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Tuesday 25 September 2018
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नेताजी के निधन की अनसुलझी गुत्थी

नेताजी के निधन की अनसुलझी गुत्थी

नेताजी सुभाष चंद्र बोस 18 अगस्त 1945 को ताइवान में कथित विमान दुर्घटना में मारे गए, उनके साथ रूस में कोई हादसा पेश आया या वह आजाद भारत में किसी साधु संन्यासी के वेश में छिपकर रहे, यह कुछ ऐसे सवाल हैं जो आज भी अनुत्तरित हैं। नेताजी की कथित मौत की जांच के लिए तीन−तीन आयोग बने लेकिन देश के सामने कुछ भी स्पष्ट नहीं हुआ। मुखर्जी आयोग ने 2006 में संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में इस बात को खारिज कर दिया था कि नेताजी की मौत ताइवान में विमान हादसे में हुई थी। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि जापान के रेंकोजी मंदिर में रखी अस्थियां नेताजी की नहीं हैं और इस बारे में आगे जांच की जरूरत है लेकिन सरकार ने न्यायमूर्ति मुखर्जी की इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया। 23 जनवरी 1897 को कटक में जन्मे इस महान क्रांतिकारी के लापता होने के बारे में सच सामने न आने से आज भी उनके बारे में रहस्य बरकरार है। नेताजी के जीवन पर ‘मृत्यु से वापसी नेताजी का रहस्य’ नाम की पुस्तक लिखने वाले और सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय से नेताजी से संबंधित फाइल की मांग करने वाले अनुज धर का कहना है कि इस विषय पर काफी शोध करने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि 18 अगस्त 1945 को नेताजी की मौत नहीं हुई थी।

धर ने कहा कि उन्होंने खुद इस बारे में ताइवान के रिकार्ड खंगाले जिनसे पता चला कि 18 अगस्त 1945 को वहां कोई विमान हादसा हुआ ही नहीं था। भारत सरकार जानती है लेकिन सच छिपाए बैठी है। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने आरटीआई के तहत सरकार से नेताजी से संबंधित फाइल के बारे में जानकारी मांगी तो पहले तो जवाब दिए जाने से इंकार किया जाता रहा और जब वह बार−बार अपील करते रहे तो जवाब मिला कि वह फाइल नष्ट हो गई है। धर ने कहा कि नेताजी के बारे में सच सामने लाने के लिए उन्होंने ‘मिशन नेताजी’ नाम से संगठन खड़ा किया। उन्होंने कहा कि उनके द्वारा किए गए शोध के अनुसार नेताजी आजादी के काफी दिन बाद तक भारत में ही वेश बदलकर रहे। फैजाबाद के गुमनामी बाबा उर्फ भगवन जी से नेताजी की कहानी काफी मिलती जुलती है। धर ने कहा कि उन्होंने भगवनजी के बक्से से मिले हस्तलेखों की जांच जब विशेषज्ञों से कराई तो पता चला कि अंग्रेजी और बांग्ला में उनके द्वारा लिखी गई सामग्री नेताजी सुभाष चंद्र बोस की राइटिंग से मिलती है। उन्होंने बताया कि नेताजी के करीबी रहे बहुत से लोग गुमनामी बाबा से मिलने जाते थे। जब भी उनसे पूछा जाता कि आप सार्वजनिक रूप से सामने क्यों नहीं आते उनका जवाब होता कि मेरी वापसी राष्ट्र हित में नहीं है।

धर ने कहा कि बहुत से लोगों का ऐसा मानना है कि आजादी के समय शायद भारत सरकार और ब्रिटिश सरकार के बीच ऐसा गुप्त समझौता हुआ जिसमें कहा गया कि यदि नेताजी वापस आए तो युद्धबंदी के रूप में अंग्रेजों को सौंप दिए जाएंगे। यदि यह सही है तो हो सकता है कि नेताजी इसीलिए सामने नहीं आए। हालांकि इस समझौते के उनके पास कोई सबूत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने सच सामने लाने के लिए मुखर्जी आयोग की मदद नहीं की और आगे जांच कराने की बजाय उल्टा रिपोर्ट को ही अस्वीकार कर दिया। इतना ही नहीं, बल्कि नेताजी से संबंधित सबूतों को भी नष्ट कर दिया। उल्लेखनीय है कि 30 अप्रैल 1998 को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को नेताजी के बारे में समग्र जांच कराने के लिए एक आयोग गठित करने का निर्देश दिया था ताकि इस संबंध में विवाद हमेशा के लिए खत्म किया जा सके। सरकार ने उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज मुखर्जी का एक सदस्यीय आयोग गठित किया। जांच पूरी होने के बाद आयोग की रिपोर्ट सत्रह मई 2006 को संसद में पेश की गई जिसमें कहा गया कि नेताजी अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन 1945 में विमान हादसे में उनकी मौत नहीं हुई थी।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जापान के रेंकोजी मंदिर में रखीं अस्थियां नेताजी की नहीं हैं। इसमें 1945 में नेताजी के रूस में कथित ठहराव पर कोई टिप्पणी नहीं की गई और कहा कि इस मामले में आगे और जांच की जरूरत है। सरकार ने मुखर्जी आयोग की इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया। आजाद हिन्द फौज के सेनानी राम सिंह का भी यही मानना था कि नेताजी विमान हादसे में नहीं मारे गए थे और वह गुमनामी बाबा के रूप में भारत में ही बहुत दिनों तक रहे। नेताजी के डलहौजी प्रवास के बारे में ‘जब आए थे सुभाष हिम के आंचल में’ नाम की पुस्तक लिखने वाले हरेंद्र श्रीवास्तव का कहना है कि अब रहस्य से शायद ही पर्दा उठ पाए। इसलिए बहस छोड़ नेताजी को अपने दिलों में महसूस किया जाए। नेताजी लोगों के दिलों में आज भी जिन्दा हैं।



A group of people who Fight Against Corruption.


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