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Wednesday 19 September 2018
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निराश होती दिख रही है उत्तर प्रदेश में भाजपा

निराश होती दिख रही है उत्तर प्रदेश में भाजपा

लेख – अजय कुमार    
उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी केन्द्र में चल रहे घटनाक्रम से चिंतित नजर आ रही है। उम्मीद के विपरीत मोदी सरकार का दस माह का रिपोर्ट कार्ड सही नहीं रहा है। खासकर कृषि और किसानों की समस्याओं को लेकर सरकार कसौटी पर खरी नहीं उतर पाई है, जबकि मनामोहन सरकार से त्रस्त किसानों ने आम चुनाव में दिल खोलकर मोदी का साथ दिया था। किसानों की माली हालत आज भी जस की तस है। आर्थिक तंगी और प्रकृति की मार से किसानों को होने वाले नुकसान से बचाने केन्द्र या फिर राज्य सरकार के पास कोई नीति नहीं होने के कारण भारत की रीढ़ की हड्डी (किसान) कमजोर होती जा रही है। 1990 के दशक से किसानों की आत्महत्याओें के मामले सुर्खियां बटोर रहे हैं। प्राकृतिक उतार−चढ़ाव के कारण तो किसान मरता ही है, इसके अलावा लालफीताशाही, समय पर बीज, खाद, सिंचाई के लिये पानी नहीं मिल पाने के कारण भी उसे नुकसान उठाना पड़ता है। आंकड़े बताते हैं कि 1995 से लेकर अब तक करीब तीन लाख किसान परेशान होकर आत्महत्या कर चुके हैं।

मोदी ने आम चुनाव के प्रचार के समय बाजार और किसानों के बीच किसानों की मेहनत का बढ़ा हिस्सा हजम कर जाने वाले बिचौलियों, साहूकारों को लेकर काफी हमलावर रूख अपनाया था, लेकिन किसान आज भी बिचौलियों और साहूकारों के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाया है। एक तरफ तंगहाली और भुखमरी से किसान जूझ रहा है तो दूसरी तरफ किसानों के नाम पर नेतागिरी हो रही है। पीएम मोदी लगातार और किसानों से आकाशवाणी पर ‘मन की बात’ में कहते हैं कि विपक्ष किसानों को बरगला रहा है, वहीं विपक्ष मोदी सरकार पर किसानों के हितों से खिलवाड़ करने का आरोप लगा रहा है। इस खेल में वो कांग्रेस सबसे आगे है जिसने करीब आधी सदी तक मुल्क पर हुकूमत की है। राजनीति का स्तर इतना गिर गया है कि यह पता ही नहीं चल पा रहा है कि किसको किसानों की चिंता है और कौन घडि़याली आंसू बहा रहा है। नेता तो नेता किसानों के नुमांइदे भी सच्चाई सामने नहीं ला रहे हैं। किसान लगातार बदहाल होता जा रहा है वहीं किसान को नाम पर राजनीति करने वाले बलवान हो रहे हैं। शहीद दिवस के मौके पर पंजाब में एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बेमौसम बरसात के कारण बर्बाद हुई फसल का मुआवजा देने और किसानों को पांच हजार रूपया पेंशन देने की बात कहकर विपक्ष और समाज सेवी अन्ना हजारे की मुहिम को झटका दिया और किसानों को खुश करने की कोशिश जरूर की है लेकिन देखना है कि उनका यह वादा अमल में आ पाता है या नहीं।

आजादी के पहले तो किसान मर ही रहा था आजादी के बाद भी किसान की स्थिति में किसी तरह का सुधार आने के बजाय हालात खराब होते जा रहे हैं। हर आधे घंटे में भारत में एक किसान आत्महत्या करता है। असल आकंड़े इससे भी भयानक हैं, क्योंकि हिन्दुस्तान की हुकूमतों ने ‘किसान’ शब्द की व्याख्या ही सही नहीं की है। भारत सरकार की नजरों में किसान वही है जिसके नाम जमीन हो। वह स्त्रियों, दलितों, किराये पर जमीन ले कर खेती करने वालों और आदिवासी खेतीहरों को किसानों की श्रेणी में ही नहीं रखता है। इसलिये ऐसे लोगों की आत्महत्या के कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। सिर्फ सरकारी आंकड़ों पर ही ध्यान दिया जाये तो अकेले वर्ष 2009 में ही 17,638 किसानों ने आत्महत्या की। 2010 में एक किसान ने तो जान देने से पहले एक महंगे स्टैम्प पेपर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखा था कि उसकी आत्महत्या का कारण 2 साल से उनकी फसल का नाश और कर्ज उगाहने के लिये की गई प्राइवेट बैंकों की प्रताड़ना है। महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्याएं की घटनाएं सबसे अधिक होती हैं। वहीं उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में सूखे, भुखमरी और सूदखोरों के कारण किसान जान दे रहे हैं।

1995 से 2009 के बीच 2 लाख 41 हजार 679 किसान अपनी जान ले चुके थे। 2010 तक सरकारी आंकड़ा 2 लाख 50 हजार तक जा पहुंचा था। ढाई लाख मृत किसानों के परिवारों के 15 लाख स्त्रियां, बच्चे और बुजुर्ग थे। उन सब का क्या हुआ? कितनों ने परिवार के मुखिया के साथ ही जान दे दी, कितने भूख और इलाज के अभाव में मर गये? कितनों ने तड़प−तड़प कर जान दे दी? या फिर उनके घरों की बहू−बेटियां देह व्यापार में ढकेल दी गईं। शहरों में मजदूर बने? वेश्यावृति अपनाई? शरीर के अंग बेचे? बुंदेलखंड में लगातार बच्चों तक को बेचने की खबरे छपती रही हैं। इस बारे में सरकार ने कभी आंकड़े नहीं जुटाये। 2010 तक 15 लाख लोगों का जीवन मौत से बदतर हो गया था। लाखों किसान आज भी आत्महत्या कर रहे हैं या करने वाले हैं? इसका कारण है उनकी समस्याएं कम करने के लिये किसी ठोस नीति का अभाव। बहुत पहले ही किसान को उद्योगपति और कृषि को उद्योग का दर्जा मिल जाना चाहिये था लेकिन यह हो न सका। देश में किसानों की संख्या तेजी से घट रही है। 1991 और 2001 के बीच 80 लाख किसान खेती छोड़ चुके थे। 2011 तक और एक करोड़ किसान कम हो चुके होंगे। अर्थात एक लाख किसान हर साल खेती छोड़ रहा है। खेती छोड़कर यह किसान परिवार कहा जाते कहां हैं? यह समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। गांव से पलायन करके ज्यादातर शहर में मेहनत−मजदूरी करके अपना पेट भरते हैं। कुछ ही ऐसे नसीब वाले होते हैं जो शहर की रफ्तार के साथ आगे बढ़ पाते हैं। शहरों में बढ़ती झुग्गी झोपडि़यों की संख्या आपको बता देगी कि गांव छोड़ने के बाद जिस गरीबी और अपराध की दुनिया से किसान का सामना होता है, उसकी उसने कल्पना भी नहीं की होती है। भारत में कम से कम 45 करोड़ छोटे किसान हैं जिनके खिलाफ सुनियोजित साजिश हो रही है। भारत सरकार की कृषि विरोधी नीतियों के द्वारा एक सुनियोजित षडयंत्र के तहत इन 45 करोड़ लोगों के हाथ से कृषि छीन कर विदेशियों और पूंजीपतियों को उनकी जमीन सौंपी जा रही है, जबकि होना यह चाहिए था कि कृषि सम्पन्न राष्ट्र में कृषि को उद्योग और किसानों को उद्योगपति का दर्जा देकर उन्हें वह सभी सुविधाएं मुहैया करना चाहिए जो उद्योगपति को मिलती है। किसान खैरात नहीं अपना हक चाहता है। वह देश का पेट भरता है। अन्नदाता है। अन्नदाता ही बेहाल रहेगा तो देश का भला कैसे हो सकता है।

उत्तर प्रदेश में गन्ना किसान कभी अपनी समस्याओं से उबर नहीं पाये। चीनी मिल मालिक हजारों करोड़ रूपये का गन्ना भुगतान दबाये बैठे रहते हैं। यह आरोप विपक्षी दल और किसान नेता हमेशा लगाते रहते हैं तो इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि चीनी मिल मालिकों की स्थिति भी दयनीय है। गन्ने का मूल्य सरकार लगातार बढ़ाती जा रही है लेकिन चीनी के गिरते दाम को रोकने के लिये कुछ नहीं किया जा रहा है। कभी इस ओर ध्यान दिया ही नहीं जाता है कि कब चीनी का आयात करना है और कब नहीं। लगातार कई वर्षों से चीनी मिलें बुरी तरह घाटे पर चल रही हैं। गलत शीरा नीति के कारण उन चीनी मिलों को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है, जिनके पास अपनी डिस्लरी नहीं है। ऐसी चीनी मिली जों अपने यहां विद्युत उत्पादित कर राज्य विद्युत परिषद को बिजली बेचती हैं उनके बकाया विद्युत मूल्य का करोड़ों रूपया राज्य विद्युत परिषद अभी भी दबाये बैठा है जिसके कारण गन्ना किसानों को उनकी फसल का समय पर भुगतान नहीं हो पा रहा है।

बहरहाल किसान किसी न किसी वजह से पिस्ता ही रहता है। हाल में हुई बे−मौसम बरसात ने लाखों एकड़ फसल चौपट कर दी। किसान हित का दावा करने वाली अखिलेश सरकार ने मुआवजे की घोषणा तो जरूर की है लेकिन यह मुआवजा ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ के बराबर है। एक तरफ समाजवादी सरकार भूमि अधिग्रहण बिल के नाम पर मोदी सरकार को घेरने में लगी है तो दूसरी तरफ बसपा सुप्रीमो मायावती समाजवादी सरकार को किसान विरोधी करार देने में लगी हैं। बरसात से बर्बाद हुई फसल का मुआवजा किसानों को नहीं मिल पाने के कारण बसपा अखिलेश सरकार को घेर रही है।

 



A group of people who Fight Against Corruption.


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