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गांवों की तस्वीर ?
ऐसे कैसे गांवों की तस्वीर ?

ऐसे कैसे बदलेगी गांवों की तस्वीर ?

अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार
देश के ग्रामीण इलाकों की सूरत बदलने के मकसद से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब गत 15 अगस्त को लाल किले के प्राचीर से ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ का ऐलान किया था, तो माना गया था कि अगर यह महत्वाकांक्षी योजना कामयाब रही तो निश्चित ही भारत में ग्राम विकास का नया मॉडल सामने आएगा। लेकिन इसी के साथ कई जानकारों ने योजना पर सवाल उठाते हुए इसकी कामयाबी को लेकर संदेह भी जताया था, जो अब इस योजना के क्रियान्वयन की बारी आने पर और पुख्ता हो रहा है। विपक्ष के ही नहीं, सत्तारूढ़ दल के भी कई सांसदों ने इस योजना से जुड़ीं विसंगतियों और इसकी राह में आने वाली रुकावटों की ओर ध्यान खींचा है। योजना को लेकर सबसे बड़ी रुकावट महसूस की जा रही है कि इसके लिए अलग से धन का कोई प्रावधान नहीं किया गया, बल्कि सांसदों से अपेक्षा की गई है कि अपनी ‘संसदीय क्षेत्र विकास निधि’ (एमपीलैड) का उपयोग करें। साथ ही, ग्रामीण विकास से जुड़ीं अन्य केंद्रीय योजनाओं तथा ग्राम पंचायतों को उपलब्ध कोष को समन्वित करें। आवश्यकता हो तो कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) के तहत कंपनियों ने सामाजिक विकास के लिए जो धन रखा है, उसे जुटाने की कोशिश करनी चाहिए। सांसद चाहें तो सामाजिक-पारमार्थिक संस्थाओं की मदद भी ले सकते हैं। सवाल है कि क्या ऐसा करना इतना आसान है, जैसा कि समझाया जा रहा है। जहां तक एमपीलैड की बात है, तो उस पर दूसरे मंत्रालयों की भी निगाहें हैं। मसलन, पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने सांसदों से इस धन से घरों और सार्वजनिक स्थलों पर शौचालय एवं कचरा प्रबंधन की परियोजनाएं बनाने को कहा है, तो मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इस पैसे से स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय बनाने का अनुरोध किया है। योजना को लेकर सांसदों के सामने एक और चुनौती भी है, जो उनके अपने राजनीतिक भविष्य से जुड़ी है। वे आशंकित हैं कि अपनी कोशिशों से वे एक गांव को आदर्श बना देंगे, तो उससे उनके चुनाव क्षेत्र के दूसरे सैकड़ों गांवों में ईष्र्या का भाव पैदा होगा, जिसकी कीमत उन्हें आने वाले चुनाव में चुकानी पड़ सकती है। एक सांसद पांच साल में पांच आदर्श गांव बना भी दे तो सिर्फ पांच गांवों के वोट से तो चुनाव जीत नहीं सकता। चुनाव के वक्त दूसरे गांवों में वोट मांगने जाएंगे तो वहां के लोग कहेंगे कि जाओ, जिन गांवों को आदर्श बनाया है, उन्हीं गांव से वोट मांगो। फिर गांवों के चयन की कसौटी का सवाल भी है। भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने जब एक गांव का चयन किया, तो आलोचना हुई कि कानपुर से महज 15 किलोमीटर दूर स्थित ऊंची-ऊंची इमारतों वाले और तेजी से शहर का रूप लेते गांव का वह और क्या विकास करेंगे? सांसदों द्वारा गांवों के चयन के सिलसिले में सामाजिक-सांप्रदायिक तनाव और भेदभाव बढ़ाने वाली खतरनाक प्रवृत्ति भी उभर कर आई है। सवाल है कि धन की उपलब्धता से जुड़े निर्णायक मसले के साथ ही इन सारे अहम मुद्दों की अनदेखी कर योजना के कामयाब होने की कल्पना कैसे की जा सकती है? कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री का मकसद इस योजना के जरिए देश के लगभग छह लाख गांवों को उनका वह हक दिलाना है, जिसकी परिकल्पना स्वाधीनता संग्राम के दिनों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने की थी। गांधी की नजर में गांव गणतंत्र के लघु रूप थे, जिनकी बुनियाद पर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की इमारत खड़ी होनी थी लेकिन गांधी की वैचारिक विरासत के दावेदारों यानी आजाद भारत के शासकों ने विकास का जो मॉडल अपनाया, उससे आजादी के साढ़े छह दशकों में गांवों की हालत बदतर होती गई। वैसे, चुनिंदा गांवों के विकास की योजना पहली बार सामने नहीं आई है। वित्त वर्ष 2009-10 में यूपीए सरकार ने भी इसी तरह का एक कार्यक्रम ‘प्रधानमंत्री आदर्श गांव योजना’ के नाम से शुरू किया था। इसमें चुने जाने वाले गांव वे थे, जिनमें अनुसूचित जातियों की आबादी पचास फीसद से अधिक हो। यह कसौटी मायने रखती थी, क्योंकि दलित हमारे समाज के सबसे दबे-शोषित और वंचित समुदाय हैं। वह योजना कितनी कारगर रही, यह ठीक-ठीक कोई नहीं बता सकता। शायद योजना शुरू करने वाले भी नहीं। हालांकि नई योजना में वैसी कोई सामाजिक कसौटी नहीं रखी गई है। दरअसल, इस योजना के तहत आदर्श गांवों की अवधारणा में बुनियादी ढांचे को छोड़ दें तो बाकी बातें वही हैं, जो पंचायती राज या गांवों पर केंद्रित अन्य योजनाओं के संदर्भ में कही जाती रही हैं। तमाम दावों और आदर्श वचनों के बावजूद हमारे गांवों की हालत दिनोंदिन खराब होती जा रही है। बदहाली के हिंद महासागर में संपन्नता के कुछ टापुओं को छोड़ दें तो बाकी सारे गांवों में जीने के लिए आवश्यक बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं।

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