षरण हो जाता है । कम या ज्यादा आपकी निराशा की स्थिति,मात्रा पर निर्धारित है।  जब निराशा कभी कभी आती है और आप उसको भगा देते हैं तब अवसाद का जन्म नहीं होगा । लेकिन सावधान !! यही निराशा जब स्थाई रूप से आपके ऊपर बस जाती है तब अवसाद भी तेजी से आपको डसने लगता है।  अवसाद रूपी जहर आपके पोर पोर में समा जाता है। आप डॉक्टर ,वैद्य ,हकीम के पास जाने लगते हैं और फिर जीवन चलता फिरता नरक । नर्क और कहीं नहीं है इसी शरीर में है ,इसी जगत में है। आप निराश हुए, असावधान हुए और नर्क आपके पास ।
 
            वैज्ञानिक रूप से आशा,निराशा की विवेचना बड़े पैमाने पर की जा सकती है। करनी भी चाहिए। मनोविज्ञान ही है। यहां देखते हैं कि धर्म,अध्यात्म क्या राह दिखाता है।  एक शब्द है — आत्म विश्वास । इसमें आत्म क्या है। भारतीय दर्शन विशेषकर वेदांत आत्म या आत्मा किसे कहते हैं? बुद्ध भी अत्त और अप्प किसे कहते हैं? अत्त दीपो भव या अत्त दीपो भव क्या है ? क्यों कहा बुद्ध ने । सारे उपनिषद आत्मा के विवेचन और महत्व से भरे हैं।  
      
            आप नाम दें या न दें ।आप नास्तिक हैं तो भी किसी ऊर्जा या एनर्जी को मानेंगे ही जो आपके अंदर है और मृत्यु के बाद नहीं रहती है। आपकी वही ऊर्जा , वही आत्मा है। उसी से आत्म बना है और उस पर विश्वास ही आत्मविश्वास है । आत्मविश्वास ही वह आध्यात्मिक ,धार्मिक जादू है जो आपकी ओर से सारे दृश्य और अदृश्य शत्रुओं से लड़ता है। सारे जीवन भर । आत्मविश्वास ही निराशा को हराता है , भगाता है। कोरोना से भी वही लड़ रहा है। आत्मविश्वास की कमी और निराशा ही मरीजों को मौत के मुंह में ले जाता है।
 
        आप स्वयं प्रकाशित हों । आप ही ज्ञान विज्ञान के आधार हैं ।पहचानें स्वयं को । अंदर की अपार ऊर्जा के दर्शन करते ही आत्मविश्वास उच्चतम बिंदु पर पहुंचेगा और आप के मन से निकलेगा —-
          
       अहम् ब्रह्मास्मि  और सोअहम्
 
             कल्याणम् भव 
 
              #आचार्यश्रीहोरी 
 

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