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Sunday 23 September 2018
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पूर्ण बहुमत किसी प्रमुख दल को न मिला तो……..?

पूर्ण बहुमत किसी प्रमुख दल को न मिला तो……..?
हो हल्ला और लम्बी चौड़ी भाषण बाज़ी व तरह तरह की घोषणाओं  तथा बाजीगरी के साथ उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव निपट गया अब परिणाम आने में कुछ समय ही शेष है पार्टियों और प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला ईवीएम मशीनों से जल्द ही बाहर आने  वाला है । सपा-कॉंग्रेस गठबंधन नेता अखिलेश यादव व राहुल गांधी चुनाव में 300 सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती भी बहुमत मिलने का दावा कर रही हैं। भाजपा भी  पूरी तरह से जीत के प्रति  आस्वस्त  है इस पार्टी के नेता भी 265 प्लस का दावा कर रहे हैं। कहने का मतलब यह की  सभी दलों का दावा बहुमत मिलने का ही नहीं बल्कि दो तिहाई सीटें जीतने का है। पर, यह सवाल अपनी जगह है कि अगर ऐसा न हुआ तो फिर क्या होगा?
क्या नए समीकरण बनेंगे ? मौजूदा दोस्त किसी नए दोस्त को गले लगायेंगें  या यूं कहे की  दुश्मन भी  दोस्त बन जाएगा? इनका उत्तर नतीजों के बाद ही मिल पाएगा।
लोगों के दिल व दिमाग में यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि चुनावी जंग अब  सात चरण के बाद पूरी हो चुकी  है। हर चरण का ट्रेंड अलग-अलग तरह का देखा गया है इसलिए भले ही सभी प्रमुख राजनीतिक दल चुनाव बाद अपनी-अपनी पार्टियों की सरकार बनाने का दावा कर रहे हों लेकिन एक संभावना यह भी जताई जा रही हैं कि पार्टियां बहुमत के लिए तय 202 सीटों का आंकड़ा हासिल करने से कुछ पीछे रह जाएं।कयास लगाये जा रहें हैं की यदि सपा-कॉंग्रेस गठबंधन को पूर्ण  बहुमत न मिला और  सबसे ज्यादा सीटें मिलीं तो क्या  होगा,  तब उसके सामने पहला विकल्प रालोद और निर्दल ही होंगे। भले ही रालोद और सपा में चुनाव से पहले गठबंधन पर बात न बन पाई हो लेकिन सरकार बनाने की स्थिति बनी तो सपा-कॉंग्रेस गठबंधन के साथ रालोद धर्मनिरपेक्ष ताकतों को मजूबती देने के तर्क के साथ हाथ मिला सकता है वैसे भी लोकदल पार्टी के सुप्रीमों सत्ता बनाने के करीब होने वालों के पाले में बैठने में माहिर जाने जातें हैं ऐसे में वो  सरकार में शामिल होने  का फैसला ले सकतें हैं ।

अन्य छोटे दल जो थोड़ी सीटें लेकर आतें  हैं इन दलों  का भी समर्थन सरकार बनाने के लिए इस गठबंधन को मिल सकता है। वैसे तो सपा और बसपा को दो धुर विरोधी दल माना जाता है पर, बसपा की सीटों का आंकड़ा कांग्रेस सपा गठबंधन और भाजपा दोनों से अगर पीछे रहा तो जंग व सियासत में कुछ भी असंभव नहीं की कहावत भी चरितार्थ हो सकती है।
ऐसी स्थिति में संभावना यह भी  हो सकती है कि भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए बसपा तटस्थ भूमिका अपनाकर सपा-कॉंग्रेस गठबंधन के लिए सरकार बनाने व विश्वासमत हासिल करने का रास्ता आसान कर दे क्यों कि बसपा सुप्रीमों मायावती खुले तौर पर एलान करचुकी हैं की वो किसी भी सूरत में भाजपा से हाँथ नहीं मिलाएगी ,ध्यान रखने वाली बात यह भी है कि सपा की कमान अब उन मुलायम सिंह यादव के हाथ में नहीं है जिनके मुख्यमंत्रित्व काल में गेस्ट हाउस कांड हुआ था।
यही नहीं, मायावती की तरफ से शिवपाल को लेकर लगातार नरम रुख भी किसी नए समीकरण का सूत्रधार बन सकता है।अब अगर यह भी होता है की बसपा अच्छी तादात में सीटें लेकर आती है तो कांग्रेस व सपा गठबंधन का रुख भी किसी तरह भाजपा को सत्ता से दूर ही रखने की रणनीति ही रखेगा जिसके लिए सपा नेता शिवपाल भी बसपा के लिए अहम् रोल निभा सकतें हैं क्योंकि सत्ता से बाहर जाते देख यादव परिवार के बीच जो दूरियां है वो बदलेंगीं या तो चरम पर जायेंगीं या सिमट कर ख़त्म होने के करीब होंगीं ,जाहिर है ऐसी  स्थिति आती है तो  सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए किसी न किसी नए साथी को साथ लेना ही पड़ेगा। इससे मौजूदा समीकरणों में कुछ न कुछ बदलाव जरूर होगा। वैसे अतीत में भी कई ऐसे प्रसंग सामने आ चुके हैं जब चुनाव पूर्व गठबंधन नतीजों के बाद नए समीकरणों के चलते टूटे हैं या फिर नए गठबंधन सामने आए हैं।अगर बसपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी लेकिन उसकी सीटों का आंकड़ा बहुमत तक न पहुंचा, उस स्थिति में बसपा के सामने एक विकल्प तो सपा जैसा ही होगा। जिसमें वह रालोद, निर्दलीयों या अन्य छोटे दलों को सरकार में शामिल कर सरकार बना लें। रालोद पहले भी विधानपरिषद चुनाव में बसपा का समर्थन कर चुका है। दूसरा रास्ता कॉंग्रेस का साथ है। भले ही कॉंग्रेस का आज सपा के साथ गठबंधन है लेकिन यहां भी सियासत में सब जायज वाली कहावत लागू होती है।
बसपा केंद्र की यूपीए सरकार को भी समर्थन देती रही है। इस चुनाव प्रचार में भी खास बात यह ध्यान में रखने वाली है कि मायावती या राहुल गांधी ने एक-दूसरे पर प्रहार नहीं किए हैं। रही बात भाजपा से साथ की तो बसपा के साथ गठबंधन या समर्थन से प्रदेश में तीन बार सरकारें बनी हैं।
पर, इस बार दोनों के एक साथ होने की संभावना काफी क्षीण हैया यू कहें की ना के बराबर है  मायावती खुद कह चुकी हैं कि बहुमत न भी मिला तो वह भाजपा से हाथ मिलाकर मुसलमानों को धोखा नहीं देंगी। सरकार बनाने के बजाय विपक्ष में बैठना पसंद करेंगी।भाजपा की बात करें तो बहुमत न मिलने पर उसके सामने समीकरण काफी सीमित दिखाई दे रहे हैं। सपा या कॉंग्रेस की तरफ से भाजपा को कोई समर्थन या प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सहयोग मिलने की संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती। रालोद से भी भाजपा के रिश्ते बहुत मधुर नहीं है।
चुनाव पूर्व दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन की चर्चा फैली जरूर थी लेकिन दोनों तरफ से इन्कार कर दिया गया था। फिर भी संभव है कि सरकार में भागीदारी की शर्त पर दोनों पार्टियों के बीच दोस्ती हो जाए लेकिन यह तभी संभव है जब भाजपा २०० सीटों के अरीब करीब आये ।इसके अलावा भाजपा के सामने भी निर्दलीयों व निषाद पार्टी जैसे छोटे दलों को साथ लेकर सरकार बनाने का विकल्प है। जहां तक दूसरे दलों में तोड़फोड़ का विकल्प है तो भाजपा ऐसा करने की कोशिश भी करेगी, लेकिन इसकी संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती।



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