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गंगा जमुनी तहजीब का एक और सितारा टूटा ताज़ियादार हरिश्चंद्र का निधन

टूट गया इकज़हती की मिसाल का एक और तारा

इकज़हती का परचम लिये ताज़ियादार हरिश्चन्द्र जी को यदि अपने शब्दों में कहूँ तो वे हमेसा यही पैगाम देते रहे कि-

बड़े अनमोल रिश्ते हैं इन्हे बरबाद मत करना 

मेरे भाई  के आँगन में खड़ी दीवार मत करना

 यूं ही नही नवाबी नगरी की गंगा-जमुनी संस्कृति की मिसाल पूरी दुनिया में दी जाती है यहां की आबो हवा में जहां इकज़हती का श्वर गुंजित होता वही एक दूसरे के धार्मिक  आयोजनो में हिन्दू-मुस्लिम पूरे अकीदे  के साथ शिरकत भी करते हैं। इसी इकज़हती का राजधानी लखनऊ में परचम लहराने वाले किशनू खलीफा इमामबाड़े के ताजियेदार हरिश्चन्द्र का लंबी बीमारी के बाद सोमवार को निधन हो गया ।
ताज़ियादार हरिश्चंद्र जी के निधन की खबर सुनते ही क्या हिदू क्या मुस्लिम हर किसी का दिल ग़मज़दा हो चला  उनके पूर्वजों द्वारा स्थापित इस इमामबाड़े में  5 पीढ़ियों से अजादारी का सिलसिला पूरी अकीदत से होता आ रहा था जिसमे हिन्दू-मुस्लिम हमेसा बढ़चढ़कर हिस्सा लिया करते थे।
 करीब 2 साल पहले मुहर्रम में  हरिश्चन्द्र जी ने कार्यालय आकर मुझे दावत दी तो मैं व्यस्तता के वावजूद खुद को नही रोक सका पहुंचकर देखा  तो मंज़र ही अज़ब था अज़ादारी में मुस्लिमो से कहीं ज्यादा संख्या हिन्दू भाइयों की थी आंगन में मंदिर और बगल में उसके सज़ा ताज़िया और उसमें लगे देवी देवताओं के कलेंडर खुद में इकज़हती का नमूना थी  मौलाना जावेद जैदी साहब मजलिस को खिताब कर रहे थे कर्बला के मंज़र पर उनके बयानात पर लोग आंसू नही रोक पाए रहे थे और तो और  हरिश्चन्द्र के घर के लोग सीनाजनी भी करते हुए या हुसैन के नारे भी बुलंद कर रहे थे आयोजन के उपरांत जब मैंने उनसे  किशनू खलीफा इमामबाड़ा के बारे में जानकारी ली तो उन्होंने बताया कि यह इमामबाड़ा140 साल से हिंदू-मुस्लिम एकता और गंगा जमुनी संस्कृति का बेमिसाल उदाहरण है। इसे 1880 में मेरे दादा गयादीन धानुक द्वारा कायम किया गया था इसके बाद मेरे पिताजी किशनू खलीफा जो मिरर दादा थे उनका अनुकरण  तभी से अजादारी का जो सिलसिला चला वो अब तक जारी है। इस इमामबाड़े में दूर-दूर से हर धर्म मज़हब के लोग जियारत के लिए आते हैं यहां ताजिया पर हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीर भी मैं लगाता हूं क्योंकि हम सभी का भगवान तो एक ही हैं न। 
सोमवार को जब  हरीश चंद्र जी की मौत की खबर आई तो मुझे भी पीड़ा हुई फोन किया तो उनकी बेटी  ने बताया कि पिता जी नही रहे 4 बेटे और एक बेटी अज़ादारी को पिता की तरह ही आगे  जारी रखने की बात करते हुए कहते है बसीरतगंज रकाबगंज स्थित किसनू खलीफा इमामबाड़े में मातम और मजलिस का सिलसिला आगे भी जारी रहेगा हमारे पूरे परिवार व रिस्तेदार अकीदत की बुनियाद पर अजादारी करते आए हैं और करते रहेंगे। बताया जाता है कि यहां 9 मोहर्रम तक मातम और मजलिस का आयोजन होता है तथा अजाखाने में आठ सफर को शब्बेदारी होती है।
अज़ादार हरीशचंद्र धानुक लखनऊ की मिली जुली तहज़ीब के एक स्तंभ थे सौ साल से भी ज़्यादा वक़्त से उनके खानदान में ताज़ियादारी की परंपरा चली आ रही है। बशीरतगंज इलाकर में उनके घर का इमामबाड़ा किशनु ख़लीफ़ा के नाम से मशहूर है। चला गया इकज़हती की मिसाल का एक तारा- नही रहे ताज़ियादार हरिश्चन्द्र 
 इकज़हती का परचम लिये ताज़ियादार हरिश्चन्द्र जी को यदि अपने शब्दों में कहूँ तो वे हमेसा यही पैगाम देते रहे कि-
बड़े अनमोल रिश्ते हैं इन्हे बरबाद मत करना 
मेरे भाई  के आँगन में खड़ी दीवार मत करना
 यूं ही नही नवाबी नगरी की गंगा-जमुनी संस्कृति की मिसाल पूरी दुनिया में दी जाती है यहां की आबो हवा में जहां इकज़हती का श्वर गुंजित होता वही एक दूसरे के धार्मिक  आयोजनो में हिन्दू-मुस्लिम पूरे अकीदे  के साथ शिरकत भी करते हैं। इसी इकज़हती का राजधानी लखनऊ में परचम लहराने वाले किशनू खलीफा इमामबाड़े के ताजियेदार हरिश्चन्द्र का लंबी बीमारी के बाद सोमवार को निधन हो गया ।
ताज़ियादार हरिश्चंद्र जी के निधन की खबर सुनते ही क्या हिदू क्या मुस्लिम हर किसी का दिल ग़मज़दा हो चला  उनके पूर्वजों द्वारा स्थापित इस इमामबाड़े में  5 पीढ़ियों से अजादारी का सिलसिला पूरी अकीदत से होता आ रहा था जिसमे हिन्दू-मुस्लिम हमेसा बढ़चढ़कर हिस्सा लिया करते थे।
 करीब 2 साल पहले मुहर्रम में  हरिश्चन्द्र जी ने कार्यालय आकर मुझे दावत दी तो मैं व्यस्तता के वावजूद खुद को नही रोक सका पहुंचकर देखा  तो मंज़र ही अज़ब था अज़ादारी में मुस्लिमो से कहीं ज्यादा संख्या हिन्दू भाइयों की थी आंगन में मंदिर और बगल में उसके सज़ा ताज़िया और उसमें लगे देवी देवताओं के कलेंडर खुद में इकज़हती का नमूना थी  मौलाना जावेद जैदपुरी साहब मजलिस को खिताब कर रहे थे,कर्बला के मंज़र पर ज्यों जी उन्होंने बयानात शुरू किए लोग आंसू नही रोक पाए और तो और  हरिश्चन्द्र के घर के लोग सीनाजनी करते हुए या हुसैन के नारे भी बुलंद करते रहे।आयोजन के उपरांत जब मैंने उनसे  किशनू खलीफा इमामबाड़ा के बारे में जानकारी ली तो उन्होंने बताया कि यह इमामबाड़ा140 साल से हिंदू-मुस्लिम एकता और गंगा जमुनी संस्कृति का उदाहरण है। इसे 1880 में मेरे दादा गयादीन धानुक द्वारा कायम किया गया था इसके बाद मेरे पिताजी किशनू खलीफा जो मेरे दादा थे उनका अनुकरण हम सब करते आ रहे है अजादारी का जो सिलसिला चला वो अब तक जारी है और आगे भी जारी रहेगा । हरिश्चन्द्र के परिवार वालों का कहना है कि इस इमामबाड़े में दूर-दूर से हर धर्म मज़हब के लोग जियारत के लिए आते हैं यहां ताजिया पर हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीर भी हम लोग लगाते हैं  क्योंकि हम सभी का भगवान तो एक ही हैं । 
सोमवार को जब  हरीश चंद्र जी की मौत की खबर आई तो मुझे भी पीड़ा हुई फोन किया तो उनकी बेटी  ने बताया कि पिता जी नही रहे 4 बेटे और एक बेटी अज़ादारी को पिता की तरह ही आगे  जारी रखने की बात करते हुए कहते है बसीरतगंज स्थित किसनू खलीफा इमामबाड़े में मातम और मजलिस का सिलसिला आगे भी पहले की ही तरह जारी रहेगा हमारे पूरे परिवार व रिस्तेदार अकीदत की बुनियाद पर अजादारी करते आए हैं और करते रहेंगे। वे कहते है कि 9 मोहर्रम तक मातम और मजलिस का आयोजन होता है अजाखाने में आठ सफर को शब्बेदारी होती है। 
कहना न होगा अज़ादार हरीशचंद्र धानुक के निधन से लखनऊ की मिली जुली तहज़ीब का एक स्तंभ कम हो गया। सौ साल से ज़्यादा वक़्त से उनके खानदान में ताज़ियादारी की परंपरा रही है। बशीरतगंज में स्थित उनके घर का इमामबाड़ा किशनु ख़लीफ़ा काफी मशहूर है। 
  किसी शायर ने  क़्या खूब लिखा है बनवाओ शिवाला या मस्जिद, है ईंट वही,चूना है वही। 
  • मेमार वही, मज़दूर वही, मिट्टी है वही, चूना है वही।

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