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Tuesday 20 November 2018
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तार तार होती लोकतंत्र की मर्यादा

तार तार होती लोकतंत्र की मर्यादा
लेख- बाल मुकुन्द ओझा

उत्तर प्रदेश विधान सभा के चुनाव ने लोकतंत्र की मर्यादाओं को तार तार करके रख दिया है। सात चरणों में होने वाले इन चुनाव में अभी चार चरण पूरे हुए हैं और तीन चरण बाकी हैं। रामायण और महाभारत के युद्धों में भी कभी ऐसे सियासी बोल सुनने को नहीं मिले जो देशवासियों को इस बार के चुनाव में सुनने को मिल रहे हैं। देवासुर संग्राम की भी कुछ मर्यादा थी मगर यूपी के चुनाव ने दिन में तारे दिखा दिए हैं। लोकतंत्र को भीषण क्षति पहुँचाने में सभी राजनीतिक दल और नेता एक दूसरे को पीछे छोड़ रहे हैं। पार्टी विद डिफरेंस का दावा करने वाली पार्टी भाजपा इस समय केंद्र में सत्तारूढ़ है। इस पार्टी के नेताओं के बयानों से पूरा देश आहत है। प्रधानमंत्री भी ऐसे ऐसे बोल बोल रहे हैं जो हमारी लोकतान्त्रिक परम्पराओं को धवस्त कर रहे हैं। आजादी के गर्भ से निकलने वाली कांग्रेस पार्टी ने अपने गंदे बोलों से तो जैसे लोकतंत्र की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है। लोहिया के आदर्शों पर चलने का दावा करने वाली समाजवादी पार्टी ने लोहिया के लोकतंत्र के उसूलों को दफन कर दिया है।  बहुजन समाज पार्टी डॉ. अंबेडकर के विचारों पर चलने की बात कागजों में अवश्य करती है मगर उसके बोल भी लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध हो रहे हैं।

विकास और अन्य सामयिक मुद्दे हवा हो गए हैं। कोई प्रधानमंत्री को आतंकी बता रहा है तो कोई कब्रिस्तान को उछाल कर वोटों के ध्रुवीकरण में जुटा है। किसी को सरेआम बलात्कारी और माफिया बताया जा रहा है तो कोई सुन्दर चेहरे की बात कर रहा है। कहीं बेटियों की इज्जत पर हमला हो रहा है तो कहीं जाति और धर्म की बात हो रही है। कहीं प्रधानमंत्री को रावण बताया जा रहा है। अब तो गधे भी राजनीति के शिकार हो गए हैं। हमारे नेताओं की इन सियासी बातों और गंदे बोल से देश की सियासत गरमाई हुई है। विकास, महंगाई के मुद्दे गौण हो गए हैं। नोटबंदी की मार से आज भी लोग कराह रहे हैं… नोट निकलने की सीमा बढ़ाने वाले पहले एटीएम पर जाकर देखें तो सही कि वे भरे हैं या आज भी खली पड़े हैं।
आम आदमी से जुड़े मुद्दों जैसे बेहतर आधारभूत सुविधाएँ, सामाजिक न्याय, सबके लिए शिक्षा और रोजगार, भ्रष्टाचार से मुक्ति, शासन प्रशासन में पारदर्शिता इत्यादि से देश के हर नागरिक को जूझना ही पड़ता है लेकिन यूपी के चुनाव ने इन्हें भुला दिया है। बाप बेटे की राजनीति, यूपी को ये साथ पसंद है, आदि नारे बुलंद हो रहे हैं। आम आदमी की परेशानियों से किसी को कोई मतलब नहीं है। गंदे बोलों से चुनावी बिसात बिछ गई है। चुनाव में करोड़ों, अरबों की धनराशि स्वाहा हो जाएगी। महंगाई से आम आदमी को फिर जूझना पड़ेगा। चुनाव लोकतंत्र की परीक्षा होती है और इस परीक्षा में राजनीतिक दलों को यह साबित करना होता है कि जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता और लोकप्रियता कितनी है। लोकतंत्र की परीक्षा पास करने के लिए राजनीतिक दल चुनाव में जनता के बीच जाते हैं। अपने मुद्दे रखते हैं और बताते हैं कि चुनाव जीतने के बाद वे जनता की भलाई के लिए क्या कदम उठाएंगे। मगर वास्तविकता इससे ठीक विपरीत है।
चुनाव जीतने के बाद नेता नेता अपनी झोली भरने में लग जाते हैं। जितने पैसे चुनाव में लगाए हैं उनके पुनर्भरण की जुगत बैठाते हैं। गरीब की भलाई के स्थान पर अपने कुनबे को आगे बढ़ाने में लग जाते हैं। असल में चुनाव ही नेताओं की अग्नि परीक्षा है। जनता को खूब सोच समझ कर अपने मताधिकार का प्रयोग करना चाहिए अन्यथा पांच साल के लिए फिर भैंस गई पानी में। नेता जाति, धर्म और पैसे की राजनीति से खेलते हैं मगर मतदाता को इन प्रलोभनों से हट कर अपना मत डालना है। उसे उसी को चुनना है जो उसका सही मददगार है अन्यथा फिर पांच साल पछताना पड़ेगा और इसके लिए कोई दूसरा दोषी नहीं होगा।


A group of people who Fight Against Corruption.


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