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Sunday 18 November 2018
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तोडनी होगी जातिवाद की दीवार – सुभाषिनी

तोडनी होगी जातिवाद की दीवार – सुभाषिनी

चौंसठ वर्ष पहले हमारा संविधान पारित किया गया था। इसमें मंत्र की जगह समानता की बात दोहराई गई। संविधान तैयार करने वाली कमेटी के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर ने सोचा होगा कि छुआछूत को गैरकानूनी बनाकर शायद जाति व्यवस्था और उसकी बुराइयों को वह समाप्त करने की ओर बहुत कारगर कदम उठाएंगे। इसी महीने एक सर्वेक्षण के कुछ नतीजे प्रकाशित हुए हैं। देश भर के 42,000 घरों को इसमें शामिल किया गया था। यह सर्वेक्षण नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च और अमेरिका की मैरीलैंड यूनिवर्सिटी ने मिलकर किया है। सर्वेक्षण का शीर्षक है-भारतीय मानव विकास रिपोर्ट-2। इस रिपोर्ट में, जो 2015 में पूर्ण रूप में प्रकाशित होगी, यह आंकने की कोशिश है कि देश में छुआछूत आज भी किस हद तक जिंदा है।
रिपोर्ट के अनुसार, देश भर की जनता का 27 फीसदी हिस्सा यह स्वीकार करता है कि वह छुआछूत को मान्यता देने वाला व्यवहार करते हैं। ऐसा कहने वाले बड़ी संख्या में ‘उच्च’ जाति के लोग हैं। लेकिन इनमें पिछड़ी जाति के लोग भी शामिल हैं। यही नहीं, ऐसा कहने वाले ईसाई, इस्लाम और सिख धर्म को मानने वाले लोग भी हैं (हालांकि उनकी संख्या कम है), जबकि इन धर्मों में समानता के सिद्धांत को बहुत महत्व दिया गया है। हमारे देश में रोज बड़ी आपराधिक घटनाएं घटती हैं। कभी नसबंदी के दौरान गरीब औरतें मर जाती हैं, कभी एनजीओ द्वारा आयोजित शिविर में आंखों के ऑपरेशन के बाद कई लोग अंधे हो जाते हैं, तो कभी राजधानी की सड़क पर एक कैब में महिला के साथ दुराचार होता है। इन घटनाओं की खबरें जब हम पढ़ते हैं, तो हमें गुस्सा आता है, और हम विरोध पर उतर आते हैं। मगर जब हमें इस बात का पता चलता है कि हममें से बहुत बड़ी संख्या में हमारे ही जैसे लोग रोज दूसरों के साथ अमानवीय व्यवहार करते हैं, तो हममें किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं होती। क्योंकि इस अपराध को हम अपराध समझते ही नहीं हैं।
जातिवादी मानसिकता को बनाए रखने के पीछे उन लोगों का भी हाथ है, जिनका दायित्व है उसे समाप्त करना। मगर संविधान पर हाथ रखकर, वचन लेकर सत्ता हासिल करने वाले ज्यादातर लोग खुद भी इस मानसिकता से ओतप्रोत हैं। अभी कुछ दिन पहले, राजस्थान की मुख्यमंत्री ने इसका नया सुबूत पेश किया। उन्होंने अंतर्जातीय विवाह करने वाले दंपति को सरकार से मिलने वाली धन-राशि आधी कर दी, और उसे पाने की दो साल की तय अवधि को घटाकर एक साल कर दिया। उल्लेखनीय है कि राजस्थान उन राज्यों में है, जहां सबसे अधिक संख्या में लोगों ने छुआछूत को मान्यता देने वाले अपने व्यवहार को स्वीकार किया है।
उत्तर भारत के अन्य राज्यों में राजस्थान जैसा हाल है। इन राज्यों में ही जातिवाद मिटाने और समानता लाने संबंधी मूल्यों को स्थापित करने की सर्वाधिक आवश्यकता है। मगर अफसोस की बात है कि जहां इस काम को करने के लिए गौतम बुद्ध और कबीर ने जन्म लिया था, वहां आज ऐसे प्रभावी उपदेशक भी हैं, जो खुलेआम कहते हैं कि जाति से छुटकारा कभी मिल ही नहीं सकता। हमारे विकास के रास्ते में रोड़े बहुत हैं। मगर जिस रोड़े को हटाना सबसे ज्यादा कठिन, मगर शायद सबसे अधिक आवश्यक है, वह जातिवाद का रोड़ा है।

सुभाषिनी सहगल अली – लेखिका माकपा की पूर्व सांसद हैं

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