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Wednesday 26 September 2018
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अज़ीम सख्सियत थे डॉक्टर कलाम साहब

अज़ीम सख्सियत थे डॉक्टर कलाम साहब

                              डॉ कलाम की जयंती पर उनकी यादें 

लखनऊ ! आज ही के दिन उस शख्स ने जन्म लिया था जिसके आगे सारी महानताएं बौनी बन जाती हैं. आज डॉ. कलाम की 86वीं जयंती है. इस खास मौके पर हम  राष्ट्रपति कलाम साहब के दस अनकहे किस्सों के बारे में बताएंगे जिन्हें जान आप उनके महानता को सलाम करेंगे.

आज का दिन इस देश के उस अज़ीम सख्सियत को याद करने का दिन है.जिसके आगे सारी महानताएं बौनी साबित होती हैं. जी हाँ आज देश के राष्ट्रपति रहे मिसाइल मैंन डॉ. ए पी जी अबुल कलाम की 86वीं जयंती है. आइये हम सब इस अज़ीम सख्सियत को सलाम करें. वैसे उनके अविस्मरणीय कृत्यों की फेहरिस्त लम्बी हैं लेकिन कुछ ऐसे कृत्य जो आम दिलों में गहराई तक उतरे उनमे वर्ष 2002 में राष्ट्रपति बनने के बाद वे जब  पहली बार केरल गए तो उस वक्त केरल राजभवन में राष्ट्रपति के मेहमान के तौर पर दो लोगों को न्योता भेजा गया. पहला था जूते-चप्पल की मरम्मत करने वाला.. और दूसरा एक ढाबा मालिक…तिरुवनंतपुरम में रहने के दौरान इन दोनों से उनकी मुलाकात हुई थी..  डॉ कलाम ने कभी अपने या परिवार के लिए कुछ बचाकर नहीं रखा. राष्ट्रपति पद पर रहते ही उन्होंने अपनी सारी जमापूंजी और मिलने वाली तनख्वाह एक ट्रस्ट के नाम कर दी. उऩ्होंने कहा था कि चूंकि मैं देश का राष्ट्रपति बन गया हूं, इसलिए जबतक जिंदा रहूंगा सरकार मेरा ध्यान आगे भी रखेगी ही. तो फिर मुझे तन्ख्वाह और जमापूंजी बचाने की क्या जरूरत.डॉ कलाम जब DRDO के डायरेक्टर थे…तो उसी दौरान एक दिन एक जूनियर वैज्ञानिक ने डॉ कलाम से आकर कहा कि ‘मैंने अपने बच्चों से वादा किया है कि उन्हें प्रदर्शनी घुमाने ले जाऊंगा. इसलिए आज थोड़ा पहले मुझे छुट्टी दे दीजिए.’ कलाम ने खुशी-खुशी हामी भर दी. लेकिन काम में मश्गूल वैज्ञानिक ये बात भूल गया.. जब वो रात को घर पहुंचा तो ये जानकर हैरान रह गया कि डॉ कलाम वक्त पर उसके घर पहुंच गए और बच्चों को प्रदर्शनी घुमाने ले गए… इसी तरह मौका था साल 2013 में IIT वाराणसी में दीक्षांत समारोह का… बतौर मुख्य अतिथि वे यहां पहुंचे भी और यहाँ डॉक्टर कलाम ने कुर्सी पर बैठने से मना कर दिया.. क्योंकि वो वहां मौजूद बाकी कुर्सियों से बड़ी थी…कलाम बैठने के लिए तभी राजी हुए जब आयोजकों ने बड़ी कुर्सी हटाकर बाकी कुर्सियों के बराबर की कुर्सी मंगवाई.डॉ कलाम कितने संवेदनशील थे…इसका वाकया DRDO में उनके साथ काम कर चुके लोग बताते हैं. 1982 में वो DRDO यानी भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान में डायरेक्टर बनकर आए थे. DRDO की सुरक्षा को और पुख्ता करने की बात उठी. उसकी चारदीवारी पर कांच के टुकड़े लगाने का प्रस्ताव भी आया. लेकिन कलाम ने इसकी सहमति नहीं दी. उनका कहना था कि चारदीवारी पर कांच के टुकड़े लगे..तो उस पर पक्षी नहीं बैठ पाएंगे और उनके घायल होने की आशंका भी बढ़ जाएगी. उनकी इस सोच का नतीजा था कि DRDO की दीवारों पर कांच के टुकड़े नहीं लगे.एक बार डॉ कलाम को एक कॉलेज के कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि शरीक होना था. उस वक्त तक वो राष्ट्रपति तो नहीं बने थे लेकिन डीआरडीओ में एक बड़े पद पर थे और सरकार के सलाहकार भी थे. कार्यक्रम से एक दिन पहले रात में ही कलाम को कार्यक्रम की तैयारी देखने का इच्छा हुई. वो बिना सुरक्षा लिए ही जीप में सवार होकर कार्यक्रम की जगह पहुंच गए और वहां मौजूद छात्रों से बात की. VIP तामझाम से उलट डॉ कलाम के इस अंदाज ने छात्रों का दिल जीत लिया इसी तरह साल 2002 की बात है. डॉ कलाम का नाम अगले राष्ट्रपति के रूप में तय हो चुका था. उसी दौरान एक स्कूल ने उनसे छात्रों को संबोधित करने की गुजारिश की. बिना सुरक्षा तामझाम के डॉ कलाम उस कार्यक्रम में शरीक हुए. 400 छात्रों के सामने वो भाषण देने के लिए खड़े हुए ही थे कि बिजली गुल हो गई. आयोजक जबतक कुछ सोचते…डॉ कलाम छात्रों के बीच पहुंच गए और बिना माइक के अपनी बात रखी और छात्रों के सवालों का जवाब दिया.
डॉ कलाम…दूसरों की मेहनत और खूबियों को तहेदिल से सराहते थे और अपने हाथों से थैंक्यू कार्ड बनाकर ऐसे लोगों को भेजा करते थे. डॉ कलाम जब राष्ट्रपति थे. उस दौरान नमन नारायण नाम के एक कलाकार ने उनका स्केच बनाया और उन्हें भेजा. नमन के पास जब राष्ट्रपति डॉ कलाम का हाथ से बना थैंक्यू कार्ड और संदेश पहुंचा…तो वो भौंचक्के थे. उन्हें उम्मीद नहीं थी कि देश के महामहिम इस तरह दोस्ताना अंदाज में उन्हें शाबासी देंगे.डॉ कलाम में एक बड़ी खूबी ये थी कि वो अपने किसी प्रशंसक को नाराज नहीं करते थे. बात पिछले साल की है. डॉ कलाम IIM अहमदाबाद के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनकर गए. कार्यक्रम से पहले छात्रों ने डॉ कलाम के साथ लंच किया और छात्रों की गुजारिश पर उनके साथ तस्वीरें खिंचवाने लगे. कार्यक्रम में देरी होता देख आयोजकों ने छात्रों को तस्वीरें लेने से मना किया. इस पर कलाम ने छात्रों से कहा कि ‘कार्यक्रम के बाद मैं तबतक यहां से नहीं जाऊंगा जबतक आप सबों के साथ मेरी तस्वीर न हो जाए.’ ऐसे थे डॉक्टर कलाम.
मिलने आने वाले बच्चों को डा. कलाम अक्सर अपने बचपन का एक किस्सा बताया करते थे. किस्सा तब का है …जब डॉ कलाम करीब आठ-नौ साल के थे. एक शाम उनके पिता काम से घर लौटने के बाद खाना खा रहे थे. थाली में एक रोटी जली हुई थी. रात में बालक कलाम ने अपनी मां को पिता से जली रोटी के लिए माफी मांगते सुना. तब पिता ने बड़े प्यार से जवाब दिया- मुझे जली रोटियां भी पसंद हैं. कलाम ने इस बारे में पिता से पूछा तो उन्होंने कहा- जली रोटियां किसी को नुकसान नहीं पहुंचाती हैं, कड़वे शब्द जरूर नुकसान पहुंचाते हैं. इसलिए रिश्तों में एक दूसरे की गलतियों को प्यार से लो…और जो तुम्हें नापसंद करते हैं, उनके लिए संवेदना रखो.

 




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