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Sunday 18 November 2018
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हुड्डा के घर सीबीआई का छापा

हुड्डा के घर सीबीआई का छापा

नई दिल्ली। कांग्रेस पार्टी के एक और वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री पर सीबीआई का शिकंजा कस गया है। सीबीआई ने शनिवार को हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के घर सहित 19 जगहों पर छाप मारा और तलाशी ली। इस दौरान हुड्डा खुद दिल्ली में पंडित पंत मार्ग स्थित आवास पर रहे और बड़ी संख्या में उनके समर्थक भी वहां जुटे रहे। हुड्डा के अलावा संघ लोक सेवा आयोग, यूपीएससी के एक मौजूद सदस्य के आवास पर भी तलाशी हुई।

यह मामला गुड़गांव में भूमि के अधिग्रहण में कथित गड़बड़ी का है, जिसमें किसानों को डेढ़  हजार करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाने और उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने का आरोप है। सीबीआई के सूत्रों के मुताबिक जांच एजेंसी की टीम ने हुड्डा के आवास के साथ ही दो पूर्व आईएएस अधिकारियों के यहां भी तलाशी ली। सीबीआई ने हुड्डा के प्रधान सचिव रहे एमएल तायल और यूपीएससी के सदस्य छतर सिंह के अलावा एक कार्यरत आईएएस अधिकारी एसएस ढिल्लन के परिसर की भी तलाशी ली है। यह मामला सीबीआई ने पिछले साल सितंबर में दर्ज किया था।

सीबीआई के प्रवक्ता आरके गौर ने बताया- गुड़गांव में किसानों से जमीन की खरीदारी में कथित गड़बड़ी के मामले में जारी जांच के तहत सीबीआई ने रोहतक, गुड़गांव, पंचकूला और दिल्ली में 20 जगहों पर छापेमारी की। आरोप है कि 27 अगस्त 2004 से 24 अगस्त 2007 के बीच निजी बिल्डरों ने हरियाणा सरकार के अज्ञात अधिकारियों की मिलीभगत से मानेसर, नौरंगपुर और लखनौला के किसानों और अन्य भूस्वामियों से करीब चार सौ एकड़ जमीन बेहद कम दाम में खरीदी। इसके लिए उन्हें सरकारी अधिग्रहण का डर दिखाया गया था।

आरोप है कि इस प्रक्रिया में पहले तो हरियाणा सरकार ने गुड़गांव जिले के गांव मानेसर, नौरंगपुर और लखनौला में औद्योगिक मॉडल टाउनशिप की स्थापना के लिए 912 एकड़ जमीन के अधिग्रहण के लिए भूमि अधिग्रहण कानून के तहत अधिसूचना जारी की थी। लेकिन बाद में निजी बिल्डरों ने भूस्वामियों को सरकार की ओर से सस्ती दर पर अधिग्रहण का डर दिखा कर कथित तौर पर उनसे जमीन हथिया ली।

आरोप है कि सक्षम प्राधिकरण यानी उद्योग निदेशालय ने 24 अगस्त, 2007 को इस भूमि को अधिग्रहण प्रक्रिया से बाहर कर दिया। कहा जा रहा है कि भूमि को अधिग्रहण प्रक्रिया से बाहर करना सरकारी नीति का उल्लंघन है और यह कदम वास्तविक भूमालिकों के बजाए बिल्डरों, उनकी कंपनियों और एजेंटों के पक्ष में है।



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