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Saturday 22 September 2018
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सिर्फ डिग्री काफी नहीं, हुनर भी है जरूरी

सिर्फ डिग्री काफी नहीं, हुनर भी है जरूरी

देश में तकनीकी शिक्षा के वर्तमान स्वरूप को देखकर यह प्रतीत होता है कि हम अभी तक उसे व्यावहारिक और रोजगारपरक नहीं बना पाए हैं। पिछले 25 साल में उच्च शिक्षा और तकनीकी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में काफी विस्तार हुआ है। हजारों इंजीनियरिंग कॉलेज खुल गए हैं और लगातार खुल भी रहे हैं। पर क्या इन संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी दी जा सकती है?

सच्चाई यह है कि देश के अधिकांश इंजीनियरिंग कॉलेज डिग्री बांटने की दुकान बन कर रह गए हैं। इनसे निकलने वाले लाखों युवाओं के पास इंजीनियरिंग की डिग्री तो है लेकिन काम करने की समुचित स्किल नहीं है। इसी वजह से देश भर में हर साल लाखों इंजीनियर बेरोजगारी का दंश झेलने को मजबूर हैं। पिछले दिनों विभिन्न तकनीकी नौकरियों की सैलरी का सर्वे करने वाली कंपनी टीमलीज ने एक रिपोर्ट में बताया कि देश में इलेक्टि्रशियन, फिटर और प्लंबर की मांग बहुत ज्यादा है, जबकि इंजीनियर्स की मांग बहुत कम और आपूर्ति बहुत ज्यादा है।

टीमलीज के सर्वे के अनुसार बारहवीं पास इलेक्ट्रीशियन की औसत सैलरी 11300 रुपए प्रति माह है, जबकि डिग्री वाले इंजीनियर की औसत सैलरी 14800 रुपए प्रति माह यानी 3500 रुपए ज्यादा है। पिछले छह साल में इलेक्ट्रीशियन, प्लंबर, टेक्नीशियन का वेतन बढ़ा है। जबकि आईटी इंजीनियरों की एंट्री लेवन तनख्वाह लगभग उतनी ही है। रिपोर्ट के अनुसार दस साल पहले जब आईटी का बूम हुआ था तब काफी मांग थी। जबकि पिछले 10 सालों में मांग में बढ़ोत्तरी नहीं हुई है, जबकि मांग के मुकाबले कई गुना ज्यादा इंजीनियरिंग ग्रेजुएट निकल रहे हैं।

हर साल देश में 15 लाख इंजीनियर बनते है लेकिन उनमें से सिर्फ 4 लाख को ही नौकरी मिल पाती है, बाकी सभी बेरोजगारी का दंश झेलने को मजबूर हैं। नेशनल एसोशिएसन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनीज यानी नैसकाम के एक सर्वे के अनुसार 75 प्रतिशत तकनीकी स्नातक नौकरी के लायक नहीं है। आईटी इंडस्ट्री इन इंजीनियरों को भर्ती करने के बाद ट्रेनिंग पर करीब एक अरब डॉलर खर्च करती है। इंडस्ट्री को उसकी जरूरत के हिसाब से इंजीनियरिंग ग्रेजुएट नहीं मिल पा रहे हैं। डिग्री और स्किल के बीच फासला बहुत बढ़ गया है। इतनी बड़ी मात्रा में इंजीनियरिंग बेरोजगारों की संख्या देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता के लिए भी ठीक नहीं है। लगातार बेरोजगारी बढ़ने की वजह से इंजीनियरिंग कॉलेजों में बड़े पैमाने पर सीटें खाली रहने लगी है।

उच्च और तकनीकी शिक्षा के वर्तमान सत्र में ही पूरे देश भर में 7 लाख से ज्यादा सीटें खाली हैं। तकनीकी शिक्षा में देश के अधिकांश राज्यों में 60 से 70 प्रतिशत तक सीटें खाली हैं। देखा जाए तो यह आंकड़ा चिंता बढ़ाने वाला है क्योंकि स्थिति साल दर साल खराब ही होती जा रही है।

एक तरफ प्रधानमंत्री ‘मेक इन इंडिया’ की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ देश में तकनीकी और उच्च शिक्षा के हालात बदतर स्थिति में हैं। आज हमारे शौक्षिक कोर्स 20 साल पुराने है, इसलिए इंडस्ट्री के हिसाब से छात्रों को अपडेटेड थ्योरी नहीं मिल पाती। इसी वजह से आज इंजीनियरिंग स्नातक के लिए नौकरी पाना सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य होता जा रहा है। अभी स्थिति यह है कि सारा ध्यान थ्योरी सब्जेक्ट पर है, उन्हें रटकर पास करने में ही छात्र अपनी इतिश्री समझते हैं। इंडस्ट्री और इंस्टीट्यूट्स के मध्य एक कॉमन प्लेटफार्म स्थापित करने की दिशा में सरकारी और निजी दोनों प्रयास जरूरी हैं।

एस्पायरिंग माइंड्स की एक रिपोर्ट के अनुसार 20 प्रतिशत से भी कम इंजीनियर आईटी क्षेत्र में नौकरी के लायक हैं। 8 प्रतिशत से भी कम इंजीनियर कोर इंजीनियरिंग के लायक हैं। एस्पायरिंग माइंड्स ने अपनी रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि देश में युवा बेरोजगारों की बढ़ती फौज अर्थव्यवस्था की कुशलता और सामाजिक स्थिरता के हिसाब से भी ठीक नहीं है। देश में तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में पढ़ाई-लिखाई की गुणवत्ता बहुत अच्छी नहीं है। अधिकांश कॉलेजों में शिक्षण का स्तर और प्रशिक्षण की व्यवस्था ठीक नहीं है।

देश में इलेक्ट्रीशियन, प्लंबर और टेक्नीशियन की मांग बढ़ रही है तो उसका लाभ कैसे उठाया जा सकता है! क्या हमारे पास ऐसी कोई योजना है, ऐसा कोई सेंटर हैं जो ऐसी नौकरियों के लिए कम पैसे में प्रशिक्षण दे सकें! ज्यादातर लोग तो अपने अनुभव से सीख कर ही नौकरी पाते हैं, वह भी अस्थायी। जबकि प्रशिक्षण की बहुत आवश्यकता है। इस दिशा में सरकार को पहल करनी पड़ेगी। अब वक्त आ गया है कि हम यह सोचें कि क्या हमारे पास क्वालिटी इंजीनियर हैं। चीन के कुल छात्रों का 34 प्रतिशत इंजीनियरिंग की पढ़ाई करता है, जबकि भारत में कुल छात्रों का मात्र 6 प्रतिशत। इंजीनियरिंग में इतने कम एनरोलमेंट के बाद भी देश में क्वालिटी इंजीनियरों की संख्या बहुत कम है।

पिछले दिनों एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि युवाओं में प्रतिभा का विकास होना चाहिए। उन्होंने डिग्री के बजाया योग्यता को महत्व देते हुए कहा था कि छात्रों को स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान देना होगा। आज देश में बड़ी संख्या में इंजीनियर पढ़-लिख कर निकल रहे हैं, लेकिन उनमें स्किल की बहुत कमी है। इसी वजह से लाखों इंजीनियर बेरोजगार हैं। इंडस्ट्री की जरूरत के हिसाब से उन्हें काम नहीं आता। सच्चाई यह है कि आज डिग्री के बजाय हुनर की जरूरत है। शैक्षणिक स्तर पर स्किल डेवलपमेंट के मामले में जर्मनी का मॉडल पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। जर्मनी में डुअल सिस्टम चलता है। वहां के हाईस्कूल के आधे से ज्यादा छात्र 344 कारोबार में से किसी एक में ट्रेनिंग लेते हैं। चाहे वह चमड़े का काम हो या डेंटल टेक्नीशियन का। इसके लिए वहां छात्रों को सरकार से महीन में 900 डॉलर के करीब ट्रेनिंग भत्ता भी मिलता है। जर्मनी में स्किल डेवलपमेंट के कोर्स मजदूर संघ और कंपनियां बनाती है। वहां का चेंबर्स और कामर्स एंड इंडस्ट्रीज परीक्षा का अयोजन करता है। स्पेन, ब्रिटेन से लेकर भारत तक सब जर्मनी के इस स्किल डेवलपमेंट का मॉडल अपनाना चाहते हैं।

पिछली यूपीए सरकार ने 2009 में जर्मनी के साथ स्किल डेवलपमेंट को लेकर कार्यक्रम भी बनाए थे। लेकिन सरकारी लालफीताशाही के चलते उनका ठीक से क्रियान्वयन नहीं हो पाया। केंद्र सरकार को शैक्षणिक कोर्सेस के साथ-साथ स्किल डेवलपमेंट के कार्यक्रमों पर विशेष ध्यान देना होगा। तभी इसके सकारात्मक परिणाम निकल सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘मेक इन इंडिया’ का सपना तभी पूरा हो पाएगा जब देश के युवा हुनरमंद होंगे और वे डिग्री के बजाय हुनर को प्राथमिकता देंगे।

साभारः स्वदेशी पत्रिका

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