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Thursday 15 November 2018
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मुख्य मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने का खेल

लेख –धर्मेंद्रपाल सिंह

लगता है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) तिहरी रणनीति पर चल रहा है। संघ के तीन धड़े तीन अलग-अलग सुरों में बात कर रहे हैं। पहला धड़ा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) है, जिसके नेतृत्व में केंद्र में सरकार चल रही है। यह सरकार विकास के नाम पर बाजार आधारित अर्थव्यवस्था पर अमल के लिए बेदर्दी से भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन, कोयला उद्योग के निजीकरण और मनरेगा जैसी जन-कल्याणकारी योजना में कतर-ब्योंत को प्रतिबद्ध है। दूसरे धड़े में विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, दुर्गा वाहिनी जैसे संगठन हैं, जो धर्मांतरण (घर वापसी), लव-जिहाद और महिलाओं को चार बच्चे पैदा करने की नसीहत देकर सांप्रदायिक तनाव फैला रहे हैं।
इन चरमपंथी हिंदू संगठनों का मकसद जनता का ध्यान मुख्य मुद्दों से भटकाना है। तीसरा धड़ा स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय किसान संघ और भारतीय मजदूर संघ का है, जो मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन और कोयला उद्योग के निजीकरण जैसे कामों की मुखालफत कर रहा है। आज केंद्र में भाजापा का शासन है, फिर भी ये संगठन सरकार के सामने खड़े हैं।
संघ की रणनीति स्पष्ट है। उसके कर्णधार उदारीकरण और खुली अर्थव्यवस्था के समर्थक हैं, इसीलिए भाजपा सरकार के माध्यम से बाजार आधारित अर्थव्यवस्था पर आधारित नीतियों को लागू किया जा रहा है। उसके बाकी धड़े देश में भ्रम फैलाने और लोगों को उलझाने का काम कर रहे हैं। जनता का ध्यान हटाने के लिए समाज में सांप्रदायिकता का जहर घोला जा रहा है, सरकारी नीतियों के विरोध का नाटक रचा जा रहा है।
ऐसे में अपनी बात को मौजूदा आर्थिक स्थिति पर केंद्रित रखना जरूरी है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) की ताजा जारी रिपोर्ट इस तथ्य की तस्दीक करती है कि आम आदमी ने पिछले दो दशक के उदारीकरण राज में भारी कीमत चुकाई है। मोदी सरकार बाजार आधारित अर्थव्यवस्था की प्रबल समर्थक है और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो इस मॉडल के जनक माने जाते हैं। रिपोर्ट से पता चलता है कि गरीब और अमीर के बीच की खाई कितनी तेजी से चौड़ी होती जा रही है।
सर्वे में शहरों के सबसे संपन्न दस फीसद लोगों की औसत संपत्ति 14.6 करोड़ रुपए आंकी गई, जबकि सबसे गरीब दस प्रतिशत की महज 291 रुपए। यानी शहरी अमीरों के पास गरीबों के मुकाबले पांच लाख गुना ज्यादा धन-दौलत है। गांवों में कुबेर और कंगाल आबादी की संपत्ति का अंतर थोड़ा कम है, फिर भी यह एक ओर तेईस हजार के आसमानी अंतर पर है। गांवों में सबसे अमीर दस प्रतिशत लोगों की औसत संपत्ति 5.7 करोड़ रुपए और सबसे गरीब दस फीसद की 2507 रुपए है। और हिसाब लगाएं तो पता चलता है कि शहर के अमीर आदमी के पास गांव के रईस की अपेक्षा लगभग ढाई गुना दौलत है। गरीबों के मामले में आंकड़ा उलट है। गांवों के गरीब के पास शहर के कंगाल की अपेक्षा आठ गुना से अधिक धन है। इसका अर्थ यही हुआ कि गांव छोड़ कर शहर जाने वाले किसान-मजदूरों की माली हालत में कोई विशेष अंतर नहीं आता है।
रिपोर्ट के अनुसार आज गांवों की एक तिहाई और शहरों की एक चौथाई आबादी कर्ज के बोझ तले दबी है। जहां सन 2002 में गांवों के सत्ताईस फीसद लोगों ने ऋण ले रखा था वहीं 2012 में इकतीस प्रतिशत लोगों पर कर्ज चढ़ा था। इन दस वर्षों में ऋण की रकम भी बढ़ कर लगभग दो गुना (17,539 से बढ़ 32,522 रुपए) हो गई।
महंगा मकान खरीदने के मोह में शहरों में एक दशक के भीतर कर्ज की रकम सात गुना से ज्यादा हो गई। सन 2002 में शहरों में औसत कर्ज ग्यारह हजार सात सौ इकहत्तर रुपए था, जो 2012 में बढ़ कर चौरासी हजार छह सौ पचीस रुपए हो गया।
यहां गणना में बरती चालाकी का जिक्र करना जरूरी है। औसत निकालते वक्त उन लोगों को भी गिना गया, जिन्होंने एक इकन्नी भी उधार नहीं ले रखी है। इसी वजह से ऋण की रकम घट गई। अगर कुल कर्ज की रकम और केवल कर्ज लेने वाली आबादी का हिसाब लगाया जाए तो आंकड़ा उछल कर आसमान पर पहुंच जाता है। इस तरह गणना करने पर गांवों में औसत ऋण एक लाख तीन हजार चार सौ सत्तावन और शहरों में तीन लाख अठहत्तर हजार दो सौ अड़तीस रुपए बैठता है।
सर्वे के अनुसार गांवों में अट्ठावन प्रतिशत कृषक परिवार हैं। कृषक परिवार वह है, जिसका कम से कम एक सदस्य खेती करता हो और जो एक वर्ष में कम से कम तीन हजार रुपए खेती से कमाता हो। आज नब्बे फीसद किसानों के पास दो हेक्टेयर से कम और एक तिहाई के पास केवल 0.4 हेक्टेयर जमीन है। जोत के घटते आकार की वजह से आधे से अधिक किसानों पर कर्ज चढ़ा हुआ है। इसी कारण गांवों में आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। गृह मंत्रालय और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट इसकी तस्दीक करती है।
अब बड़े और छोटे दोनों श्रेणी के किसान परिवारों की आय का बड़ा हिस्सा खेती से इतर कामों (पशुपालन, मजदूरी, नौकरी आदि) से आता है। जिन कृषक परिवारों के पास एक हेक्टेयर से कम जमीन है उनकी औसत मासिक आय पांच हजार रुपए से भी कम है। मतलब यह कि अगर पांच सदस्यों का परिवार है, तो हर आदमी को एक हजार रुपए से कम में गुजारा करना पड़ता है। रोजी-रोटी के लाले के चलते आज चालीस प्रतिशत कृषक परिवार के सदस्यों ने मनरेगा जॉब कार्ड बनवा रखे हैं। गांवों की सबसे गरीब आबादी में अनुसूचित जातियों और जनजातियों की भरमार है।
सर्वे के अनुसार गांवों में खाते-पीते किसानों (जिनके पास दस हेक्टेयर जमीन और औसत मासिक आय चालीस हजार रुपए हो) की संख्या महज आधा फीसद है। अब भी देश की अधिकांश आबादी गांवों में रहती है और जब गांवों की स्थिति इतनी दयनीय है, फिर अच्छे दिनों की कल्पना कैसे की जा सकती है?
सर्वे की पौष्टिक आहार पर जारी रिपोर्ट का अध्ययन करने पर तो और भी खतरनाक संकेत मिलते हैं। रिपोर्ट के अनुसार 2011-12 में गांवों में हर व्यक्ति को औसत 2099 कैलोरी वाला भोजन नसीब हो पाता था, जबकि शहरों और कस्बों में कैलोरी की मात्रा 2058 थी। हमारे योजना आयोग का मानना है कि स्वास्थ्य के लिए एक आदमी को एक दिन में 2400 कैलोरी युक्त भोजन मिलना चाहिए।
भारत ने 1991 में बाजार आधारित अर्थव्यवस्था को अपनाया। उदारीकरण की आंधी के शुरुआती दौर (1993-94) में गांवों में औसत कैलोरी खपत 2153 और शहरों में 2071 थी। इसका अर्थ यही हुआ कि खुली अर्थव्यवस्था के मौजूदा दौर में आम आदमी के भोजन का आंकड़ा लड़खड़ाया है। इस दौरान अमीर और गरीब की आय और संपत्ति की खाई ही चौड़ी नहीं हुई है, बल्कि उनके बीच पौष्टिक भोजन की दीवार भी और ऊंची हो गई है। गांवों में रहने वाले सबसे अमीर पांच फीसद लोगों की कैलोरी खपत सबसे गरीब पांच प्रतिशत के मुकाबले दो गुना अधिक है।
सन 1993-94 और 2011-12 के आंकड़ों की तुलना करें तो यह भी पता चलता है कि इस अवधि में प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों की खपत भी कम हुई है। इन अठारह बरसों के दौरान गांवों में प्रोटीन खपत का औसत 602 से घट कर 565 और शहरों में 572 से गिर कर 557 पर आ गया। संतुलित भोजन और खासकर प्रोटीन की कमी स्वास्थ्य के लिए कितनी खतरनाक होती है इसका पता देश में कुपोषण की शिकार विशाल आबादी से लगाया जा सकता है। दुनिया में कुपोषण के शिकार पच्चीस प्रतिशत लोग आज हिंदुस्तान में रहते हैं।
सन 2011 की जनगणना के अनुसार हमारे यहां 2.68 करोड़ लोग विकलांग थे, जो 2001 की जनगणना से छियासठ लाख अधिक हैं। यह संख्या आस्ट्रेलिया की आबादी से अधिक है। विकलांगता का मुख्य कारण बीमारी और कुपोषण हैं। अगर भोजन से प्राप्त कैलोरी कम होती गई तब निश्चय ही विकलांग आबादी में इजाफा होगा और इस इजाफे को भी अच्छे दिनों का संकेत नहीं माना जा सकता।
इसीलिए विश्व बैंक के सलाहकार और मनमोहन सिंह सरकार के आर्थिक सलाहकार रहे कौशिक बसु ने हाल ही में दिल्ली में आयोजित एक सेमिनार में कहा कि अब दुनिया भर के विचारक इस बात पर सहमत हैं कि बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का मॉडल विफल हो गया है। अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देशों में लागू इस मॉडल से गरीबों और अमीरों के बीच की खाई और चौड़ी हुई है। जिस प्रकार साम्यवादी देशों में अर्थव्यवस्था पर पूर्ण सरकारी नियंत्रण का मॉडल विफल हो गया उसी प्रकार धुर दक्षिणपंथी विचारधारा पर आधारित खुली अर्थव्यवस्था का मॉडल चरमरा चुका है। यह महसूस करने के बाद ही विश्व बैंक जैसी संस्था ने अपना लक्ष्य बदल दिया है। उसका उद्देश्य अब केवल गरीबी समाप्त करना नहीं, बल्कि धन का न्यायसंगत बंटवारा है।
बसु के अनुसार भविष्य में विश्व बैंक ‘इजी ऑफ डूइंग बिजनेस’ (व्यापार के अनुकूल माहौल) के बजाय ‘इजी ऑफ लिविंग लाइफ’ (जीवन के अनुकूल माहौल) सूचकांक बनाएगा और इसके आधार पर दुनिया भर के देशों की वरीयता सूची तैयार की जाएगी। सूची से तय होगा कि आम आदमी के जीवन-यापन की श्रेष्ठ सुविधा किस देश में है। वैश्वीकरण की आंधी और बाजार के मोह में जकड़े दुनिया के अधिकतर देशों के करोड़ों लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी गरीबी का दंश झेल रहे हैं। पैसे के बल पर मुट्ठी भर लोगों ने भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं पर कब्जा कर लिया है। हवा और पानी की भी तिजारत हो रही है। आशा है, अपना आर्थिक एजेंडा लागू करते वक्त मोदी सरकार इन सब बातों पर भी गौर करेगी।



A group of people who Fight Against Corruption.


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