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Tuesday 20 November 2018
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आदरांजलि: “शब्दों में जीवित हैं हिन्दी सहोदर”

आदरांजलि:  “शब्दों में जीवित हैं हिन्दी सहोदर”

राम नाम सत्य है……..

क्या सच… या केवल मुर्दों की यात्रा के दौरान बोला जाने वाला जयकारा भर है? इस सवाल का जवाब तलाशने की जब-जब कोशिश की, हमेशा मृत्यु और राम एक हादसा बन कर सामने खड़े हो गये। और यह दुखद हादसे मुझे सुन्न कर देते हैं। इसी बीच दूरभाष यंत्र पर आई सूचना के साथ एक नाम सामने की दीवार पर…….. नहीं………. शायद आसमान पर चांद……. तारों के बीच या फिर सूरज की आग बरसाती किरणों के बीच लिख जाता है। इसी नाम ने बीती सात मई को मुझे पत्र लिखा था। धन्यावाद दिया था, साथ में हिन्दी भाषा के प्रति अपनी निष्ठा व चिंता जाहिर की थी। यह नाम के. जी. बालकृष्ण पिल्लै जो सही मायनों में माता सरस्वती का सच्चा पुत्र था, हिन्दी भाषा का सहोदर और पत्रकारिता का सखा। अब यह नाम भर रह गया? प्रो0 डी. तंकप्पन नायर सम्पादक ‘केरल-ज्योति‘ ने दूरभाष पर जब कहा कि श्री पिल्लै जी का स्वर्गवास गई 21 मई, 2015 को हो गया, तो दहकते शोलों पर लेट कर अग्निस्नान करने वाले हिन्दी पुरोधा की संपूर्ण काया सामने साकार हो गई। न प्रणाम कर सका, न चीख निकल सकी और न ही नायर जी को स्पष्ट शब्दों में कोई उत्तर दे सका। दरअसल मन की दीवार पर कई चित्रों ने अपनी स्मृतियों के भारी भरकम पांव रख दिये थे। हम दोनों की मुलाकात ‘प्रियंका‘ कार्यालय में 1995 में हुई थी। वे हिन्दी पत्रकारिता के छात्रांे के दल के साथ लखनऊ भ्रमण पर आये थे। उनके साथ प्रो0 एन0 माघवनकुट्टी नायर (मंत्री, केरल हिन्दी प्रचार सभा) भी आये थे। मेरे पुत्र, पुत्री व शिष्य के साथ लखनऊ भ्रमण करने के साथ ‘प्रियंका‘ कार्यालय में लगातार तीन दिन तक आते रहे। दो बार उनके दर्शनलाभ और हुए। वे मुझे अपने यहां होने वाले हिन्दी प्रचार के कार्यक्रम में आमंत्रित करने की इच्छा रखते थे, लेकिन यह अवसर आ नहीं सका। उन्होंने ‘प्रियंका‘ में काफी कुछ लिखा है। मुझे अखबार और लेखन पर कई सलाहें दीं। उनकी अंतिम लाइने जो ‘प्रियंका‘ के लिए लिखी गई वे भी हिन्दी भाषा को और समृद्ध करने की चिंत जाहिर करती हैं। वे केरल हिन्दी प्रचार सभा के अध्यक्ष रहे, लेखक, अनुवादक, प्रचारक, समाजसेवी, और पत्रकार भी थे। एक साथ कई भाषाओं के जानकार भी थे। उनके जाने के बाद हिन्दी के दुर्ग में कहीं कोई हलचल नहीं? मुझे इसका दुख है। इक्यासी बरस का हिन्दी-मलयालम सेतु भले ही मौन हो गया हो मगर उस पर से लाखों सार्थक पांव तब तक गुजरते रहेंगे जब तक यह धरती अस्तित्व में रहेगी। शरीर मरा होगा, शब्द नहीं मरते। उनके द्वारा लिखे गये अक्षरों से भले ही वेद-पुराण का आभास न हो, लेकिन जिससे ज्ञानार्जन हो वही गीता। वही रामायण। और अंत में इतना ही कि ईश्वर से मेरी मुलाकात कभी नहीं हुई, आगे कभी होगी, पता नहीं। मैं तो के. जी. बालकृष्ण पिल्लै से मिला था। वे ही तो ईश्वर का साक्षात स्वरूप थे। आदमी ही ईश्वर है, सहोदर है, सखा है। मैं उन्हें प्रणाम करता हूं। श्रद्धांजलि तो उन्हें दी जाती है जो मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उन्हें नहीं, जो शब्दों में जीवित हैं।

हिन्दी के इस अनुरागी को पुनः प्रणाम!
राम प्रकाश वरमा



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