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Tuesday 25 September 2018
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ठंड का कहर

पूरे उत्तर भारत में ठंड का कहर शुरू हो चुका है। मृतकों की शुरुआती संख्या ही 20 बताई जा रही है। कई स्थानों पर तापमान शून्य से नीचे पहुंच गया है। कोहरे ने अलग कोहराम मचा रखा है। ट्रेनें 20-20 घंटे देर से चल रही हैं। कई परिवारों को इस कड़कड़ाती ठंड में पूरी-पूरी रातें प्लेटफॉर्म पर ट्रेन के इंतजार में बितानी पड़ रही हैं। फ्लाइट्स लेट होने और रद्द होने से भी मामूली परेशानी नहीं है। लेकिन फिर भी ये समस्याएं ऐसी हैं जो सबकी नजर में हैं, जिन पर बात हो रही है और जिनका हल निकालने की कोशिशें कम से कम औपचारिक तौर पर दर्ज हो रही हैं।
ठंड का दूसरा, अचर्चित पहलू बेघरों से जुड़ा है, जिन्हें अखबारों में सिर्फ मौत के आंकड़े के रूप में दर्ज किया जाता है। इस देश में गांवों से लेकर कस्बों और महानगरों तक काफी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जिनका सरकार, लोकतंत्र और कल्याणकारी योजना जैसी चीजों से कभी साबका ही नहीं पड़ता। शीतलहरी, लू और तेज बारिश जैसी प्राकृतिक स्थितियां उनके सामने किसी भयंकर प्राकृतिक आपदा का रूप लेकर आती हैं, क्योंकि इनका सामना करने के लिए घर जैसी कोई घिरी हुई जगह, कपड़े-लत्ते और भर पेट खाना उन्हें नसीब नहीं होता। ये समस्याएं कभी उन्हें आधा मारती हैं तो कभी पूरा ही मार देती हैं, लेकिन सरकार, प्रशासन और खाते-पीते लोगों के लिए खड़ी की गई समूची व्यवस्था उनसे अनजान बनी रहती है।
खुले में जिंदगी गुजारने वाले उजड़े हुए लोग, भिखारी, पागल, नशेड़ी आदि लोगों की जिंदगी में सरकार खासकर तीखे मौसमों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकती है। वह यह जतला सकती है कि आप वोट और टैक्स देते हों या न देते हों, इंसान हों या पशु-पक्षी, अगर प्रकृति ने आपको जिंदगी बख्शी है तो उसको सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी हमारी है, और आपकी मुश्किल घड़ी में हम आपके साथ हैं। यह काम छोटे-मोटे खर्चे से किया जा सकता है, लेकिन सरकारों का ध्यान बड़े कामों, बड़े खर्चों पर ही लगा होता है- जैसे देश को विश्व गुरू बनाना या समाजवाद की स्थापना करना। ऐसे में रैनबसेरे बनाने और चौराहों पर अलाव जलाने जैसे काम ठीक से नहीं हो पाते तो सरकार बेचारी क्या करे!



A group of people who Fight Against Corruption.


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