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Monday 24 September 2018
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कुर्सी के लिए सड़कों का सहारा

कुर्सी के लिए सड़कों का सहारा
राजनीति की नब्ज के गहन जानकार समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव भले बेहद शांत बैठे थे, लेकिन उनका मस्तिष्क भविष्य की राजनीति का ताना-बाना बुनने में व्यस्त था. पिछले साल 23 नवंबर को लखनऊ में 5, कालिदास मार्ग स्थित मुख्यमंत्री आवास में लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे के शिलान्यास के मौके पर वे बतौर मुख्य अतिथि मौजूद थे. संबोधन के लिए माइक संभालने से पहले मुलायम यह समझ चुके थे कि 2017 के विधानसभा चुनाव में यूपी की सत्ता पर सपा के दोबारा काबिज होने का रोडमैप इसी एक्सप्रेसवे के जरिए तैयार होगा. मुलायम ने एक्सप्रेसवे का निर्माण कर रही कंपनियों के अधिकारियों को खड़ा करके पूछा, “यह कितने दिन में, कब बनेगा? उद्घाटन की तारीख क्या होगी?” एक कंपनी के डायरेक्टर चक्रेश जैन मुलायम की बगल में आए और बोले, “दो साल में इस प्रोजेक्ट को पूरा करके देंगे.” मुलायम ने बीच में ही टोकते हुए कहा, “मैंने दो साल में दो महीने कम कर दिए हैं. 22 महीने में आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे बन जाना चाहिए. “
मुलायम से नसीहत मिलने के बाद आगरा से लखनऊ को जोडऩे वाली देश की सबसे लंबी एक्सप्रेस-वे परियोजना को अगले विधानसभा चुनाव से तकरीबन छह महीने पहले पूरा करने के लिए सपा सरकार ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. 15,000 करोड़ रु. की लागत से तैयार होने वाले 302 किमी लंबे “आगरा से लखनऊ प्रवेश नियंत्रित 6 लेन एक्सप्रेसवे” (ग्रीनफील्ड) के अगले साल नवंबर में पूरा हो जाने का लक्ष्य रखा गया है. अगर ऐसा संभव हुआ तो यह देश का सबसे कम समय में बनने वाला एक्सप्रेस-वे होगा. यह प्रोजेक्ट अनोखा इस मामले में भी है कि देश में पहली बार कोई राज्य सरकार केवल अपने खर्चे पर इतना बड़ा एक्सप्रेस-वे तैयार कर रही है. 24 फरवरी को पेश बजट में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इसके लिए तकरीबन 4,000 करोड़ रु. की व्यवस्था कर इशारा कर दिया कि यह प्रोजेक्ट उनके लिए कितनी अहमियत रखता है. बात केवल सपा सरकार तक ही सीमित नहीं है, यूपी से 71 सीटें जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की केंद्र सरकार ने भी प्रदेश में सड़कों के जरिए अपने आधार वोटबैंक को बांधे रखने की तैयारी शुरू कर दी है.
सड़कों के जरिए सियासत
प्रदेश में सपा सरकार के आने के बाद सबसे ज्यादा दंगों का दंश झेलने वाले पश्चिमी यूपी के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए अखिलेश सरकार ने एलिवेटेड हाइवे का सहारा लिया है. 24 फरवरी को पेश बजट में मुख्यमंत्री ने गाजियाबाद से मेरठ को जोडऩे वाले देश के सबसे लंबे छह लेन के एलिवेटेड हाइवे की घोषणा की. इस हाइवे के बन जाने के बाद पश्चिमी यूपी का इलाका सीधे-सीधे नई दिल्ली से जुड़ जाएगा. बात केवल यहीं नहीं ठहरती. प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में भी सपा और केंद्र सरकार ने सड़कों से जुड़े बड़े प्रोजेक्टों को हरी झंडी दिखा दी है ( देखें बॉक्स). सड़कें बनाने के लिए दोनों में होड़ लगी है.
हिंदुत्व का एजेंडा भी 
प्रदेश बीजेपी भी अपने हिंदुत्व एजेंडे को दुरुस्त करने के लिए भगवान राम के नाम पर हाइवे का निर्माण करा रही है. केंद्र ने अयोध्या से नेपाल के जनकपुर तक जाने वाले 455 किमी लंबे रामजानकी मार्ग को 2,000 करोड़ की लागत से राष्ट्रीय राजमार्ग में तब्दील करना शुरू कर दिया है. इसी क्रम में केंद्रीय सड़क परिवहन, राजमार्ग और जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी ने 20 जनवरी को गोरखपुर में 1,000 करोड़ रु. से अधिक की लागत से बनने वाले अयोध्या-चित्रकूट हाइवे का शिलान्यास किया. इसे राम वनगमन मार्ग भी कहा जाता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी को जोडऩे वाले तीन राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए भी केंद्र सरकार ने अपने खजाने से 7,000 करोड़ रु. दिए हैं. साथ ही गृह मंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र लखनऊ और मुरली मनोहर जोशी के संसदीय क्षेत्र कानपुर समेत बीजेपी के प्रभाव वाले एक दर्जन बड़े जिलों में केंद्र सरकार ने आउटर रिंग रोड बनाने के प्रयास तेज कर दिए हैं.
किसानों में पैठ 
केंद्र सरकार के भू-अधिग्रहण विधेयक में भेदभाव का आरोप लगाकर जब प्रदेश भर के किसान प्रदर्शन पर उतारू थे, ठीक उसी समय लखनऊ में मोहान के नजदीक सरोसा-भरोसा गांव के करीब 80 वर्षीय रामसुमेर और 55 वर्षीय मुन्ना राम वर्मा समेत डेढ़ दर्जन से अधिक किसान हंसी-खुशी अपनी जमीनें आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे के लिए सरकार को बेच रहे थे. इसकी एवज में इन्हें साढ़े तीन करोड़ रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से भुगतान हुआ. एक्सप्रेसवे का निर्माण करने वाले ‘उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज औद्योगिक विकास प्राधिकरण’ ( यूपीडा) के मुख्य कार्यपालक अधिकारी नवनीत सहगल कहते हैं, “यह प्रोजेक्ट इस मामले में भी देश में अनोखा है कि इसमें सीधे अधिग्रहण न करके किसानों से समझौते के आधार पर जमीन खरीदी गई.” इस प्रोजेक्ट से 28,000 से अधिक किसान लाभान्वित हुए हैं और सरकार को कहीं भी किसी विरोध का सामना नहीं करना पड़ा है.
 
सरकार के इरादों पर सवाल
आगरा से शुरू होकर फिरोजाबाद, मैनपुरी, इटावा, औरेया, कन्नौज, कानपुर नगर, उन्नाव और हरदोई जिलों से गुजरकर लखनऊ पहुंचने वाले एक्सप्रेसवे को लेकर सपा सरकार की मंशा पर भी सवाल उठने लगे हैं. विरोधी पार्टियों का कहना है कि इस हाइवे के जरिए सपा सरकार अपना सियासी एजेंडा पूरा करने में लगी है. बीजेपी के राज्य प्रवक्ता डॉ. चंद्रमोहन कहते हैं, “यह महज संयोग नहीं है कि आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे फिरोजाबाद, मैनपुरी, इटावा, कन्नौज जैसे सपा के प्रभाव वाले इलाकों से गुजरता है. इस सड़क के जरिए सपा सरकार अपने लोगों को फायदा पहुंचा रही है.” यूपीडा के एक बड़े अधिकारी बताते हैं कि एक्सप्रेसवे के लिए मार्ग का चयन इस तरह से किया गया है कि इसके दायरे में ज्यादातर अनुपजाऊ जमीन ही आए.
लोकसभा चुनाव के बाद बदले माहौल में सड़कों के सहारे राजनैतिक मंसूबों को परवान चढ़ाने का रोडमैप बुना जा रहा है. राजनीति में कहावत है कि दिल्ली की कुर्सी का रास्ता यूपी से होकर जाता है, लेकिन नेताओं को यह समझ में आ गया है कि दो वर्ष बाद यूपी की कुर्सी का रास्ता सड़कों के जरिए ही तय होगा.


A group of people who Fight Against Corruption.


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