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Saturday 22 September 2018
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गांधीजी कहते थे- राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्रसेवा संभव नहीं

गांधीजी कहते थे- राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्रसेवा संभव नहीं

लेख- श्री भगवान सिंह–
जिस उत्साह से गांधी जी ने गुजरातियों के बीच राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के महत्व का प्रतिपादन किया, उसी उत्साह एवं निष्ठा के साथ वे देश के विभिन्न भागों में हिंदी के प्रचार में लग गये। 20 अक्टूबर के बाद 11 नवम्बर, 1917 को बिहार के मुजफ्फरपुर शहर में भाषण करते हुए उन्होंने कहा, ‘मैं कहता आया हूं कि राष्ट्रीय भाषा एक होनी चाहिए और वह हिंदी होनी चाहिए। हमारा कर्तव्य यह है कि हम अपना राष्ट्रीय कार्य हिंदी भाषा में करें। हमारे बीच हमें अपने कानों में हिंदी के ही शब्द सुनाई दें, अंग्रेजी के नहीं। इतना ही नहीं, हमारी धारा सभाओं में जो वाद-विवाद होता है, वह भी हिंदी में होना चाहिए। ऐसी स्थिति लाने के लिए मैं जीवन-भर प्रयत्न करूंगा।’

बिहार के बाद हिंदी के राष्ट्रीय ध्वजारोही बने गांधी जी बंगीय प्रदेश में दाखिल हुए और 31 दिसम्बर 1917 को कलकत्ता विश्वविद्यालय भवन में ‘बॉम्बे एंड बंगाल ह्यूमेनिटेरियन फण्ड्स’ के तत्वावधान में आयोजित सभा की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने राष्ट्रभाषा के सवाल पर बंग-बंधुओं को झकझोरते हुए कहा, ‘देशसेवा करने के लिए उत्सुक सब हैं, परन्तु राष्ट्रसेवा तब तक संभव नहीं है जब तक कोई राष्ट्रभाषा न हो। दुःख की बात है कि हमारे बंगाली भाई राष्ट्रभाषा का प्रयोग न करके राष्ट्रीय हत्या कर रहे हैं। इसके बिना देश की आम जनता के हृदयों तक नहीं पहुंचा जा सकता। इस अर्थ में बहुत लोगों के द्वारा हिंदी को काम में लाया जाना मानवतावाद के क्षेत्र में बात हो जाती है।’

यह सही है कि बंगीय भूमि से ही हिंदी पत्रकारिता का आरंभ हुआ, भारत में कलकत्ता विश्वविद्यालय पहला था जहां विश्वविद्यालय स्तर पर हिंदी का अध्यापन हुआ, बंगाल नवजागरण के केशवचंद्र सेन, बंकिमचन्द्र जैसे बौद्धिकों ने राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी का समर्थन किया, किन्तु उस नवजागरण का यह एक बहुत बड़ा अंतर्विरोध था कि बंगाल का ‘भद्रलोक’ अंग्रेजी भाषा के मोहपाश में बंधा हुआ था और शहरी मध्यवर्ग सरकारी नौकरियों में जगह पाने को एकमात्र साधन अंग्रेजी को समझते हुए हिंदी के प्रति उदासीन था। इसलिए गांधी जी का बंगाली भाइयों से यह कहना कि ‘वे राष्ट्रभाषा का प्रयोग न कर राष्ट्रीय हत्या कर रहे हैं’ बहुत साहसपूर्ण कार्य था। राष्ट्रभाषा के साथ-साथ शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रांतीय भाषाओं के महत्व की ओर बंगभाषियों का ध्यान आकृष्ट करते हुए उसी दिन कलकत्ता के ‘अखिल भारतीय समाज सेवा सम्मेलन’ में अध्यक्षीय भाषण करते हुए गांधी जी ने कहा, ‘पहली और सबसे बड़ी समाज-सेवा जो हम कर सकते हैं वह यह है कि हम इस स्थिति से पीछे हटें, देशी भाषाओं को अपनायें, हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में उसके स्वाभाविक पद पर प्रतिष्ठित करें और सभी प्रान्त अपना-अपना समस्त कार्य अपनी देशी भाषाओं में तथा राष्ट्र का कार्य हिंदी में प्रारंभ कर दें।’ ज्ञातव्य है कि इस बात को लेकर गांधी जी का नजरिया एकदम साफ था कि विभिन्न प्रान्तों में शिक्षा तथा धारा सभाओं में कार्यवाही का माध्यम वहां की सम्बद्ध भाषा हो, किंतु राष्ट्रीय स्तर पर समस्त कार्यों के निष्पादन की भाषा हिंदी हो।

हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में कैसे देश के सभी लोग स्वीकार करें, यह चिंता गांधी जी के उस पत्र में देखी जा सकती है जो उन्होंने 21 जनवरी, 1918 को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर को लिखा था। इस पत्र में उन्होंने लिखा था कि वे मार्च माह में इंदौर में होने वाले हिंदी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में अपने भाषण के लिए कुछ प्रश्नों पर विचारवान नेताओं के मत एकत्र करना चाहते हैं। वे प्रश्न थे- ‘(1) क्या हिंदी अन्तः प्रांतीय व्यवहार तथा अन्य राष्ट्रीय कार्रवाई के लिए उपयुक्त एकमात्र संभव राष्ट्रीय भाषा नहीं है? (2) क्या हिंदी कांग्रेस के आगामी अधिवेशन में मुख्यतः उपयोग में लायी जाने वाली भाषा नहीं होनी चाहिए? (3) क्या हमारे विद्यालयों और महाविद्यालयों में ऊंची शिक्षा देशी भाषाओं के माध्यम से देना वांछनीय और संभव नहीं है? और क्या हमें प्रारंभिक शिक्षा के बाद अपने विद्यालयों में हिंदी को अनिवार्य द्वितीय भाषा नहीं बना देना चाहिए? मैं महसूस करता हूं कि यदि हमें जनसाधारण तक पहुंचना है और यदि राष्ट्रीय सेवकों को सारे भारतवर्ष के जन-साधारण से सम्पर्क करना है, तो उपर्युक्त प्रश्न तुरंत हल किए जाने चाहिए।’

इस पत्र में उठाये गये सवालों से स्पष्ट है कि गांधी जी स्वराज्य की लड़ाई में शामिल होने से पहले राष्ट्रभाषा के सवाल को हल कर लेना चाहते थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, जो समस्त भारतवासियों की प्रतिनिधि संस्था होने का दावा करती थी, तब तक राष्ट्रभाषा एवं शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रांतीय भाषाओं के प्रति लगभग खामोश थी। कांग्रेस के हर वार्षिक अधिवेशन की कार्यवाही अंग्रेजी भाषा में सम्पन्न होती थी। समस्त राष्ट्रीय ख्याति के नेताओं के पारस्परिक संवाद अंग्रेजी में होते थे। गांधी जी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने कांग्रेस के अंदर राष्ट्रभाषा हिंदी को अपनी कार्रवाइयों का माध्यम बनाने की पहल की। उन्होंने लोकमान्य तिलक से हिंदी सीखने का अनुरोध किया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर से भी उनकी यही अपील थी, क्योंकि गांधी जी के लिए ऐसे महान व्यक्तियों का राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के पक्ष में बोलने से काफी अनुकूल प्रभाव पड़ता। गांधी जी की इस गुहार के शुभ परिणाम भी सामने आये। लोकमान्य तिलक हिंदी सीखने लगे, हालांकि आकस्मिक निधन ने उन्हें पूरा अवसर नहीं दिया। गांधी जी के अनुरोध का ही परिणाम था कि गुरुदेव ने भी हिंदी का अभ्यास शुरू कर दिया और अप्रैल 1920 में उन्होंने काठियावाड़ में अपना पहला हिंदी भाषण दिया। हिंदी नवजागरण को राष्ट्रीय जागरण बनाने का गांधी जी का यह आरम्भिक प्रयास था जो उत्तरोत्तर व्यापक और तीव्र होता गया।

 



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