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Sunday 23 September 2018
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जनता करे इंतजार क्या कर रही सरकार ?

जनता करे इंतजार क्या कर रही सरकार ?

जनता रोजमर्रा की वस्तुओं की महंगाई से परेशान है मिलावटखोरी बड़े पैमाने पर जारी है ! कृषक प्रधान इस देश में हमेसा व्यवसाय परक बज़ट बनाया जाता रहा है पिछ्ली सरकारों की भांति मोदी सरकार का भी डमरू बाज़ रहा है ! अभी भी किसान द्वारा उत्पादित अनाज का दाम सरकार तय करती है जो अनाज किसान से यदि सात रुपये में लिया जाता है वही जब किसान को बीज के रूप में जरूरत पड़ती है तो उसे सत्तर रुपये में भी मिलना मुस्किल होता है! किसान आज तक यह नहीं समझ सका की सरकार द्वारा यह सौतेला व्यवहार उसके साथ क्यों किया जाता है व्यापारी सरकार की इन नीतियों के चलते खूब मौज करते है जनता यह नहीं समझ पाती कि मात्र शहर तक लाने और बेचने पर व्यापारी इतना मुनाफा क्यों कमाता है जबकि किसानों को उसके उत्पाद का सही मूल्य भी नहीं मिलता !
समूचा देश आज महंगाई की समस्या से परेशान है लेकिन इसका जिम्मेदार कौन है ये कोई नहीं बताता सारी महंगाई अंतरराष्ट्रीय कारणों से ही नहीं है जैसा कि सरकारी पक्ष बताता आ रहा है।आखिर यादव सिंह जैसे लोगों ने जब भ्रस्टाचार की गंगा बहा रखी है तो इनके भागीरथ कौन हैं ये भी तो बताना जरूरी है ! साफ है कि 125 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाला यह देश सेंसेक्स और व्यापारी तथा अधिकारी वर्ग को एवं स्वान्तः सुखी और खुद को समृद्ध करने वाली नीतियों से नहीं चल सकता कुछ तो है जिसे हमारे तथाकथित अर्थशास्त्री भी नहीं समझ पा रहे हैं या नहीं समझने का नाटक इसलिए कर रहे हैं की ये भी उसी गंगा में डुबकी लगाना बेहतर मन रहे हैं या केवल तयशुदा फॉरमूले जानते हैं और मात्र किताबी ज्ञान तक सीमित हैं।
क्या यह जरूरी नहीं कि जिस तरह किसानों के उत्पादों के खरीद का मूल्य सरकार तय करती है उसी तरह व्यापारी और उद्योगपति द्वारा तैयार चीजों सहित सभी वस्तुओं की अधिकतम कीमत सरकार ही तय करे। जैसा कि डॉ लोहिया ने दाम बांधो नीति सुझाई थी। इसके अलावा मिलावट तथा नकली सामान बनाने और बेचने को भी देशद्रोह की श्रेणी में लाया जाना चाहिए। यही वक्त है कि जमीनी सचचाई को समझा जाए और गरीब मजदूर किसान तथा बेरोजगारों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाई जाएं। आज नहीं तो कल सरकार को अपनी नीतियां जनता को ध्यान में रखकर सुधारनी ही पड़ेंगी वरना कब तक सहती रहेगी आम जनता यह अत्त्याचार ?
महंगाई की रोकथाम हेतु सरकार द्वारा आजमाए गए सारे दांव उलटे ही पड़ते जा रहे हैं देश यह समझ नहीं पा रहा कि ऊँची ऊँची बातों महंगाई कैसे कम होगी ?
हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी भी बढती महंगाई को लेकर आम सभाओं में लोगों को आकर्षित करते हुए काफी चिंतित नज़र आतें है मोदी जी मात्र चिंता जताने से गरीबो का पेट तो भरेगा नहीं इसके लिए कुछ ठोस उपाय जरूर करने होंगें आपको !
यद् रहे अमेरिका सहित उन तमाम यूरोपीय देशों में जिसके पिछलग्गू बनने में हम लगे हुए हैं वहां की सदैव शांत रहने वाली जनता अपनी सरकार के खिलाफ नहीं बल्कि बहुराष्ट्रीय व्यवस्था के भ्रष्टाचार वायदा कारोबार सहित वॉल स्ट्रीट मतलब कुछ बड़े व्यवसायियों के लिए लागू होने वाली आर्थिक नीतियों के खिलाफ सड़क पर आ गई थी पता नहीं मोदी सरकार यह सब कुछ देख और समझ पा रही है या नहीं क्या हमारी सरकार यह समझ पाएगी कि अगर हमारे यहां 10 या 20 करोड़ लोग सड़कों पर उतर आए तो क्या होगा ? यह तो साफ है कि कोई देश अपनी बड़ी जनसंख्या को छोड़कर सफलता की सीढ़ियां नहीं चढ़ सकता। बेशक कुछ देर तक अपनी जनता को रंगीनियां दिखाकर भ्रम में रख सकता है लेकिन जैसे ही खुमारी टूटती है वह देश यथार्थ के धरातल पर धड़ाम से गिर पड़ता है। कुछ ऐसा ही तेज दौड़ने वाले देशों के साथ हो रहा है और हमारे देश के साथ भी होने वाला दिख रहा है। यह सच है कि राजनीतिक लोग विशेषज्ञ नहीं होते पर हमारे लोकतंत्र में व्यवस्था यही है कि जनता के प्रतिनिधि विशेषज्ञों से राय लेंगे और फिर अपनी बुद्धि और जमीनी हकीकत के ज्ञान से जनहित में निर्णय लेंगे। लगता है कि इस सिद्धांत में कोई कसर बाकी रह गई है वरना जनाधार वाले जमीनी नेता जब शीर्ष पद पर होते हैं तो इतनी लाचारी नहीं दिखती है। वे हर बात का कोई मजबूत हल निकाल ही लेते हैं। क्या मोदी सरकार के पास हैं ऐसे लोग इसका भारत की आम जनता फिल हल तो इंतजार ही कर रही है !

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