Search
Tuesday 25 September 2018
  • :
  • :
Latest Update

सबका साथ सबका विकास कैसे होगा मोदी जी

सबका साथ सबका विकास कैसे होगा मोदी जी

‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे के साथ पूर्ण बहुमत लेकर केंद्र की सत्ता में आए नरेन्द्र मोदी के लिए अपने चुनावी नारे की रक्षा अपने ही लोगों से करनी मुश्किल हो रही है। मोदी जोकि इस समय भारत के सबसे प्रभावशाली नेता हैं और जिनकी हर इच्छा उनकी पार्टी भाजपा के लिए आदेश की तरह होती है, वह संघ परिवार के उन तत्वों को काबू कर पाने में विफल साबित हो रहे हैं जिन्होंने पहले ‘लव जेहाद’ के नाम पर विवाद छेड़ा और अब ‘घर वापसी’ के नाम पर अन्य धर्मों के लोगों को हिंदू धर्म में लाने के लिए अभियान चला रहे हैं।

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद देशवासियों को जिस प्रकार तूफानी रफ्तार के साथ विकास शुरू होने की उम्मीद जगी थी वह अब दूर होती नजर आ रही है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से जिस तरह हिंदुत्ववादी ताकतें एकदम से सक्रिय हो गयी हैं उससे सरकार के कामों की चर्चा कम और कट्टरपंथी ताकतों के अभियानों की चर्चा ज्यादा हो रही है। इस सब पर प्रधानमंत्री की चुप्पी पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं क्योंकि प्रधानमंत्री के रूप में उनको इस तरह के अभियानों पर अपना रुख साफ करना चाहिए लेकिन पूर्व में एक हिंदुवादी नेता होने की अपनी छवि के चलते शायद उनके हाथ बंधे हुए हैं। उन्हें शायद यह भय है कि जिस बहुसंख्यक समाज के लोगों ने उन्हें अपने सिर माथे बैठाया कहीं वह उनसे नाराज नहीं हो जाये। लेकिन यहां मोदी को यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्हें देश के युवाओं जिन्होंने अपने सपनों के भारत को मोदी के साथ जोड़ कर देखा और उन्हें समर्थन दिया यदि वह नाराज हो गया तो भाजपा को भारी नुकसान हो सकता है।

वाकई यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि संसद के शीत सत्र की कार्यवाही इस बार किसी विधेयक के किसी प्रावधान के विरोध में नहीं बल्कि केंद्रीय राज्यमंत्री साध्वी निरंजन ज्योति के असंसदीय और अमर्यादित बयान के विरोध में और धर्मांतरण की घटनाओं के विरोध में अधिकांशतः बाधित रही। इस सबका सरकार की छवि पर असर पड़ना स्वाभाविक है। लोकसभा चुनावों के बाद हुए सभी राज्य विधानसभा चुनावों में जनता ने मोदी के नाम पर ही मत देकर इस तरह का माहौल बनाया कि एक ही पार्टी की राज्य और केंद्र सरकार समन्वय के साथ विकास का कार्यक्रम शुरू कर सकें लेकिन ट्रेन दूसरी पटरी पर जाते देख सभी आश्चर्यचकित हैं। भाजपा सरकार आने पर जिस तरह का माहौल बनने के बारे में चुनावों के वक्त विपक्षी दल चेता रहे थे वैसा ही माहौल बनता देख नरेन्द्र मोदी भी चिंतित बताये जा रहे हैं।

गत मंगलवार को हुई भाजपा संसदीय दल की बैठक में उन्होंने इस तरह की घटनाएं (धर्मांतरण) जारी रहने पर पद छोड़ने की चेतावनी तक दे डाली। मोदी लगातार दो सप्ताह से अपने सांसदों को भी चेता रहे थे कि वह विवादित बयान नहीं दें, लक्ष्मण रेखा नहीं लांघें और राष्ट्र के नाम संबोधन नहीं दें, लेकिन योगी आदित्यनाथ जैसे कुछ नेता लगातार सरकार के लिए सिरदर्द बने हुए हैं। और अब तो खुद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कह दिया है कि भारत को हिंदू राष्ट्र में बदलने का सपना जरूर साकार होगा। उन्होंने कहा है कि हिंदू धर्म छोड़कर दूसरे धर्मों में चले गए लोगों की घर वापसी में कुछ भी गलत नहीं है। उन्होंने यह भी कहा है कि जिन लोगों को धर्मांतरण से एतराज है उन्हें चाहिए कि वे धर्मांतरण के खिलाफ संसद में कानून लाएं।

अब जब संघ प्रमुख ने खुद अपना रुख साफ कर दिया है तो मोदी की सलाह का पार्टी नेताओं पर कितना असर होगा यह देखने वाली बात होगी। लेकिन इतना तो तय है कि जिस मेहनत के साथ संघ परिवार ने भाजपा को केंद्र की सत्ता में लाने का मार्ग प्रशस्त किया अब उतनी ही मेहनत वह पार्टी की साख गिराने में लगा रही है। उदाहरण के लिए संघ परिवार के विभिन्न घटकों की ओर से दिये जा रहे विवादित बयानों की बानगी देखिये- धर्म जागरण मंच के एक नेता ने कहा कि हम 2021 तक सबको हिंदू बना देंगे और भारत में कोई भी मुस्लिम या ईसाई नहीं रहेगा। विश्व हिन्दू परषिद के नेता प्रवीण तोगडिया ने कह दिया कि मुसलमान और ईसाई हिंदुओं के ही वंशज हैं। शिवसेना के एक नेता ने तो यहां तक कह डाला कि असली घर वापसी तब होगी जब मुस्लिमों को पाकिस्तान भेजा जाएगा। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक को भी धर्मांतरण में कुछ गलत नजर नहीं आया और उन्होंने एक बयान में इसका समर्थन किया। विहिप के एक और बड़े नेता अशोक सिंघल ने कहा है कि दुनिया में ईसाई और मुस्लिमों के कारण ही युद्ध होते हैं। धर्मांतरण के अभियान का बचाव करते हुए सिंघल ने कहा है कि हम धर्म परिवर्तन कराने नहीं दिल जीतने निकले हैं। यही नहीं संघ की तरफ से देश भर में चलाये जा रहे इस तरह के अभियानों को स्थानीय भाजपा सांसदों, विधायकों, नेताओं का भी पूर्ण समर्थन प्राप्त हो रहा है क्योंकि किसी भी भाजपा नेता में इतना साहस नहीं है कि वह संघ के किसी कार्यक्रम में बुलाये जाने के बावजूद उससे दूरी बना ले।

बहरहाल, सरकार की छवि प्रभावित नहीं होने पाये और सरकार का ध्यान विकास पर ही रहे, इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी के लिए यह जरूरी है कि वह अपना रुख पार्टी के भीतर नहीं बल्कि बाहर भी जाहिर करें। उन्हें जनता का जबरदस्त समर्थन प्राप्त है। निश्चित ही उनका रुख जानने के बाद जनता का ध्यान बाकी सब घटनाओं से हट सकता है क्योंकि उन्होंने विश्वास के साथ मोदी को केंद्र में भेजा है। मोदी को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से भी सीखना चाहिए कि किस तरह उनकी सरकार के दौरान कट्टरवादी ताकतें सिर नहीं उठा सकी थीं।

 



A group of people who Fight Against Corruption.


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *