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Wednesday 26 September 2018
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आखिर क्यों मजबूर हैं ग्रामीण अपने गांव को पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) लिखने को ….?

आखिर क्यों मजबूर हैं ग्रामीण अपने गांव को पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) लिखने को ….?

कानपुर संवाददाता.यहां एक गांव में गांववालों ने अपने स्थान का नाम बदलकर पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) लिखने  का निर्णय लिया है। वजह है कि इस गांव में आजादी के बाद से लोग गुलामों की तरह जी रहे हैं। यहां न ही अच्छी एजुकेशनल और हेल्थ फैसिलिटी है, न ही बिजली, सड़क, स्कूल और डिस्पेंसरी का ही इंतजाम है। अब गांव के लोगों को सीएम योगी से आस है। उनका कहना है क‍ि हमें सीएम पर बहुत भरोसा है, लेक‍िन हम गांववालों की बात सीएम तक पहुंच नहीं पा रही है।”

गांव में स‍िर्फ एक हैंडपंप जो 8 साल से है बंद…

मामला कानपुर में स्थित घाटमपुर तहसील के भीतरगांव की दौलतपुर ग्राम पंचायत के सिम्मरनपुर गांव का है। गांववालों की शिकायत है कि गांव में बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। इसके अलावा यहां सिर्फ एक हैंडपंप था, जिसने करीब 8 साल पहले ही काम करना बंद कर दिया। अब उसका यूज गांववाले अपने मवेशियों और उनके बच्चों के लिए करते हैं।

गांव में दुकान चलाने वालों ने पिछले गुरुवार को विरोध में अपनी दुकान के बाहर, मंदिरों, गांव की दीवारों और गांव के प्रधान के घर के बाहर तख्तियां डाल दीं। इन तख्त‍ियों में लिखा था- ”जब तक हमें बिजली, पानी और सड़क की सुविधा नहीं मिलती है, हम गांव को पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) के तौर पर जानेंगे।” गांववालों का कहना है कि गांव का नाम बदलना ही अब उनके पास एक चारा है।

800 लोगों की आबादी वाला है गांव

800 लोगों की आबादी वाले इस गांव के लोगों ने काफी विचार-विमर्श के बाद ये निर्णय लिया है। गांव के सोनू यादव कहते हैं, ”हम अखबारों में पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) के बारे में पढ़ते हैं। वहां के लोगों की हालत दासता भरी है और वे लोग उपेक्षा के शिकार हैं। हमारी भी स्थ‍िति उससे अलग नहीं है।”
”हमने इसे लेकर बीजेपी एमएलए अभिजीत सिंह सांगा से भी संपर्क किया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। पहले भी गांववालों ने इस मामले को सपा एमएलए मुनींद्र शुक्ला के सामने उठाया था, लेकिन तब भी कोई एक्शन नहीं लिया गया।”
”हाईटेंशन लाइन घरों के ऊपर से पहले ही लगा दी गई हैं और गांवों को बिजली से आसानी से जोड़ा जा सकता है। इसके बावजूद इस पर काम नहीं हो रहा है।”

70 साल से नहीं आई ब‍िजली

सिम्मरनपुर गांव में रह रहे और 14 साल तक मुंबई में रहने वाले विनय मिश्रा कहते हैं, ”गांव में लगे बिजली के खंभों के तार में नहीं है। इन्हें एक ठेकेदार ने अपने संसाधनों से खड़ा किया गया, जब उसने 2008 के चुनाव में पंचायत चुनाव लड़ा था।”

”बिजली हमारे गांव में 70 साल से नहीं आई है। ये हाल तब है, जब गांव के पास हम सबसे बड़े बिजली संयंत्रों में से एक होने जा रहे हैं।”

– ”अब तो मानसून भी आने वाला है और गांव के सिर्फ 30 लोगों के पास राशन कार्ड है। कोटेदार उन्ह‍ें भी मिट्टी का तेल नहीं देता, जिनके पास राशन कार्ड है। बिजली तो हमारे यहां पहले से नहीं है और हमें मिट्टी का तेल भी नहीं मिल रहा है।”

पास के गांवों के ल‍िए फंड जारी होता है, लेकि‍न हमारे गांव के ल‍िए नहीं…

गांववाले कहते हैं, ”दौलतपुर ग्राम पंचायत में आने वाले गांव में बिजली आपूर्ति है और वहां सारी सुविधाएं हैं। गांव के बृजेश सिंह के मुताबिक, ”दौलतपुर और उसके आसपास के गांवों तक ही विकास खत्म हो गया है।”

”ये विकास कभी हम लोगों तक नहीं पहुंचा। विधायक, सांसद, गांव के प्रधान बाकी गांवों के लिए फंड जारी करते हैं, लेकिन हमारे गांव के लिए नहीं।”

बुन‍ियादी सुव‍िधाएं न होने से शादी में हो रही द‍िक्कत गांव के रहने वालों की दूसरी शिकायत ये भी है कि बुनियादी सुविधाएं न होने से लड़कों की शादी में भी दिक्कतें हो रही हैं। गांव के ही अमित कुमार के मुताबिक, ”लोग अपनी बेटियों की शादी हमारे गांव के लड़कों से करने में कतराते हैं। दर्जनों ऐसे लड़के हैं, जो इस वजह से शादी नहीं कर पा रहे हैं।”

 



A group of people who Fight Against Corruption.


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