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Sunday 18 November 2018
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बदहाली में जीते किसान

बदहाली में जीते किसान

लेख- राजीव जैन

इतिहास में ज्ञात प्रथम मानवीय सभ्यता से ही भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है। आज भी भारत की करीबन दो तिहाई आबादी कृषि से जुड़ी हुई है। कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था की मेरुदंड भी कहा जाता है। प्राचीनकाल में किसानों की हालत ठीक थी लेकिन ब्रितानी युग से किसानों की हालत में जो बिगड़ाव शुरू हुआ, वह आज भी सुधर नहीं सका। यदि अंग्रेजों की कृषि नीति पर नजर डालें तो मालूम चलता है कि वे भारतीय किसानों को अपने मन मुताबिक फसल उगाने के लिए मजबूर करते थे और उन्हें अत्यंत कम दामों पर खरीदकर विश्व बाजार में महंगे दामों पर बेचते थे। यानी कि किसानों की सारी मेहनत के फल का वही भक्षण करते थे। देश जब आजाद हुआ तो किसानों के दिल में उम्मीद जगी कि अब हम अपनी इच्छानुसार फसलों का उत्पादन कर उन्हें महंगे दामों पर बेचेंगे और खूब सारा लाभ कमाएंगे लेकिन आजादी के साढे़ छह दशक बाद भी ऐसा न हो सका। आज भी भारतीय किसानों की वही दुर्दशा है, जो औपनिवेशिक काल में थी। आज वह मन मुताबिक फसल उगाने के लिए जरूर स्वतंत्र है लेकिन उसके उचित दाम लेने के लिए नहीं। आज जिन दामों पर किसानों से उनके उत्पादन की खरीदारी की जाती है उससे मुश्किल से ही किसानों की लागत और मेहनताने की भरपाई हो पाती है। इसीलिए आज खेती को घाटे का सौदा माना जाने लगा है। इसी घाटे की वजह से हमारे देश के किसान साहूकारों के कर्ज में डूबते जाते हैं और अंत में कर्ज न चुका पाने की स्थिति में फांसी के फंदे को गले लगा लेते हैं। एनसीआरबी द्वारा जारी की गई 1995-2013 तक की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2,96,438 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। केवल 2013 में ही भारत में किसानों की आत्महत्या की कुल संख्या 11,744 थी। यक्ष प्रश्न यह है कि इन आत्महत्याओं का जिम्मेदार कौन है। किसानों द्वारा आत्महत्या करने के पीछे एक ओर जहां सरकार जिम्मेदार है, वहीं दूसरी ओर बड़ी कंपनियों और व्यापारियों की मुनाफाखोर प्रवृत्ति भी। उर्वरकों की खरीदारी से लेकर कृषि उत्पाद को मंडियों में लाने तक हर जगह किसानों का शोषण होता है। नेशनल और इंटरनेशनल कंपनियों ने बाजार पर अपना एकाधिकार जमा लिया है, जिन पर सरकारों का कोई नियंत्रण नहीं है। दुर्भाग्य से शासन द्वारा इन पर नियंत्रण की कोई पहल करना तो दूर, इस दिशा में अब तक विचार विमर्श भी नहीं किया गया है। शासन की इस उदासीनता के कारण नेशनल और मल्टीनेशनल कंपनियां चांदी काट रही हैं। आजादी के बाद से आज तक कृषि क्षेत्र सरकार द्वारा हमेशा ही उपेक्षित रहा है। पंचवर्षीय योजनाओं में भी कृषि उपेक्षित रही। भारत में कृषि की कीमत पर औद्योगिक विकास को तरजीह दी गई। लेकिन अब देश के नीति निर्माताओं को यह अच्छी तरह से समझना होगा कि औद्योगीकरण से देश का पेट नहीं भरने वाला है। यह अक्सर देखा गया है कि देश सबसे बड़ी पंचायत में पहुंचने वाले अधिकांश जनप्रतिनिधि अपने आपको कृषि व्यवसाय से जुड़ा हुआ दर्शाते हैं। लेकिन इसके बाद भी वे कृषि एवं कृषकों के सुधार हेतु कोई कदम नहीं उठाते। लोकसभा व राज्यसभा के वर्तमान सदस्यों में आधे से ज्यादा लोगों के पास खेती है। कृषि से जुडे़ लोगों के निरंतर संसद में रहने के बावजूद न तो सिंचाई सुविधाओं का पर्याप्त विस्तार हुआ, न कृषि उपजों को उचित दाम मिला और न ही आधुनिक तकनीक से कृषि करने में किसान समर्थ हो पाया। कारण साफ है कि किसान होने के बावजूद सांसदों ने कृषि के बारे में सोचा ही नहीं। किसानों के लिए आंदोलन भी उभरे लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। शरद जोशी, महेंद्र सिंह टिकैत ने किसानों के अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष किया। उनका आंदोलन देश के कई राज्यों में भी फैला। शरद जोशी और टिकैत ने अपने-अपने राज्यों में किसानों को संगठित कर उन्हें पहली बार निर्णायक राजनीतिक शक्ति बनाया। कालांतर में जोशी और टिकैत के आंदोलन राजनीति की भेंट चढ़ गए तथा कृषि क्षेत्र और किसान बदहाल ही रहा। किसान आत्महत्या के मामले नियंत्रित नहीं हो पा रहे हैं और उनकी कोई खैरखबर पूछने वाला भी नहीं है। प्राकृतिक आपदाओं की मार भी इन किसानों को झेलनी पड़ती है। कभी अत्यधिक बारिश तो कभी बारिश की कमी से फसलों को काफी नुकसान पहुंचता है, ऐसे में पूरे देश पर इसका असर पड़ता है। खेती चौपट होने से देश के नागरिकों को जहां महंगाई का सामना करना पड़ता है, वहीं किसानों को भी आर्थिक रूप से नुकसान उठाना पड़ता है। कुल मिलाकर यदि देश का किसान परेशान है तो देश के लोगों पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ता है। प्राकृतिक आपदा आने पर किसानों की सबसे ज्यादा फजीहत होती है। किसानों को उतना मुआवजा नहीं मिल पाता है जितना कि उनका नुकसान होता है। कई बार संसद में भी किसानों की बातों को नहीं उठाया जाता है। ऐसे मौके पर किसानों की हमेशा से एक ही शिकायत रहती है कि जितना नुकसान होता है, उतना मुआवजा नहीं मिल पाता है। प्राकृतिक आपदा ही नहीं बल्कि ऐसी कई समस्याएं हैं, जिनका निराकरण नहीं हो पाता है। आज भी कई किसान ऐसे हैं जो पुराने ढर्रे पर ही खेती करते हैं, ऐसे में वे उतनी पैदावार नहीं ले पाते हैं, जितनी कि होनी चाहिए। पैसे के अभाव में आज भी कई किसान आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। उन्नत किस्म की खाद व बीज की किल्लत तो हमेशा ही बनी रहती है। बुआई के बाद खेती के लिए जरूरी खाद भी किसानों को महंगे दामों में खरीदनी पड़ जाती है। जनप्रतिनिधि भी उनकी नहीं सुनते हैं और मजबूरन किसानों को महंगे दामों पर बीज, खाद की खरीदारी करनी पड़ती है लेकिन फसल तैयार होने के बाद इसका मनमाफिक दाम उन्हें नहीं मिल पाता है।



A group of people who Fight Against Corruption.


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