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Tuesday 18 September 2018
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रामलला से रामलीला रामः रामः हाः राम!

रामलला से रामलीला रामः रामः हाः राम!

रिपोर्टवरिष्ठ पत्रकार राम प्रकाश वरमा

रामायण संग्रहालय, रामलीला थीम पार्क बनाने का फैसला और राम मंदिर निर्माण के हल्ले के साथ तीन तलाक का मसला ऐन चुनावी चहचहाहट के दौरान सुर्खियों में है। यह भोले-भाले लोगों की धार्मिक श्रद्धा से खिलवाड़ भी है और गरीब-गुरबां की असल जरूरियात को दरकिनार कर भावनात्मक हमला भी। इससे किसका भला होगाघ् सियासतदानो का या सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानियों काघ् इन अहम सवालों के बीच ऐशबाग लखनऊ के रामलीला मैदान में गूंजे जय श्रीराम के जयकारे पर उठी अंगुलियों के पीछे की सच्चाई पर बेबाक रपट

लखनऊ। सूबे की सियासत के मोहल्ले में भारतीय जनता पार्टी को अव्वल शख्सियत और देश के वज़ीर-ए-आज़म के तम्बू के नीचे विराजमान रामलला से तकरीबन सवा सौ किलोमीटर पहले ऐशबाग रामलीला में जा पहुंचने और जयश्रीराम का जयघोष करने कराने से दीगर पार्टियों की बेचैनी को अगर भाजपा की वापसी का पहला मजबूत कदम माना जाय तो गलतबयानी न होगी। इस पर मुहर लगाती जानी मानी पत्रिका व एक एजेंसी की सर्वे रिपोर्ट भी हाल ही में चर्चित हुई है।

हालांकि ऐसा आंकलन तो खुद भाजपा के पहली कतार में खडे़ नेता भी नहीं कर रहे है। रामलीला मैदान में जमा हुए भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ता और तमाम झूठे नारों वायदों व घोषणाओं से मुतास्सिर जमात के बीच आम आदमी जिसे सच्चा वोटर माना जाता है, की मौजूदगी न के बराबर थी। हां एक तिहाई लखनऊ के बीच से गुजरते प्रधानमंत्री और उनके काफिले को देखने जिज्ञासुओं की खासी भीड़ सड़क के किनारों पर मौजूद थी। यदि भाजपा और उसके सलाहकार इस भीड़ की गिनती अपने वोट बैंक के खाते में जोड़कर देख रहे है तो दीगर बात है। फिर भी यहां यह कहने में कतई गुरेज नहीं किया जा सकता कि नेता आयात किये जा सकते है वोटर नहीं। रामलीला के मंच पर राम, लक्ष्मण व हनुमान के रूप में मौजूद कलाकारों की आरती करके प्रधानमंत्री ने हिंदू भावनाओं का भले ही आदर किया हो, मगर उनके सहयोगियों ने और समूची मीडिया ने इसे राजनीति के तराजू में तौलकर हिंदूओं की धार्मिक भावनाओं को भड़काने का काम किया है। यह भड़काऊ अफीम का नशा क्या हरे राम…….. हरे राम……. भजते हुए दोबारा उत्तर प्रदेश जीतने का औजार बन सकेगा इससे भी बड़ा सवाल है कि इन रामदुलारों को अपनी अराजक और अतृत्त इच्छाओं को अयोध्या जाने वाली सड़क पर दौड़ाने की आवश्यकता चुनावों के दौरान या मुलायम सिंह यादव की पार्टी के राज में ही क्यों महसूस होती है बरसहा बरस रामलला के दर्शन कर मन्दिर यहीं बनाएंगे नारा बुलंद करने वाली भाजपा अपने तारणहार के साथ रामलीला के मंच पर पहुंचने के बहाने पांच राज्यों को जीतने के लिए एक बार फिर अपने पुराने टोटके को नही आजमा रही है, रामलीला के मंच पर प्रधानमंत्री ने अपने खास अंदाज में आतंकवाद भ्रष्टाचार, बेटी बचाओं, सफाई अभियान और सर्जिकल स्ट्राइक के साथ काशी की तर्ज गंगा मां ने बुलाया है पर राम, कृष्ण की धरती पर आया हूँ जुम्ला उछालकर लोगो से धार्मिक नातेदारी कायम करने की कोशिश की। वे इससे भी आगे बढ़कर गोस्वामी तुलसीदास द्वारा शुरू की गई रामलीला में आने को अपना सौभाग्य बताने से भी नहीं चूके। इशारो-इशारो में अपनी तुलना जटायु से भी कर गये। युद्ध से बुद्ध की यात्रा के जुम्ले के पीछे अम्बेडकर से जोड़ने का प्रयास भी साफ-साफ दिखा। पाकिस्तान को भी चेतावनी देने में पीछे नहीं रहे। इसके साथ ही जो राम का है वो काम का हैं और जय श्रीराम का नारा बुलंद करते-कराते यह कहने से भी गुरेज नहीं किया कि आवाज दूर तक जानी चाहिए। बावजूद इसके वो लोग खासे निराश हुए जिन्हें उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री लखनऊ को कोई तोहफा दे जाएंगे या कोई नही परियोजना हालांकि इससे पहले लखनऊ सांसद व प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी बाजपेयी से भी लखनऊ वालों को कुछ भी हासिल नहीं हुआ। यहां एक दलविहीन सियासी दिलचस्पी रखनेवाले शख्स की टिप्पणी काबिले गौर है प्रधानमंत्री कमी भी कहीं भी अपने भाषणों में कालाधन बेरोजगारी महंगाई गंगा सफाई जैसे तमाम अहम मुददों पर कोई बात नहीं करते आतंकवाद के खिलाफ लगातार मुहतोड़ जवाब देने का एलान हर घंटे करते हैं लेकिन लगातार भारत-पाक सीमा पर आतंकवादी हमले हो रहे है रोज सुरक्षाबल के जवान, नागरिक शहीद हो रहे है, घायल हो रहे हैं इनका जवाब कब और कैसे दिया जायेगा, एक सर्जिकल स्ट्राइक का प्रचार कब तक होगाघ् पांच राज्यों के चुनाव 2017 में है उसके लिए हर पार्टी अपने प्रयासों के हथियार मांज रही है और दूसरे दलों पर हमलावर है। भाजपा भी यात्राओं, रैलियों के साथ किसी न किसी बहाने अपने मसीहा के बार-बार लखनऊ दौरे करा कर अपने वोटरों के बीच सक्रिय है। उसके सहयोगी राम मंदिर की मांग के साथ मैदान में है। शिवसेना ने पिछले दिनो साफ साफ कहा, भाजपा के पास बहुमत है और उसके साथ शिवसेना तथा अन्य दल है इसलिए राम मंदिर आज नहीं तो कभी नहीं बनेगा। सिर्फ नारा नहीं लगाएं बल्कि ईट लगाना शुरू करें। कलश चढ़ाने का काम शिवसेना करेगी शिवसेना सहित सभी सियासी दलों व सियासी समझदारों का मानना है कि दशहरे पर राम लीला के मंच से जय श्रीराम का नारा लगाकर उप्र चुनाव का शंख फूक दिया गया है। राम मंदिर और जय श्रीराम नारे के सहारे पहले भी सत्ता हासिल की जा चुकी है और आज केन्द्र सहित जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें है उनकी नींव में आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की यात्राओं के साथ अयोध्या में विवादित ढांचे का विध्वंस ही है। देश को 1993 में भाजपा के बड़े नेताओं के भाषणों में छुपी धमकी, ‘यदि दंगो से छुटकारा चाहते हैं तो भाजपा को वोट दें’ अच्छी तरह याद है। कुछ उसी तरह का दोहराव इधर आतंकवाद और राम मंदिर के बहाने होता दिखाई दे रहा है। और साफ कहा जाये तो राम के नाम पर पिछले तीस सालों से उन्माद की सड़क पर राजनीति का रथ दौड़ाया जा रहा है। अब रामलला के साथ रामलीला को भी सत्ता पाने का परचम बनाया जा रहा है। बहरहाल 2017 के चुनावों का मतदाता सियासत के हर करतब को बेहद संजीदा होकर देख रहा है। समय पर ही उसका नजरिया साफ होगा, भले ही कितने शंखनाद हों।

 



A group of people who Fight Against Corruption.