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Thursday 15 November 2018
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उतारिए साब जूता… ‘गंगा’ !

उतारिए साब जूता… ‘गंगा’ !

‘ये जो क्षेत्रीय सरकारें हैं, केन्द्रीय सरकार की नौकर नहीं है कि प्रधानमंत्री उन्हें डिसमिस कर देंगे। यह भी चुनी हुई सरकारें हैं। और हो सकता है कि देशभक्ति की परिभाषा में दोनों एकमत न हों परन्तु देशभक्ति की कोई ‘दिल्ली छाप’ परिभाषा नहीं हो सकती। इसलिए यह आवश्यक है कि पहले देश भर के पैमाने पर बात चला कर यह तय कर लिया जाए कि वास्तव में देशभक्ति की परिभाषा है क्या! यह भी तो हो सकता है कि देशभक्ति की सरकारी परिभाषा ठीक न हो! क्या देशभक्ति की परिभाषा यह है कि हर नागरिक को प्रधानमंत्री का वफादार होना चाहिए? यदि देशभक्ति का मतलब यह है तो मैं देशप्रेमी नहीं हूँ। मैं अपने देश का वफादार हूँ। प्रधानमंत्री का नहीं।’ यह लाइनें हमारी राष्ट्रीय राजनीति में विचारों का कद लगातार छोटा हो जाने की चिंता में डॉ0 राही मासूम रजा ने ‘गंगा’ हिन्दी मासिक पत्रिका के फरवरी 1988 के अंक के ‘खुली बात’ स्तम्भ में लिखी थी।
हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की जमात में ‘गंगा’ बड़ा नाम था, क्योंकि उसके सलाहकार सम्पादक थे कमलेश्वर। सहयोगियों में ऋषि कुमार मिश्र, अमर गोस्वामी, शैलेन्द्र सक्सेना। दिल्ली से यूनाइटेड इंडिया पीरियाडिकल्स प्रा0 लि0 इस पत्रिका को छापते थे। कमलेश्वर जी हमेश जलते हुए सवालों को ‘गंगा में उठाते थे। वे सम्पादकीयों में वैचारिक खतरे उठाने से कतई नहीं हिचकते थे। चाहे बात वामपंथ के सामने पंथ का सवाल हो या धर्म को उद्योग बनाए जाने का प्रश्न हो या फिर साहित्य में प्रौढ़ता प्रदान करने वाली शक्तियों के संरक्षण पर चिंता, उनकी कलम बेबाकी से बिना डरे गरम से गरम शब्दों को उगलती थी।
इसी अंक के पेज चौदह पर आदिवासी संस्कृति और उस पर आधुनिक सभ्यता से पैदा होने वाले खतरों पर बंशीधर की एक सच्ची रपट छपी है। जो बताती है कि औद्योगिक दुनिया की चमक-दमक से उनके लिए उनका जंगल ही क्यों अच्छा है।
प्रेस की आजादी और पत्रकारों की भूमिका में पतंजलि शर्मा ने जहां जलते हुए सवालों को उठाया है, वहीं दक्षिणपंथियों की असलियत का भी खुलासा किया है। इतना ही नहीं राजनीतिक गुंडई का सच भी गंगा स्नान कर रहा है। हिमालय की तराई में बसे लाखामण्डल परिवारों की गरीबी और लाचारी इस हद तक कराह रही थी कि उनकी औरतें देश भर में घूम-घूम कर अपना जिस्म बेचने का धंधा करतीं। इनकी जिंदगी की खुली दास्तान लिखी है राम प्रताप बहुगुणा ने और साथ में है गंावों के शोषण पर दलित लेखक शरण कुमार लिंबाले की आत्मकथा ‘अक्करमाशी’ (नाजायज औलाद) का एक अंश। आजादी के चालीस बरसों का लेखा-जोखा बड़ी ही साफगोई से कई अंकों में किया है ईश्वरचंद निगम ने तो वे ‘नेताजी नहीं थे, तो कौन थे…? पूछा है कई किस्तों में अशोक टंडन ने गुमनामी बाबा को सामने रखकर। लाहौर से लखनऊ तक के अनूठे सस्मरणों को साझा किया है। यशपाल जी की पत्नी प्रकाशवती पाल ने और खेल के मैदान से पन्ना नंबर चौरासी पर सीधे आये हैं रवि शास्त्री। सरकार के विकास का सच ‘बीकानेर न धणी और न धोरी में यादवेन्द्र शर्मा ने पूरा शहर घूमकर बयान किया है। डा0 यज्ञ प्रसाद तिवारी ने महाकवि निराला के कुछ तथ्य उजागर किये हैं और बताया है कि उनकी पुत्री सरोज के अलावा उनके एक पुत्र रामकृष्ण त्रिपाठी भी रहे जो दारागंज, इलाहाबाद में रहते थे और उन्हें भी अपने पिता की पुस्तकों की रायल्टी पाने के लिए प्रकाशकांे से मुकदमें लड़ने पड़े। ‘मतवाला’ हास्य व्यंग्य की पत्रिका का नाम शायद ही हिंदी जगत के लिए अंजाना हो, उसके सम्पादक भी रहे थे निराला जी और उसे छापते थे मीरजापुर के महादेव प्रसाद सेठ।
‘गंगा’ के कई अंकों में हास्य-व्यंग्य के पितामह हरिशंकर परिसाई की ‘सामाजिक डायरी’ धारावाहिक छपी है। इनमें ‘सूखा, अकाल इंडस्ट्री से लेकर संतन कहां सिकरी सो काम’ तक उनकी खुद की दास्तान दर्ज है। कहानियों का तो खजाना भरा पड़ा है। खुशवंत ंिसह, शैलेन्द्र सागर, कृष्नचंदर, जसवंत सिंह बिरदी, शैलेन्द्र पंडित, विजय, अमर जलील, परदेशी राम वर्मा, हबीब कैफी, क्षमा शर्मा, शैवाल, राजेन्द्र सिंह बेदी और प्रदीप पंत जैसे दसियों नामवर साहित्यकार कथाकार पन्ना दर पन्ना मौजूद हैं।
‘मैं न कहती थी… पाकिस्तान चली जा… मुई…जनम जली…। मेहरू को उसकी अम्मा की खीज बार-बार कचोट रही थी। ठीक ही बकती थी बेचारी। इस मुल्क में तो अब धंधा करना मुश्किल हो गया है। तीन दिन हो गए हैं एक ग्राहक नहीं टपका। ‘फूलों’ वाला सिरहाना’ कहानी में दंगो के बाद एक वेश्या के कोठे का आंखों देखा दर्द बिखरा पड़ा है।
यह मुल्क जंगल में नही, एक भयानक बूचड़खाने में तब्दील हो गया है और तुम कुछ नहीं कर सकते। तुम निहत्थे हो और उनके हाथों में तेज, धारदार पैनी छुरियां। तुम प्रतिवाद करो या मिमियाओ। कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला। अब नही ंतो कुछ देर बाद उनकी छुरी और तुम्हारी गर्दन की मुलाकात अवश्य होगी। ये है राकेश गुप्त के ‘नपुंसक’।
अपनी आंखें नचाता हुआ वह बोला, ‘नाम पहले था साब! अब तो हमारा नाम जूता है…। हमारा पेट जूता है साब! हमारी जात पूछोगे सर?… हम हिन्दुस्तानी हैं…साब! जूता हमारी जात है और पालिश हमारा
धर्म है… सर! उतारिए साब जूता! ये है लतीफ घोंघी का तंज, तो परसाई का व्यंग्य मुलाहिजा हो, ‘हम लोग इस युग के अधिकतर लेखक, बुद्धिजीवी इस व्यवस्था की जारज संताने हैं। हम मानसिक रूप से ‘दोगले’ नहीं तिगले’ हैं। संस्कारों से सामंतवादी हैं, जीवन मूल्य अर्द्ध पूंजीवादी हैं और बातें समाजवाद की करते हैं। अधिकांश हम लोग ‘रेटारिक’ खाते हैं और ‘पोलेमिक्स’ की कै करते हैं। यकीन मानिये सित्ताराम! सित्ताराम! हाय सित्ता, हाय राम!! जपते बहुतेरों ने किया हैं ‘गांग में नंग-धड़़ंग स्नान और राजनीति के मस्तक पर ईमानदारी का तिलक लगाने का हलफनामा भी दर्ज कराया है।



A group of people who Fight Against Corruption.