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Wednesday 21 November 2018
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किसानो के लिए क़र्ज़-माफ़ी के टोटके आखिर कब तक ?

किसानो के लिए क़र्ज़-माफ़ी के टोटके आखिर कब तक ?

लखनऊ ! कृषि प्रधान देश में जारी कृषि संकट और उसकी वजह से किसानों के बेतहाशा क़र्ज़ को देखते हुए पिछले कुछ अरसे से उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में सरकारों द्वारा किसानों की क़र्ज़-माफ़ी की स्वान्तः हिताय वाली रणनीति क्या बदहाल होते किसानो को बढते संकट से उबार पाने में सहायक होगी ऐसा लगता नहीं.हाँ यह जरूर है की इस नीति ने किसान आंदोलनों को हवा जरूर दे दी है जिसके चलते मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र,राजस्थान सहित अब विभिन्न प्रदेशों में किसान क़र्ज़ माफी सहित विभिन्न मांगों को लेकर आन्दोलन के रस्ते चल पड़े हैं जिससे राज्य सरकारों के सामने भी दिक्कतें खादी हो गयी हैं , हालाँकि बैंकों के शीर्ष अधिकारी और देश के तमाम अर्थशास्त्री क़र्ज़-माफ़ी से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले बोझ के मद्देनज़र केन्द्र व राज्य सरकारों को लगातार आगाह कर रहे थे, लेकिन उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बनी सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक में ही छोटे व सीमान्त किसानों की क़र्ज़-माफ़ी की घोषणा करते हुए 2019 के लोकसभा चुनावों के पहले किसानों में भाजपा के आधार को सुदृढ़ करने की अपनी मंशा साफ़ ज़ाहिर कर दी। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस क़दम से किसानों के एक हिस्से को तात्कालिक राहत तो मिलेगी और इसलिए किसानों के बीच भाजपा का आधार भी मज़बूत होगा। लेकिन जो लोग यह मान बैठे हैं कि इस फ़ैसले से यूपी में खेती-किसानी का संकट कम हो जायेगा और छोटे किसानों के अच्छे दिन आ जायेंगे, वे बहुत बड़े मुग़ालते में जी रहे हैं, क्योंकि पिछले कुछ दशकों से भारतीय कृषि गम्भीर संकट की स्थित में है और किसानों के बढ़ते क़र्ज़ उस संकट का लक्षण मात्र हैं। तमाम बुर्जुआ अर्थशास्त्री भी यह मानते हैं कि किसानों की क़र्ज़-माफ़ी जैसे लोकलुभावन हथकण्डों से भारतीय कृषि के संकट में कोई कमी नहीं आने वाली है। साथ ही यह आँकड़ों सहित दिखाया जा सकता है कि इस क़दम से किसानों को जो तात्कालिक राहत मिलेगी, वो भी छोटे किसानों के एक छोटे हिस्से तक ही सीमित रहेगी।

योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा लिये गये 36,359 करोड़ रुपये के क़र्ज़-माफ़ी के फ़ैसले को मीडिया में इस तरह से प्रचारित किया गया मानो इससे सभी 2.15 करोड़ छोटे व सीमान्त किसानों को लाभ होगा। लेकिन सच्चाई तो यह है कि सीमान्त व छोटे किसानों के एक छोटे हिस्से को ही कर्जमाफी का लाभ मिल सकेगा। आइए आँकड़ों के ज़रिये इस सच्चाई का पता लगायें- सरकारी आँकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में कुल 2.3 करोड़ किसान हैं जिनमें 1.85 करोड़ सीमान्त किसान (एक हेक्टेयर या 2.5 एक‍ड़ से कम की जोत वाले), 30 लाख छोटे किसान (1-2 हेक्टेयर की जोत वाले) और शेष बड़े किसान (2 हेक्टेयर से अधिक जोत वाले) हैं। उत्तर प्रदेश सरकार की ख़ुद की घोषणा के अनुसार 2.15 करोड़ छोटे व सीमान्त किसानों में से क़र्ज़ माफ़ी का लाभ ले पा सकने वाले किसानों की संख्या लगभग 86 लाख ही होगी। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के आँकड़ों के अनुसार प्रदेश में क़र्ज़ लेने वाले कुल छोटे व सीमान्त किसानों के आधे से भी कम किसानों ने बैंकों से क़र्ज़ लिया है। आधे से अधिक किसानों ने स्थानीय महाजन, व्यापारी, मित्र, रिश्तेदार या बड़े किसानों आदि से क़र्ज़ ले रखा है। ज़ाहिर है कि क़र्ज़ में डूबे अधिकांश छोटे-सीमान्त किसानों को योगी सरकार द्वारा लिये गये क़र्ज़-माफ़ी के फ़ैसले से तात्कालिक राहत भी नहीं मिलेगी, क्योंकि वह वाणिज्यिक बैंकों और कोऑपरेटिव बैंकों जैसे संस्थाओं द्वारा दिये गये संस्थागत क़र्ज़ पर ही लागू होता है। यही नहीं, आँकड़े यह भी दिखाते हैं कि किसान की जोत जितनी ही छोटी होती है, उसके द्वारा संस्थागत स्रोतों द्वारा लिये जाने वाले क़र्ज़ की सम्भावना उतनी ही कम होती है। एक एकड़ से कम जोत वाले किसानों में से केवल 28 प्रतिशत किसानों ने ही बैंकों से क़र्ज़ ले रखा है। यानी 72 प्रतिशत ऐसे अति-सीमान्त किसानों ने ग़ैर-संस्थागत स्रोतों से क़र्ज़ ले रखा है, जिन्हें क़र्ज़-माफ़ी का कोई लाभ नहीं होने वाला है। अत: छोटे किसानों के सापेक्षत: समृद्ध हिस्से को ही इस क़र्ज़-माफ़ी से राहत पहुँचेगी।

छोटे किसानों के सापेक्षत: समृद्ध हिस्से को क़र्ज़-माफ़ी से जो राहत मिलेगी, वह भी तात्कालिक ही रहेगी और पूँजीवादी खेती का संकट भविष्य में उसे क़र्ज़ के भँवरजाल की ओर ठेलता रहेगा। दरअसल खेती-किसानी का मौजूदा संकट ढाँचागत है। आज़ादी के बाद के दशकों में भारतीय कृषि में हुए पूँजीवादी विकास के साथ ही साथ गाँवों में किसानों का विभेदीकरण तेज़ी से बढ़ा है और जोतों का आकार क्रमश: कम से कम होता गया है। 1970-71 की कृषि जनगणना के बाद से भारत में खेती की औसत जोत में लगातार गिरावट देखने को आयी है। 2010-11 की ताज़ा कृषि जनगणना के मुताबिक़ भारत में जोतों का औसत आकार 1.15 हेक्टेयर रह गया है और सीमान्त किसानों की संख्या 67 प्रतिशत व छोटे किसानों की संख्या लगभग 18 प्रतिशत है। यानी किसानों की कुल संख्या का 85 प्रतिशत छोटे व सीमान्त किसान हैं। पूँजीवादी खेती होने की वजह से खाद, बीज, कीटनाशक व खेती के उपकरणों की क़ीमतें लगातार बढ़ने से खेती-बाड़ी की लागत में लगातार बढ़ोतरी हुई है।

1990 के दशक से नवउदारवादी नीतियाँ लागू होने के बाद से कृषि का संकट गहरा होता गया है क्योंकि खेती-बाड़ी में पूँजीवादी प्रतिस्पर्द्धा देश के भीतर तक ही नहीं सीमित है, बल्कि विश्व बाज़ार की हलचलें भी उसे प्रभावित करती हैं। ऐसे में बड़ी जोत वाले किसान, जो कृषि के आ‍धुनिक उपकरणों से खेती करते हैं और समय पर फ़सल कटवाकर जल्द से जल्द मण्डी में फ़सल पहुँचाने की क्षमता रखते हैं, वे अगर क़र्ज़ भी लेते हैं तो फ़ायदे में रहते हैं। छोटी जोत वाले किसान क़र्ज़ लेकर बड़ी मुश्किल से जो कुछ भी उगा पाते हैं उसे भी समय पर मण्डी में न पहुँचा पाने की वजह से उन्हें अपनी फ़सल की पर्याप्त क़ीमत नहीं मिल पाती। इस प्रकार मण्डी में बड़े किसानों का ही दबदबा क़ायम हो जाता है और अधिकांश किसानों के लिए खेती-बाड़ी एक घाटे का सौदा बन जाती है। ऊपर से अगर मौसम दग़ा दे जाता है तो छोटे किसानों की समस्या और बढ़ जाती है। जिस किसान के पास जितनी कम ज़मीन रहती है, उसकी तकलीफ़ें उतनी ही अधिक होती हैं। सीमान्त किसानों की हालत इतनी ख़राब होती जाती है कि अगर वे दूसरों के खेतों में मज़दूरी न करें, तो उनके परिवार का पेट पालना भी दूभर हो जाता है। गाँवों में बड़ी संख्या ऐसे अर्द्ध-सर्वहाराओं की है जिनकी नियति देर-सबेर पूरी तरह से सर्वहारा में तब्दील हो जाने की है। इसमें क़तई आश्चर्य की बात नहीं है कि गाँवों में हाल के दशकों में बड़े पैमाने पर छोटे किसान तबाह हुए हैं और यह प्रक्रिया समय बीतने के साथ बढ़ती गयी है। हालत यहाँ तक आ पहुँची है कि सेण्टर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटी के एक हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक़ गाँवों में 61 प्रतिशत किसान ऐसे हैं जो शहरों में नौकरी मिलने पर अपनी खेती-बाड़ी पूरी तरह से छोड़ने के लिए तैयार हैं। यह आँकड़ा चीख़-चीख़ कर भारतीय कृषि के संकट की कहानी बयान कर रहा है।

खेती-किसानी के संकट से निपटने के नाम पर क़र्ज़-माफ़ी के टोटके पहले भी कई बार आज़माये जा चुके है। लेकिन इसके बावजूद यह संकट लगातार गहराता गया है। आज़ाद भारत के इतिहास में सबसे बड़ी क़र्ज़-माफ़ी की घोषणा वर्ष 2008 में तत्का‍लीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने की थी। उस समय देश-भर में किसानों के कुल 52 हज़ार करोड़ रुपये से भी अधिक के क़र्ज़ माफ़ किये गये थे। लेकिन उसके बाद से खेती का संकट कम होने की बजाय बढ़ा ही है, जिसका स्पष्ट संकेत देश के विभिन्न हिस्सों में किसानों की आत्महत्याओं की संख्या में बढ़ोतरी के रूप में दिखता है। कई अध्ययनों ने यह दिखाया है कि उस देशव्यापी क़र्ज़-माफ़ी से भले ही किसानों को तात्कालिक राहत मिली हो, लेकिन लम्बे कालखण्ड में देखने पर कृषि अर्थव्यवस्था पर उसका असर कुल मिलाकर नकारात्मक ही साबित हुआ क्योंकि जिन इलाक़ों में किसानों ने अधिक क़र्ज़ लिया था, वहाँ क़र्ज-माफ़ी के बाद बैंकों ने क़र्ज़ देना ही कम कर दिया। ज़ाहिर है कि इसका नुक़सान छोटे व सीमान्त किसानों को होता है जो स्थानीय महाजनों व आढ़तियों के चंगुल में फँस जाते हैं। यही नहीं, कम्प्ट्रोलर एण्ड ऑडिटर जनरल (सीएजी) की ऑडिट में यह तथ्य भी सामने आया है कि 2008 में घोषित देशव्यापी क़र्ज़-माफ़ी के दौरान समय पर काग़ज़ात न उपलब्ध करा पाने की वजह से तमाम ग़रीब किसानों का क़र्ज़ माफ़ नहीं हुआ था और उसके उलट कई समृद्ध किसानों की क़र्ज़-माफ़ी हो गयी थी जिसके चलते कई किसानो ने मौत को गले भी लगाया था ! कहने का तात्पर्य है की जब तक किसानो के हित में सरकारें कोई ठोस कदम नहीं उठाएंगी और किसानो को मात्र बोटबैंक के रूप में इस्तेमाल करने तक की रणनीति अपनाते हुए इस तरह के टोटके आदि करती रहेंगी तब तक किसान विपन्नताओं से घिरा रहेगा और यूँ ही जूझता व मरता रहेगा !




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