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Saturday 22 September 2018
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आख़िर क्यों और कब तक ?

आख़िर क्यों और कब तक ?

1981 में 6 माह के बच्चों का लिंग अनुपात 962 था, जो 1991 में घटकर 945 हो गया और 2001 में यह 927 रह गया है और आगे भी लगातार घटता ही जा रहा है इसका मुख्य कारण शायद देश में हो रही कन्या भ्रूण हत्या ही है। जब की नेटल डायग्नोस्टिक एक्ट 1994 के मुताबिक बच्चे के लिंग का पता लगाना गैर कानूनी है।
बावजूद इसके इस अधिनियम का उल्लंघन सबसे अधिक हो रहा है । सरकार ने 2011 व 12 तक बच्चों का लिंग अनुपात 935 और 2016-17 तक इसे बढ़ा कर 950 करने का लक्ष्य रखा है। सवाल यह उठता है की इस अभियान को अमली जामा देने के लिए आखिर कुछ किया भी जा रहा है या नहीं ?
जाहिर है, हमारे देश में बेटे के मोह के चलते हर साल लाखों बच्चियों की इस दुनिया में आने से पहले ही हत्या कर दी जाती है आये दिन नवजात बच्चियों के शव झाड़ियों, कूड़ाघरों या नालों में पाए जाने की ख़बरें अखबारों में आती रहती हैं ! समाज में बच्चियों का तिरस्कार चिंताजनक और अमानवीय है। हमारे समाज के लोगों में पुत्र की बढ़ती लालसा और लगातार घटता स्त्री-पुरुष अनुपात समाजशास्त्रियों, जनसंख्या विशेषज्ञों और योजनाकारों के लिए चिंता का विषय बन गया है। इसी विषय पर केन्द्रित हो इस रचना ने भी जन्म लिया है, मन में कल्पना आई की जब लिंग की जानकारी होने के उपरान्त अबार्सन के लिए लोग किसी अस्पताल का सहारा लेते हैं और डॉक्टर अपने अश्त्रों का इस्तेमाल करता है तो बेवस तड़प कर क्या क्या कहती है ……….. हाला की इसे लिखे हुए काफी वक़्त गुज़र चुका है कई पत्र पत्रिकाओं में यह रचना प्रकाशित भी हो चुकी है लेकिन इधर इस तरह की कई घटनाये अख़बारों में फिर पढने को मिली की अमुक जगह झाड़ियों में नवजात बच्ची मृत मिली…..अस्पताल में भारती प्रसूता ने दम तोड़ा आदि आदि तो पुनः इसे आप सब साथियों के बीच ताज़ा किया इस उम्मीद के साथ कि अगर मेरे इस प्रयास से किसी एक ने भी इस जघन्य अपराध का बोध कर अबोर्शन के बढ़ते कदम को रोक लिया तो मेरा यह प्रयास सार्थक रहा………..bebas tadap copy
भारत सरकार ने प्रसव पुर्व लिंग परिक्षण एवं कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगायी है।
भारत में लिंग अनुपात
• 1000 / 972 (प्रति एक हजार (१०००) पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या)- जनगणना, १९०१
• 1000 / 933 (प्रति एक हजार (१०००) पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या)- जनगणना, २००१
इस परंपरा के वाहक अशिक्षित व निम्न व मध्यम वर्ग ही नहीं है बल्कि उच्च व शिक्षित समाज भी है। भारत के सबसे समृध्द राज्यों पंजाब,हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में लिंगानुपात सबसे कम है। २००१ की जनगणना के अनुसार एक हजार बालकों पर बालिकाओं की संख्या पंजाब में 798, हरियाणा में 819 और गुजरात में 883 है। कुछ अन्य राज्यों ने इस प्रवृत्ति को गंभीरता से लिया और इसे रोकने के लिए अनेक कदम उठाए जैसे गुजरात में ‘डीकरी बचाओ अभियान’ चलाया जा रहा है। इसी प्रकार से अन्य राज्यों में भी योजनाएँ चलाई जा रही हैं। भारत में पिछले चार दशकों से सात साल से कम आयु के बच्चों के लिंग अनुपात में लगातार गिरावट आ रही है। वर्ष 1981 में एक हजार बालकों पर ९६२ बालिकाएँ थी। वर्ष २००१ में यह अनुपात घटकर ९२७ हो गया। यह इस बात का संकेत है कि हमारी आर्थिक समृध्दि और शिक्षा के बढते स्तर का इस समस्या पर कोई प्रभाव नहीं पड रहा है। वर्तमान समय में इस समस्या को दूर करने के लिए सामाजिक जागरूकता बढाने के लिए साथ-साथ प्रसव से पूर्व तकनीकी जांच अधिनियम को सख्ती से लागू किए जाने की जरूरत है। जीवन बचाने वाली आधुनिक प्रौद्योगिकी का दुरुपयोग रोकने का हरसंभव प्रयास किया जाना चाहिए। देश की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने पिछले वर्ष महात्मा गांधी की 138वीं जयंती के मौके पर केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की बालिका बचाओ योजना (सेव द गर्ल चाइल्ड) को लांच किया था। राष्ट्रपति ने इस बात पर अफसोस जताया था कि लडक़ियों को लडकों के समान महत्व नहीं मिलता। लडक़ा-लडक़ी में भेदभाव हमारे जीवनमूल्यों में आई खामियाें को दर्शाता है। उन्नत कहलाने वाले राज्यों में ही नहीं बल्कि प्रगतिशील समाजों में भी लिंगानुपात की स्थिति चिंताजनक है। हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे राज्य में सैक्स रेसिओ में सुधार और कन्या भ्रूण हत्या जैसे रोकने के लिए प्रदेश सरकार ने एक अनूठी स्कीम तैयार की है। इसके तहत कोख में पल रहे बच्चे का लिंग जांच करवा उसकी हत्या करने वाले लोगों के बारे में जानकारी देने वाले को 10 हजार रुपए की नकद इनाम देने की घोषणा की गई है। प्रत्येक प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग को ऐसा सकारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। प्रसूति पूर्व जांच तकनीक अधिनियम 1994 को सख्ती से लागू किए जाने की जरूरत है। भ्रूण हत्या को रोकने के लिए राज्य सरकारों को निजी क्लीनिक्स का औचक निरीक्षण व उन पर अगर नजर रखने की जरूरत है।



A group of people who Fight Against Corruption.


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