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Tuesday 25 September 2018
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रक्षा में भला दलाल क्यों न हों?

रक्षा में भला दलाल क्यों न हों?

BY-विवेक सक्सेना:

कुछ वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू धर्म को बिल्कुल सही परिभाषित करते हुए कहा था कि यह तो जीवन पद्धति है, मतलब जिंदगी जीने का एक तरीका है। तब मैंने इस बारे में ज्यादा ध्यान नहीं दिया था पर जब से, अगस्ता हैलीकाप्टर दलाली कांड उजागर हुआ है, मुझे लगने लगा है कि इससे बढ़िया तरीके से हिंदू धर्म को परिभाषित नहीं किया जा सकता है। इस धर्म की खासियत यह है कि नवरात्रि से लेकर श्राद्ध तक में जब भी हम कुछ अच्छा करते हैं, खाना तैयार करते हैं तो चार ग्रास अलग निकालने के बाद ही भोजन को ग्रहण किया जाता है।

यह ग्रास, गंगा नदी, गाय, कुत्ते और कौवे के लिए निकाले जाते हैं। शायद यही परंपरा रक्षा खरीद में भी चली आ रही है। जब तक चार पांच ग्रास न निकालो कोई भी सौदा संपन्न नहीं होता है। हर रक्षा खरीद में कुछ लोग बहती गंगा होते हैं तो कुछ दुधारु गाय की तरह देश की दौलत लुटाने के लिए तैयार रहते हैं। कुछ को कुत्तों की तरह मुंह बंद रखने के लिए ग्रास दिया जाता है तो कुछ कौए की भूमिका में होते हैं। मेरे विचार से पत्रकार शायद कौवे की भूमिका में रहते होंगे। खासतौर से चैनलों पर जिस तरह से वे कांव कांव करते रहते हैं उससे तो यही लगता है।

एक बात जो मेरी मंद बुद्धि में आज तक समझ में नहीं आयी वो यह है कि आखिर रक्षा सौदों में दलाली को लेकर इतना हंगामा क्यों खड़ा किया जाता है? न यह पहली बार हो रहा है और न ही अंतिम बार होगा। यह सिलसिला तो आजादी के बाद से ही शुरु हो गया था। तब जवाहरलाल नेहरु जैसी हस्ती इस देश के प्रधानमंत्री थे और हम राष्ट्रप्रेम की भावना से ओत प्रोत थे। हमारे शहीदों की मिट्टी तब तक ठंडी भी नहीं पड़ पायी थी। बावजूद इसके नेहरु सरकार के खिलाफ सबसे पहले घोटाले का जो आरोप लगा था वह यह रक्षा खरीद का ही था। वी के कृष्णामेनन उनके बहुत करीब थे।

उन्होंने भारतीय सेना के लिए 200 जीपें खरीदीं। यह जीपें नई न होकर द्वितीय विश्वयुद्ध में इस्तेमाल की जा चुकी पुरानी जीपे थी जिन्हें रंग पोत कर नया कर दिया गया था। मद्रास बंदरगाह पर कोई 150 जीपें पहुंची। सब की हालत बता रही थी कि उनके इंजन तक ओवरहाल किए गए थे। इस मामले को लेकर बहुत हंगामा हुआ पर नेहरु उनके खिलाफ एक भी शब्द सुनने को लिए तैयार नहीं थे। इस व्यक्ति ने रक्षा मंत्री रहते हुए क्या गुल खिलाए इसका पता 1962 के भारत-चीन युद्ध में लगा। अंततः उन्हें रक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा। पर तब तक देश, बहुत बड़ी कीमत अदा कर चुका था। पिछले कुछ दशकों में तो रक्षा सौदों में दलाली दिए जाने के मामलों की मानो बाढ़ ही आ गई।

राजीव गांधी सरकार पर बोफोर्स तोप खरीदने में दलाली लेने का आरोप लगा। फिर एचडीडब्लू सब मरीन से लेकर राजग शासनकाल में सेना के लिए कफन तक खरीदने में दलाली लेने के आरोप लगे। आपरेशन वैस्ट एंड का खुलासा हुआ पर आज तक सीबीआई सरीखी देश की तथाकथित श्रेष्ठतम एजेंसी कुछ निकाल नहीं पायी। बोफोर्स कांड के 64 करोड़ दलाली लेने का आरोप था पर जांच पर ही 200 करोड़ रुपए खर्च हो गए। यह एजेंसी कितनी सजग थी इसका अनुमान तो इस बात से ही लगाया जा सकता है कि विदेश में जांच के लिए गए इसके एक निदेशक का दस्तावेजों से भरा बैग चोर ले कर भाग गया।

बोफोर्स कांड से लेकर अब तक जब भी कोई दलाली कांड उजागर होता है तो तत्कालीन सरकार बार-बार यह कहती हैं कि रक्षा खरीद में कोई भी दलाल नहीं रहेगा। मालूम हो कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा उत्पादकों का खरीददार हैं। अंर्तरराष्ट्रीय बाजार में उसे अगले 10 सालों में 5 लाख करोड़ रू की खरीद करनी है। ऐसे में जब कि सबको पता है कि वह सरकार से लेकर प्रेस तक को साधे बिना कोई डील नहीं की जा सकती है तो रक्षा सौदों में दलाल रखने में क्या बुराई है?
इस देश में कौन से ऐसी खरीददारी है जिसमें दलाल नहीं होता? हम जो दो रुपए का धनिया भी खरीदते है वह भी हम तक आढत के दलाल के जरिए ही पहुंचता है। आपको जमीन लेनी हो, मकान खरीदना है, हर जगह दलाल की ही अहम भूमिका होती है जिसे कि अंग्रेजी में मिडिल मैन कहा जाता है। नगर निगम की नाली से लेकर रक्षा मंत्रालय तक के ठेकों में दलाली चलती है। कमीशन लिया व दिया जाता है। इसमें नया क्या है? कोई भी धंधा हो उसमें दलाली तो उस कीचड़ की तरह होती है जिसके बिना कमल खिल ही नहीं सकता है।

जरा अखबार उठाकर देख लीजिए। आधार कार्ड बनवाने के लिए दलाल चाहिए। बच्चे का दाखिला करवाने के लिए दलाल चाहिए। आखिर व्यापम घोटाला दलाली का ही तो उदाहरण है। इस देश में कौनसा ऐसा काम है जो बिना दलाल या मिडलमैन के करवाया जा सकता है। हर नेता के यहां एक मिडलमैन होता है। मंत्री के यहां सबको पता होता है कि लेन देन का मामला कौन देखता है। हर कैबिनेट मंत्री को जो दर्जन भर लोगों का स्टाफ मिलता है। वह इसीलिए होता है। कोई चुनाव क्षेत्र का काम देखता है। कोई लोगों के आरक्षण-अस्पताल में दाखिला करवाता है तो किसी के फोन पर ही आगे काम होते हैं। यह काम करने वाला मंत्री का सबसे विश्वासपात्र होता है। हालांकि इस सरकार में थोड़ा अंतर है। हर मंत्री के साथ एक संघ का विश्वासपात्र लगा दिया गया है जो कि उसकी हरकतों पर नजर रखता है। इसके लिए संघ ने सरकारी कर्मचारियों की सूची पहले से तैयार कर ली थी। इन लोगों की निष्ठा मंत्री नहीं बल्कि संघ के प्रति होती है। जब इस सरकार में एक कैबिनेट मंत्री का मंत्रालय बदला गया तो नए मंत्री के निजी स्टाफ में उन्हीं लोगों को नियुक्त कर दिया गया जो कि पिछले वाले मंत्री के साथ थे। वे पूरी व्यवस्था व मशीनरी से वाकिफ हो चुके थे।

मिडिल मैन की जरुरत तो हमारे खून में इतनी रच बस गई है कि उसके बिना जीवन बिताने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। खासतौर से हर धर्म के अंदर मिडिल मैन होता है। आखिर पंडित, पादरी, मौलवी यह सब ऊपरवाले के मिडल मैन ही तो है। हमारे अंदर चाहें कितनी भी श्रद्धा क्यों न हो, हम मंत्रोच्चारण कितना भी बढ़िया क्यों न करते हों पर क्या मंदिर में अपने हाथों से प्रसाद चढ़ा सकते हैं। खुद सुंदरकांड का पाठ करने के बावजूद जब तक वाचक को न सुन ले, हमारा दिल नहीं भरता। भगवान के कितने भी बड़े भक्त क्यों न हो आरती उतारने का काम तो पंडितजी ही करते हैं। घर के साधारण हवन से लेकर अंतिम संस्कार तक सब कुछ इन्हें धार्मिक मिडल मैनो के जरिए ही चलता है।

जरा सोचिए कि जब 5 लाख करोड़ की खरीद होगी तो 50 हजार करोड़ की दलाली भी दी जाएगी। बेहतर होगा कि दलालों के बीच मुकाबला होने दीजिए कम से कम देश का पैसा देश में तो रहेगा। इस पैसे से कोई शराब कंपनी खोलेगा तो कोई शाही हवाई कंपनी स्थापित करेगा। कोई मौज मस्ती पर उड़ाएगा। यह पैसा स्विस या पनामा के बैकों में काला धन बनकर सड़ता रहे, उससे तो बेहतर यही होगा कि यह सफेद धन बनकर देश में ही रहे और सरकार को भी करों से आमदनी हो क्योंकि किसी माई के लाल में इतना दम नहीं है कि वह देश में दलाली और दलालों को खत्म कर सके।।

 



A group of people who Fight Against Corruption.


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